Story Time: शायद ही ऐसा कोई हो, जिसे प्रकृति के बीच बैठना और उसे एकटक निहारना अच्छा न लगता हो, पर इसे देखने के लिए आँखें ही नहीं सरस हृदय भी होना चाहिए। हर किसी की अपनी फितरत होती है। कोई बंद कमरे में बैठकर खुश हो लेता है तो कोई सिनेमा हॉल, मॉल जैसी जगहों पर जाकर या धार्मिक स्थलों पर जाकर और कोई दोस्तों के साथ पिकनिक आदि करके। यानी हर व्यक्ति को अपने ढंग से अपने व्यस्त कार्यक्रम में एक चेंज चाहिए और लोग अपनी सामर्थ्य के हिसाब से लाते भी हैं। जिसके पास पैसा है वो समझता है कि हम पैसे के बल पर ही सब कुछ कर सकते हैं और शायद इसीलिए धीरे-धीरे प्रकृति से कटते चले जा रहे हैं।
प्रकृति से कटने से भी कुछ काम चल जाता पर हम तो प्रकृति से छेड़छाड़ करने लगे हैं, यूँ कहिए कि प्रकृति को काटने पर तुले हुए हैं। आए दिन पेड़ों का कटना, पहाड़ों का कटना- यह प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ ही तो है। हम प्रकृति को छेड़ते है और प्रकृति हमें नहीं छोड़ती। पहले हम पेड़ लगाने के लिए सोचते थे और लगाते भी थे। लेकिन अब सिर्फ काटने के लिए सोचते हैं, लगाने के लिए तो बिल्कुल नहीं। इसके पीछे हमारा अगुआ हमारा ‘आधुनिकीकरण’ है। आधुनिकीकरण का रंग कुछ इस कदर हमारे ऊपर चढ़ा है कि अब बेरंग होना आसान नहीं रह गया है।
इतना ही नहीं, अब हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि अपने पूर्वजों के द्वारा लगाए गए पेड़ों को कटवा कर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने लगे हैं- छोड़ो, अब कौन गाँव जाए और उसकी देख-रेख करे। हमारी अपनी जरूरतें पूरी हो गईं, बस। अब पेड़ लगे या कटे, क्या फर्क पड़ता है इससे हमें क्या? हम तो अपने घर में बड़े आराम से एसी लागाके बैठे हैं। जिसके पास एसी नहीं है तो एयरकूलर लगा लिया। लेकिन पेड़ लगाने के लिए कोई नही सोचता। ये बात दीगर है कि इन सारी भौतिक सुविधाओं के बावजूद हम अपने मन की शांति के लिए पहाड़ों पर ही घूमना ज्यादा पसंद करते हैं।
प्रकृति की गोद में बैठना और उसे एकटक निहारना आज भी हमारे मन को शांति प्रदान करता है। ये सच है कि प्रकृति के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं हैं। फिर भी हम उसके महत्त्व को समझ नहीं पाते और नजरअंदाज कर देते हैं। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने पर कभी माफी भी मिलेगी- क्या हम इसकी उम्मीद लगाए बैठे हैं? जिन्हें हम प्राकृतिक आपदा कहते हैं, वह क्या है? प्रकृति का असंतुलन ही तो? चलिए, ओजोन की परत, कार्बन और तापमान आदि के संबंध और प्रसंग को छोड़ते हैं, पर बादल फटने से लेकर बाढ़ तक की तबाही का कारण क्या है? सूखा से बाढ़ तक की विभीषिका के पीछे कौन हैं?
बड़े स्तर पर बनों की कटाई, गाँवों तक पाँव पसार रहा शहरीकरण और परिणामस्वरूप प्रदूषित वातावरण- इन सभी के पीछे हमारी ही तो भूमिका है। हम यह कहकर बच निकलने की कोशिश करते हैं कि अकेले मेरे करने से क्या होगा। पर ऐसे में हम अपने आप को पढ़ा-लिखा और सामाजिक कैसे कह सकते हैं? अगर हम पेड़ों की कटाई रोकने की बात करते, प्रदूषण बढ़ाने के बजाय उसे रोकने का प्रयास करते, तात्कालिक उपायों की जगह स्थायी तरीका ढूँढ़ते तो शायद हर साल रिलीफ-रिलीफ की चीख-पुकार और हो-हल्ला से बचकर देश कुछ पल सुख की साँस लेता।
अब तो पेड़-पौधे लगाने का काम सिर्फ सरकारी निर्देशों तक ही सीमित हो गया है। अलग से विटामिन की गोलियों की तरह सरकारी खर्चे पर वन विभाग वृक्षारोपण कराता है। दृष्टिभेद के कारण वहाँ हमारे पारंपरिक पेड़ नहीं होते, हमसे घुले-मिले आम, बरगद, पीपल, नीम, जामुन, महुआ, अशोक आदि जैसे घरेलू वातावरण वाले पेड़ नहीं होते। उन पेड़ों की गोद में हम दुपहरी नही बिता सकते। न बच्चों को आनंद और न ही पशु-पक्षियों को सुख।
हम खुद तो लापरवाह हैं ही, प्रकृति के सामीप्य के आनंद के प्रति पर तथाकथित जागरूक व्यवस्था भी तो हमें प्रकृति से जुड़ने नहीं देती। फिर भी हम चाहते हैं कि प्रकृति हमें समय पर गर्मी, बरसात और जाड़ा देती रहे। हम प्रकृति की दुखती रग पर अनवरत उँगली दबाए रखें और वह हमें समय पर छहो ऋतुओं का सुख प्रदान करती रहे। शायद हम यह भी सोचते हैं कि अपनी ताकत पर सब कुछ कर सकते हैं, नदी की धारा को भी मोड़ सकते हैं पर हम क्या प्रकृति को अपने हिसाब से चला सकते हैं ? नहीं।
मुझे तो लगता है कि प्रकृति भी मजा ले रही है (मतलब मजा चखा रही है)। चलो बेटा, अब हम भी तुम्हारी ही राह पर चलते हैं-
तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली
चलो अब हो गया मिलना, न तुम खाली न हम खाली।
पिछले वर्ष सोशल साइटों पर प्रकृति के प्रति नई पीढ़ी की जागरूकता और प्रधान मंत्री जी के इस आग्रह पर कि “हर व्यक्ति अपनी माँ के नाम पर एक पेड़ अवश्य लगाए” उसकी कमाल की आज्ञाकारिता जैसे ट्रेंड कर रही है। इस बार यदि देश के युवकों ने प्रकृति की ताकत के पक्ष में अपनी पक्षधरता कायम रखी तो निश्चय ही आनेवाले दिन आश्वस्त करेंगे और मौसम का चक्र पुन: अपने खुशनुमा दिनों की ओर लौट सकता है।

सीमा मिश्र

