New Delhi: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी उथल-पुथल तेज हो गई है। कांग्रेस की सत्ता में हिस्सेदारी की पुरानी मांग को एक बार फिर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सिरे से खारिज कर दिया है। डीएमके नेतृत्व का साफ संदेश है कि गठबंधन चुनाव तक ठीक है, लेकिन सरकार में हिस्सेदारी नहीं। स्टालिन की यही “एकला चलो” नीति अब गठबंधन धर्म पर सवाल खड़े कर रही है।
कांग्रेस नेताओं के तीखे बयानों से साफ है कि सहयोगी दल खुद को सिर्फ बाहरी समर्थन तक सीमित नहीं रखना चाहते। बावजूद इसके डीएमके का अड़ियल रवैया जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्टालिन का यह रुख सीधे तौर पर बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। अमित शाह पहले ही राज्य में आक्रामक मोड में नजर आ रहे हैं, वहीं थलपति विजय की संभावित एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
अगर डीएमके ने सहयोगियों को नजरअंदाज करना जारी रखा, तो गठबंधन में दरार तय मानी जा रही है—और इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिल सकता है। चुनावी रण में सबसे बड़ा सवाल यही है: स्टालिन की जिद डीएमके को भारी पड़ेगी या बीजेपी इस मौके को भुनाने में कामयाब होगी?

