वकीलों पर हमलों के विरोध में 3 नवंबर को रहेगा न्यायिक कार्य ठप, बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र और गोवा का बड़ा निर्णय

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नागपुर। राज्यभर में वकीलों पर लगातार हो रहे हमलों के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा ने बड़ा कदम उठाते हुए 3 नवंबर को एक दिन के न्यायिक कार्य बहिष्कार (court boycott) का ऐलान किया है। काउंसिल ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वकील संरक्षण कानून को तत्काल लागू करने की मांग के समर्थन में लिया गया है।

मुंबई में 29 अक्टूबर को हुई बार काउंसिल की सर्वसाधारण सभा में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा के बाद सर्वसम्मति से ठराव पारित किया गया।


🔹 बार काउंसिल का ठराव

काउंसिल ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में राज्य के कई हिस्सों में वकीलों पर हमले की घटनाएं बढ़ी हैं।
हाल ही में अहिल्यानगर जिले के शेवगांव तालुका में एक गवाह ने उलट-परीक्षा (cross examination) के दौरान गुस्से में आकर एक वकील पर प्राणघातक हमला किया। इससे पहले भी राज्य के विभिन्न जिलों में कई वकीलों के साथ मारपीट की गई थी और कुछ की हत्या तक हो चुकी है।

इन घटनाओं को देखते हुए काउंसिल ने कहा कि राज्य सरकार को अब और देरी न करते हुए वकील संरक्षण कानून लागू करना चाहिए। इस संबंध में ठराव की प्रतियां मुंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और सभी जिला न्यायालयों के प्रधान न्यायाधीशों को भेजी गई हैं।

बार काउंसिल ने सभी जिला और तालुका वकील संघों से अपील की है कि वे 3 नवंबर को न्यायिक कार्यों से दूर रहकर इस आंदोलन में सहभागी बनें।


🔹 कानून के मसौदे पर सुधार प्रस्ताव

बार काउंसिल ने बताया कि वकील संरक्षण कानून का प्रारूप (ड्राफ्ट) पहले ही राज्यभर के वकील संघों को भेजा गया था, जिनसे कई महत्वपूर्ण सुझाव और सुधार प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं।

संशोधित मसौदा राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) को भेजा गया है, लेकिन अब तक उस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। ठराव में कहा गया कि यदि सरकार शीघ्र कदम नहीं उठाती, तो वकीलों का यह आंदोलन आगे और व्यापक रूप ले सकता है।


🔹 वकीलों की एकजुटता का संदेश

काउंसिल ने कहा कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि न्यायिक प्रणाली की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए है।
राज्य के सभी बार एसोसिएशनों से अपील की गई है कि वे शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से आंदोलन में भाग लें ताकि सरकार पर वकीलों की मांगों को मानने का दबाव बने।

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