COURT NEWS:‘जा और मर’ गुस्से में कहना आत्महत्या के लिए उकसाना साबित नहीं करता है-केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने कहा—गुस्से में कहा गया “जा और मर” आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं, इरादा साबित होना ज़रूरी।

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कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने एक अहम फैसले में कहा है कि आपसी विवाद के दौरान गुस्से में कहे गए “जा और मर” जैसे शब्दों को मात्र इसी आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में आरोपी की मंशा (इरादा) का साबित होना अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति सी. प्रदीप कुमार की एकलपीठ ने इस मामले में सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 204 (सबूत नष्ट करना) के तहत आरोप तय किए गए थे।

क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, 30 वर्षीय युवक का एक विवाहित महिला के साथ संबंध था। बाद में युवक ने किसी अन्य महिला से विवाह करने का फैसला किया, जिससे दोनों के बीच वर्ष 2023 में तीखा विवाद हुआ। इसी विवाद के दौरान युवक ने महिला से कथित तौर पर “जा और मर” कहा। इसके कुछ समय बाद महिला ने अपनी साढ़े पांच साल की बेटी के साथ आत्महत्या कर ली।

इसके बाद सत्र न्यायालय ने युवक की डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते हुए उसके खिलाफ आरोप तय किए थे। इस आदेश को युवक ने केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट(Kerala High Court) की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 1995 के फैसले स्वामी प्रह्लाद दास बनाम मध्य प्रदेश राज्य का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह देखना जरूरी है कि आरोपी ने ऐसे शब्द किस उद्देश्य से कहे थे। केवल यह तथ्य कि पीड़ित ने आत्महत्या कर ली, अपने-आप में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने कहा कि प्रस्तुत मामले में आरोपी द्वारा कहे गए शब्द विवाद और गुस्से की स्थिति में बोले गए प्रतीत होते हैं। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी की मंशा महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की थी। इसलिए IPC की धारा 306 के तहत अपराध नहीं बनता।

धारा 204 पर भी राहत
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब आत्महत्या के लिए उकसाने का मुख्य अपराध ही सिद्ध नहीं होता, तो सबूत नष्ट करने से संबंधित धारा 204 का आरोप भी टिक नहीं सकता।

इन टिप्पणियों के साथ केरल हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय का आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को राहत दी।

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