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Reading: Vande Bharat 2026 : “वंदे मातरम्” बनाम बेरोज़गारी: क्या राष्ट्रवाद असली मुद्दों पर पर्दा डाल रहा है?
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Vande Bharat 2026 : “वंदे मातरम्” बनाम बेरोज़गारी: क्या राष्ट्रवाद असली मुद्दों पर पर्दा डाल रहा है?

Rastriya Swabhimaan
Last updated: February 11, 2026 6:18 am
Rastriya Swabhimaan
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4 Min Read
राष्ट्रवाद के नारों और बेरोज़गारी-महंगाई जैसे मुद्दों के बीच बढ़ती बहस पर विशेष विश्लेषण।
राष्ट्रवाद के नारों और बेरोज़गारी-महंगाई जैसे मुद्दों के बीच बढ़ती बहस पर विशेष विश्लेषण।
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अश्विनी कुमार दुबे

Contents
नई दिल्ली।भारत में देशभक्ति सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि जनमानस की पहचान है। “वंदे मातरम्”(Vande Mataram 2026) और “भारत माता की जय” जैसे उद्घोष स्वतंत्रता संग्राम की विरासत हैं। लेकिन आज एक गंभीर सवाल उठ रहा है—क्या राष्ट्रवाद के नारों का इस्तेमाल जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए किया जा रहा है?नारा बनाम नौकरियाँ: बहस का केंद्रराष्ट्रवाद: भावना या राजनीतिक रणनीति?बेरोज़गारी और महंगाई: आंकड़ों की हकीकतमीडिया की भूमिका पर भी सवालअसली राष्ट्रवाद क्या है?“वंदे मातरम्” का सम्मान, राजनीतिक हथियार नहींनिष्कर्ष: शोर नहीं, समाधान चाहिए

नई दिल्ली।
भारत में देशभक्ति सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि जनमानस की पहचान है। “वंदे मातरम्”(Vande Mataram 2026) और “भारत माता की जय” जैसे उद्घोष स्वतंत्रता संग्राम की विरासत हैं। लेकिन आज एक गंभीर सवाल उठ रहा है—
क्या राष्ट्रवाद के नारों का इस्तेमाल जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए किया जा रहा है?


नारा बनाम नौकरियाँ: बहस का केंद्र

देश का युवा पूछ रहा है—

  • नौकरी कहाँ है?
  • भर्ती परीक्षाएँ समय पर क्यों नहीं हो रहीं?
  • पेपर लीक क्यों रुक नहीं रहा?

मध्यम वर्ग पूछ रहा है—

  • महंगाई पर नियंत्रण कब होगा?
  • टैक्स और EMI के बीच राहत कहाँ है?

किसान पूछ रहा है—

  • लागत से कम दाम क्यों मिल रहा है?
  • MSP पर कानूनी गारंटी क्यों नहीं?

लेकिन सार्वजनिक विमर्श में इन सवालों से ज्यादा चर्चा राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की दिखाई देती है। यही विरोधाभास बहस को जन्म देता है।


राष्ट्रवाद: भावना या राजनीतिक रणनीति?

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि भावनात्मक मुद्दे—

  • राष्ट्रवाद
  • धार्मिक प्रतीक
  • सीमा और सुरक्षा
  • ऐतिहासिक विवाद

—अक्सर चुनावी विमर्श में प्रमुखता पा जाते हैं, क्योंकि वे तेज प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं।

आलोचकों का आरोप है कि जब आर्थिक या प्रशासनिक सवालों पर दबाव बढ़ता है, तो भावनात्मक मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है।

वहीं सरकार और समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रवाद और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय गौरव, सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान भी उतने ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जितने रोज़गार और महंगाई।


बेरोज़गारी और महंगाई: आंकड़ों की हकीकत

  • विभिन्न रिपोर्टों में युवाओं में बेरोज़गारी दर चिंता का विषय बताई जाती रही है।
  • भर्ती परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक की घटनाएँ कई राज्यों में सुर्खियाँ बनी हैं।
  • महंगाई, विशेषकर खाद्य और ईंधन की कीमतें, घरेलू बजट पर असर डाल रही हैं।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की बड़ी आबादी युवा है, और रोजगार सृजन सरकारों के लिए केंद्रीय चुनौती बना हुआ है।


मीडिया की भूमिका पर भी सवाल

एक वर्ग का आरोप है कि मुख्यधारा मीडिया में बहसें अक्सर राष्ट्रवाद और राजनीतिक टकराव पर केंद्रित रहती हैं, जबकि रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं।

हालाँकि, मीडिया संस्थानों का पक्ष है कि वे वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं और जो राजनीतिक रूप से प्रासंगिक होता है।


असली राष्ट्रवाद क्या है?

राष्ट्रवाद का अर्थ सिर्फ नारे नहीं, बल्कि नागरिकों का जीवन स्तर भी है।
अगर राष्ट्र सशक्त है, तो—

  • युवा को अवसर मिलना चाहिए
  • किसान को सम्मानजनक आय मिलनी चाहिए
  • शिक्षा और स्वास्थ्य सुलभ होने चाहिए
  • महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए

देशभक्ति और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है, और जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी।


“वंदे मातरम्” का सम्मान, राजनीतिक हथियार नहीं

“वंदे मातरम्” भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का गौरवशाली प्रतीक है।
इसका सम्मान तब और सार्थक होगा जब:

  • देश का युवा आत्मनिर्भर बने
  • किसान कर्ज और संकट से मुक्त हो
  • गरीब भूखा न सोए
  • मध्यम वर्ग आर्थिक असुरक्षा से बाहर निकले

नारा तब ताकत बनता है, जब उसके पीछे ठोस नीति और परिणाम हों।


निष्कर्ष: शोर नहीं, समाधान चाहिए

देश को राष्ट्रवाद बनाम रोज़गार की बहस में उलझने की बजाय दोनों के बीच संतुलन चाहिए।

  • भावनात्मक मुद्दे अपनी जगह
  • आर्थिक और सामाजिक मुद्दे अपनी जगह

आखिरकार लोकतंत्र में नागरिकों का अधिकार है कि वे पूछें—
विकास कहाँ है? रोजगार कब मिलेगा? महंगाई कब घटेगी?

देशभक्ति का अर्थ सिर्फ उद्घोष नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन भी है और यही किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत होती है।

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