Ajit Pawar Death: NCP at Crossroads, Sharad Pawar Emerges as Bhishma Pitamah: शरद पवार एक बार फिर एनसीपी के भीष्म पितामह की भूमिका में उभरकर आएंगे

शरद पवार एक बार फिर एनसीपी के भीष्म पितामह की भूमिका में उभरकर आएंगे

अजित पवार के असामयिक निधन ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां हर फैसला इतिहास लिख सकता है। उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख के रूप में अजित पवार केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि सत्ता संतुलन की धुरी थे। उनके जाने के बाद न केवल पार्टी, बल्कि पूरी महायुति और विपक्षी खेमे में भी राजनीतिक भूचाल आ गया है।

इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद शरद पवार एक बार फिर एनसीपी के भीष्म पितामह की भूमिका में उभर आए हैं। भले ही अजित पवार की बगावत के बाद एनसीपी दो गुटों में बंटी हो, लेकिन संकट की इस घड़ी में परिवार और पार्टी—दोनों के सबसे वरिष्ठ मार्गदर्शक के रूप में शरद पवार की ओर सभी की निगाहें टिक गई हैं।

क्या होगा अजित पवार गुट का भविष्य?

सबसे बड़ा और निर्णायक सवाल यही है कि अब अजित पवार की एनसीपी का रास्ता क्या होगा? क्या यह गुट स्वतंत्र पहचान बनाए रख पाएगा या फिर इतिहास खुद को दोहराते हुए दोनों एनसीपी का विलय होगा?

महानगरपालिका चुनाव के दौरान पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में बीजेपी को हराने के लिए अजित पवार का शरद पवार के साथ आना कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं थी। तभी से यह संकेत मिलने लगे थे कि दोनों गुटों के बीच जमी बर्फ पिघल रही है। खुद अजित पवार ने भी एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि कार्यकर्ता एकजुटता चाहते हैं और सही समय पर बड़ा फैसला लिया जाएगा।
अब वही “सही समय” नियति ने तय कर दिया है।

41 विधायक, एक सांसद और सत्ता की चाबी

फिलहाल अजित पवार गुट के पास महाराष्ट्र विधानसभा में 41 विधायक और लोकसभा में एक सांसद—सुनील तटकरे—हैं। यह संख्या किसी भी गठबंधन सरकार को बनाने या गिराने की ताकत रखती है। यही वजह है कि बीजेपी, शिंदे सेना और शरद पवार—तीनों खेमे इस गुट पर नज़र गड़ाए बैठे हैं।

अगर दोनों गुटों का विलय होता है तो सत्ता समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। ऐसे में शरद पवार गुट के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल डिप्टी सीएम पद के प्रबल दावेदार के रूप में उभर सकते हैं। लेकिन यह राह आसान नहीं होगी। इसके लिए उन्हें प्रफुल पटेल और सुनील तटकरे जैसे कद्दावर नेताओं का भरोसा जीतना होगा—जो कभी अजित पवार के सबसे विश्वस्त सिपहसालार रहे हैं।

पटेल–तटकरे–भुजबल: किंगमेकर की भूमिका

अजित पवार के बाद उनके गुट में सबसे मजबूत स्तंभ प्रफुल पटेल और सुनील तटकरे हैं। दोनों नेताओं ने एनसीपी के विभाजन में निर्णायक भूमिका निभाई थी। अब वही नेता तय करेंगे कि पार्टी का भविष्य किस दिशा में जाएगा—शरद पवार की छांव में या बीजेपी के साथ सत्ता के केंद्र में।

इसके अलावा छगन भुजबल जैसे अनुभवी नेता भी इस राजनीतिक शतरंज के अहम मोहरे हैं। उनका एक कदम कई समीकरणों को उलट सकता है।

सुनेत्रा पवार की अग्निपरीक्षा

अजित पवार के निधन के बाद सबसे कठिन परीक्षा उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार के सामने है। निजी शोक और राजनीतिक जिम्मेदारी—दोनों का बोझ एक साथ उठाना आसान नहीं होगा। राज्यसभा सांसद होने के नाते वे पहले ही संसद में मौजूद हैं, लेकिन अब उन्हें पार्टी की विरासत को संभालने का प्रस्ताव भी मिल सकता है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि बीजेपी सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम पद का प्रस्ताव दे सकती है। इससे एक ओर अजित समर्थकों में भावनात्मक जुड़ाव बना रहेगा, तो दूसरी ओर महायुति की स्थिरता भी सुनिश्चित होगी। साथ ही कैबिनेट में एक महिला चेहरे की एंट्री भी बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकती है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला शिंदे सेना से विचार-विमर्श के बाद ही होगा।

पार्थ और जय पवार: उत्तराधिकार का संकट

अजित पवार के बड़े बेटे पार्थ पवार पहले ही जमीन घोटाले के आरोपों और 2019 की लोकसभा हार के चलते कमजोर स्थिति में हैं। ऐसे में उन्हें तत्काल बड़ी जिम्मेदारी मिलना मुश्किल माना जा रहा है। छोटे बेटे जय पवार राजनीति में अभी सक्रिय नहीं हैं।
इस हालात में शरद पवार की भूमिका निर्णायक हो जाती है। माना जा रहा है कि उनकी सहमति और मार्गदर्शन के बिना पवार परिवार और एनसीपी का कोई भी बड़ा फैसला संभव नहीं है।

अजित पवार का जाना केवल एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की राजनीति में एक युगांतकारी क्षण है। आने वाले दिनों में तय होगा कि एनसीपी फिर से एकजुट होकर नई ताकत बनेगी या इतिहास के पन्नों में बिखर जाएगी। इतना तय है कि इस पूरे घटनाक्रम की धुरी—एक बार फिर—शरद पवार ही होंगे।

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