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Supreme Court:सिर्फ कल्याण नहीं, माता-पिता की भूमिका भी तय करेगी फैसला: बच्चों की कस्टडी पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश

तेज़ न्याय सुनिश्चित करने के लिए 2,800 न्यायिक अधिकारियों की भर्ती पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने मांगी विस्तृत ब्लूप्रिंट
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नई दिल्ली। बच्चों की कस्टडी (child-custody) तय करते समय केवल उनके “कल्याण” को ही एकमात्र आधार मानना सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में अदालतों को माता-पिता के आचरण, उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन-स्तर, बच्चों की सुविधा और शिक्षा जैसे अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी उनकी मां को बहाल की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों का कल्याण सर्वोपरि जरूर है, लेकिन वही अकेला निर्णायक कारक नहीं हो सकता।

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा,

“कस्टडी मामलों में बच्चों का कल्याण सर्वोच्च विचार है, इसमें कोई विवाद नहीं है। लेकिन इसके साथ-साथ कई अन्य कारक भी होते हैं, जैसे पक्षकारों का आचरण, उनकी आर्थिक क्षमता, जीवन-स्तर, तथा बच्चों की सुविधा और शिक्षा। इसलिए यह कहना कि ये कारक बहुत प्रासंगिक नहीं हैं और केवल कल्याण के आधार पर ही निर्णय होगा—पूरी तरह सही नहीं है।”

क्या है मामला

यह अपील एक तलाकशुदा दंपति के बीच लंबे समय से चल रहे कस्टडी विवाद से जुड़ी है। दोनों पक्ष भारतीय नागरिक हैं और उनके दो नाबालिग पुत्र हैं, जिनका जन्म क्रमशः 2017 और 2019 में हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने कस्टडी तय करते समय मां के आचरण समेत कई अहम तथ्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे पहलू “महत्वपूर्ण” हैं और इन्हें इस तर्क पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि केवल बच्चों का कल्याण ही निर्णायक है।

हाईकोर्ट को दोबारा सुनवाई का निर्देश

अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मामला पुनः गुण-दोष के आधार पर विचार के लिए वापस भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि हाईकोर्ट इस कस्टडी विवाद का निपटारा यथाशीघ्र, अधिमानतः चार महीने के भीतर करे।

यह फैसला देशभर में चल रहे कस्टडी मामलों के लिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि अदालतें अब बच्चों के हित को व्यापक दृष्टिकोण से परखेंगी, न कि केवल एक ही कसौटी पर।

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