मुंबई | विशेष प्रतिनिधि
महाराष्ट्र में चुनावी ज़मीन कमजोर पड़ते ही भारतीय जनता पार्टी ने प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश से नेताओं, प्रचार गाड़ियों और सामग्री का आयात शुरू कर दिया है। जिस ईडी–सीबीआई के डर के सहारे भाजपा उत्तर भारत में राजनीतिक बढ़त बनाती रही, वही दबाव की राजनीति महाराष्ट्र में कारगर नहीं हो पा रही है। नतीजतन अब भाजपा को प्रचार के लिए स्थानीय स्तर पर पर्याप्त वाहन तक उपलब्ध नहीं हो पा रहे, और मजबूरी में यूपी से गाड़ियाँ मंगाई जा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सभी प्रचार वाहनों की जानकारी चुनाव आयोग को दी गई है? या फिर भाजपा चुनाव आयोग की आंखों में धूल झोंककर बाहरी राज्यों से संसाधन लाकर खुलेआम आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ा रही है?
जानकारों के मुताबिक, चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार हर प्रचार वाहन, उसका नंबर, मालिकाना हक, खर्च और उपयोग की पूरी जानकारी आयोग के पास दर्ज होना अनिवार्य है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि महाराष्ट्र की सड़कों पर यूपी नंबर की प्रचार गाड़ियाँ धड़ल्ले से घूम रही हैं, जिनका न तो स्थानीय स्तर पर कोई लेखा-जोखा दिख रहा है और न ही सार्वजनिक रूप से उनकी अनुमति स्पष्ट है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा को महाराष्ट्र में जनाधार की कमी का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर भारतीय वोट बैंक को साधने के लिए बाहरी चेहरों को मैदान में उतारा जा रहा है, लेकिन यह प्रयास भी स्थानीय मतदाताओं को रास नहीं आ रहा। सवाल उठता है कि जब महाराष्ट्र में भाजपा के पास पर्याप्त संगठनात्मक ताकत और संसाधन हैं, तो प्रचार के लिए दूसरे राज्य पर निर्भरता क्यों?
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग भाजपा के मामले में चयनात्मक चुप्पी साधे हुए है। आम उम्मीदवारों और छोटे दलों पर सख्ती से नियम लागू किए जाते हैं, लेकिन सत्ताधारी दल द्वारा नियमों के संभावित उल्लंघन पर आयोग की निष्क्रियता लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
– अब मांग उठ रही है कि चुनाव आयोग यह स्पष्ट करे कि
– महाराष्ट्र में भाजपा के लिए कितनी प्रचार गाड़ियाँ पंजीकृत हैं?
– यूपी से आई गाड़ियों की अनुमति किस आधार पर दी गई?
– उनके खर्च का लेखा-जोखा किस खाते में दर्ज है?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं दिए गए, तो यह साफ माना जाएगा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर आंच आई है। लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ वोट से नहीं, नियमों की समानता से भी लड़े जाते हैं—और यही कसौटी आज भाजपा और चुनाव आयोग दोनों के सामने खड़ी है।

