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INDIA-US Agro Trade Deal: क्या अमेरिका के साथ कृषि समझौता भारतीय किसानों के लिए “डेथ वारंट” साबित होगा?

Rastriya Swabhimaan
Last updated: February 11, 2026 5:07 am
Rastriya Swabhimaan
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5 Min Read
भारत-अमेरिका कृषि समझौते को लेकर किसानों के हितों पर उठे सवाल, सरकार और विपक्ष आमने-सामने।
भारत-अमेरिका कृषि समझौते को लेकर किसानों के हितों पर उठे सवाल, सरकार और विपक्ष आमने-सामने।
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मोदी सरकार की एग्री-डील पर उठते सवाल और हकीकत

Contents
कृषि समझौते की पृष्ठभूमिकिसानों की प्रमुख चिंताएँ1. सस्ते आयात का खतरा2. जीएम फसलों का मुद्दा3. डेयरी सेक्टर पर दबावसरकार का पक्ष क्या है?“डेथ वारंट” वाली राजनीतिवास्तविक खतरा कहाँ है?

भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र (INDIA-US Agro Trade Deal) में बढ़ते सहयोग और संभावित व्यापारिक समझौतों को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। विपक्ष के कुछ नेताओं और किसान संगठनों का आरोप है कि यह समझौता भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है और “किसानों के डेथ वारंट” पर हस्ताक्षर जैसा कदम है।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आइए विस्तार से समझते हैं।


कृषि समझौते की पृष्ठभूमि

भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार पहले से ही जारी है। भारत अमेरिका से बादाम, सेब, दालें और कृषि तकनीक आयात करता है, जबकि अमेरिका को चावल, मसाले, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि उत्पाद निर्यात करता है।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच:

  • कृषि बाजारों को खोलने,
  • टैरिफ कम करने,
  • जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों के आयात,
  • डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के व्यापार
    को लेकर चर्चा तेज हुई है।

इसी संदर्भ में प्रस्तावित या चर्चित “कृषि डील” को लेकर किसानों में आशंकाएँ पैदा हुई हैं।


किसानों की प्रमुख चिंताएँ

1. सस्ते आयात का खतरा

अमेरिका में कृषि बड़े पैमाने पर, अत्याधुनिक तकनीक और भारी सरकारी सब्सिडी के सहारे की जाती है। यदि भारतीय बाजार अमेरिकी गेहूं, मक्का, सोयाबीन या डेयरी उत्पादों के लिए खुलता है, तो:

  • भारतीय किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में भारी नुकसान हो सकता है
  • एमएसपी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है
  • छोटे और सीमांत किसान बाजार से बाहर हो सकते हैं

2. जीएम फसलों का मुद्दा

अमेरिका जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों का बड़ा उत्पादक है। यदि ऐसे उत्पाद भारत में व्यापक रूप से आयात होते हैं, तो:

  • जैव विविधता पर असर पड़ सकता है
  • पारंपरिक बीजों और स्थानीय खेती पर संकट आ सकता है
  • बीज कंपनियों की निर्भरता बढ़ सकती है

3. डेयरी सेक्टर पर दबाव

भारत का डेयरी क्षेत्र मुख्यतः छोटे किसानों और सहकारी मॉडल (जैसे अमूल) पर आधारित है। अमेरिकी डेयरी उत्पादों को अनुमति मिलने से लाखों दुग्ध उत्पादकों की आय पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।


सरकार का पक्ष क्या है?

सरकार का कहना है कि:

  • कोई भी समझौता भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करते हुए ही किया जाएगा।
  • निर्यात के नए अवसर खुलेंगे, जिससे किसानों को वैश्विक बाजार मिलेगा।
  • कृषि तकनीक, कोल्ड स्टोरेज, सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग में निवेश बढ़ेगा।
  • भारत को उच्च गुणवत्ता वाले बीज और तकनीकी सहयोग मिलेगा।

सरकार यह भी तर्क देती है कि वैश्विक व्यापार से अलग रहकर भारत कृषि क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी नहीं बना सकता।


“डेथ वारंट” वाली राजनीति

“डेथ वारंट” जैसे शब्द राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं। विपक्ष इसे 2020 के कृषि कानूनों की याद से जोड़ता है, जब बड़े कॉर्पोरेट और विदेशी कंपनियों के प्रवेश को लेकर व्यापक किसान आंदोलन हुआ था।

आलोचकों का कहना है कि:

  • यह समझौता धीरे-धीरे कृषि बाजार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल देगा
  • एमएसपी कानूनी गारंटी से ध्यान हटाया जा रहा है
  • आत्मनिर्भर कृषि मॉडल कमजोर होगा

वहीं समर्थकों का दावा है कि:

  • भारतीय किसान अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं
  • निर्यात-आधारित कृषि से आय दोगुनी करने का लक्ष्य मजबूत होगा

वास्तविक खतरा कहाँ है?

सवाल यह नहीं है कि अमेरिका के साथ समझौता हो या न हो। असली मुद्दा यह है कि:

  • क्या भारतीय किसानों को बराबर की सब्सिडी और सुरक्षा मिलेगी?
  • क्या एमएसपी और सार्वजनिक खरीद प्रणाली बरकरार रहेगी?
  • क्या छोटे किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी?

यदि सुरक्षा उपायों के बिना बाजार पूरी तरह खोल दिया गया, तो छोटे किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन यदि समझौता संतुलित शर्तों और चरणबद्ध तरीके से लागू हुआ, तो यह अवसर भी बन सकता है।

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