मुंबई(Mumbai) में एक बार फिर सत्ता संतुलन की लड़ाई तेज हो गई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सहित विधान परिषद के नौ सदस्यों का कार्यकाल समाप्ति की ओर है। ऐसे में सबसे बड़ा राजनीतिक(Political) सवाल यही है कि क्या उद्धव ठाकरे दोबारा विधान परिषद का टिकट हासिल कर पाएंगे या नहीं। बदले हुए संख्याबल ने महाविकास आघाड़ी (MVA) के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जबकि भाजपा-महायुति मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है।
मई 2020 में जिन नौ नेताओं को निर्विरोध(unopposed) विधान परिषद में भेजा गया था, उस समय राजनीतिक समीकरण अलग थे। तब MVA को पांच और भाजपा को चार सीटें मिली थीं। अब तस्वीर उलट है। विधानसभा में महायुति के पास करीब 235 विधायकों का संख्याबल है, जबकि MVA के पास माकपा और शेकाप को मिलाकर मात्र 48 विधायक हैं। दो सीटें रिक्त हैं और यदि मई से पहले इन पर उपचुनाव हो जाता है, तो सभी 288 विधायक विधान परिषद चुनाव में वोट डालेंगे।
विधान परिषद चुनाव से पहले सात सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव होना है। संख्याबल के हिसाब से MVA को एक ही राज्यसभा सीट मिलने की संभावना है। ऐसे में तय माना जा रहा है कि गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर समझौता करना पड़ेगा—एक दल को राज्यसभा और दूसरे को विधान परिषद से संतोष करना होगा।
भाजपा के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं है। मौजूदा चार विधान परिषद सदस्यों में से तीन अब विधानसभा में पहुंच चुके हैं, जिससे नए चेहरों को मौका देने का दबाव बढ़ेगा। वहीं, सोलापुर की राजनीति में हुए हालिया घटनाक्रम के बाद रणजीतसिंह मोहिते पाटील को लेकर भाजपा का फैसला राजनीतिक संकेत देने वाला होगा।
उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद छोड़ते समय विधान परिषद से इस्तीफा देने की घोषणा जरूर की थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अब सवाल यह है कि क्या वे स्वयं फिर से विधान परिषद जाने के इच्छुक हैं और क्या MVA उनके नाम पर सहमति बना पाएगी। यदि उद्धवसेना राज्यसभा की सीट पर कांग्रेस या शरद पवार गुट के उम्मीदवार को समर्थन देती है, तो इसे उद्धव ठाकरे के विधान परिषद जाने का स्पष्ट संकेत माना जाएगा।
आने वाले दिनों में राज्यसभा और विधान परिषद दोनों चुनावों ने महाराष्ट्र की राजनीति को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। समझौते, रणनीति और उम्मीदवार चयन—तीनों मोर्चों पर फैसले तय करेंगे कि सत्ता संतुलन किसके पक्ष में झुकेगा।

