Bribery Case: मध्य रेलवे विजलेंस ने मुंबई डिवीजन में भ्रष्टाचार पर अब तक की सबसे बड़ी चोट करते हुए ट्रेन संख्या 22122 मुंबई एलटीटी एसी सुपरफास्ट एक्सप्रेस में तैनात दो टीटीआई रमीज़ सय्यद और राकेश कुमार को 56 हजार रुपये की घूस राशि के साथ दबोच लिया।
यह कार्रवाई 15 जून 2026 को जलगाँव से एलटीटी के बीच मे हुई जिसने रेलवे प्रशासन की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्योकि एक हप्ते पहले घूसखोर टीटीआई कुमार गौरव के घूस काण्ड की आग अभी ठंडी भी नही हुई थी कि एक दूसरी घूस काण्ड की आग वापस लग गई।
सूत्रों के अनुसार दोनों टीटीआई लंबे समय से ट्रेन में “सेटिंग और वसूली” का खेल चला रहे थे। आरोप है कि यात्रियों से खुलेआम पैसे वसूले जाते थे लेकिन टिकट नहीं बनाए जाते थे। बताया जा रहा है कि इस एक सफर में ही करीब 150 यात्रियों से रकम वसूली गई ओर टिकट नहीं बनाया गया जिसके कारण रेलवे को राजस्व का भारी नुकसान पहुँचा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये दोनों टीटीआई घूस की रकम सीधे अपने पास रखने के बजाय पेंट्री कार के वेंडर साहिल रफीक मिर्जा को “सुरक्षित चैनल” की तरह इस्तेमाल किया गया। जानकारी के मुताबिक 37 हजार रुपये राकेश कुमार और 19 हजार रुपये रमीज़ सय्यद ने वेंडर को सौंपे थे।
वेंडर ने और पेंट्री मैनेजर अतुल सिंह ने ऑन रिकॉर्ड यह बात कबूल की है।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या पेंट्री कार केवल खाने-पीने की सुविधा का माध्यम रह गई है या फिर भ्रष्टाचार का चलता-फिरता सेफ हाउस बन चुकी है?
रेलवे सूत्रों का दावा है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष एजेंसी से जाँच हो जाए तो कई और बड़े नाम सामने आ सकते हैं। आखिर कैसे 150 से अधिक बिना टिकट यात्री लखनऊ से मुंबई तक सफर करते रहे और किसी वरिष्ठ अधिकारी की नजर नहीं पड़ी? क्या यह केवल दो टीटीआई का खेल था या फिर पूरा सिस्टम मौन सहमति से चल रहा था?
सबसे बड़ा प्रश्न रेलवे प्रशासन की जवाबदेही पर है। जब ट्रेनों में “स्टार्ट टू एंड” ड्यूटी होती है तब वरिष्ठ निरीक्षण तंत्र क्या कर रहा था? क्या अधिकारियों को ट्रेन में चल रही अवैध वसूली की भनक तक नहीं थी या फिर सब कुछ जानबूझकर नजर अंदाज किया जा रहा था?
सूत्रों के अनुसार पूरे मामले को एक टीटीआई द्वारा दबाने की कोशिश भी हुई लेकिन विजलेंस टीम के सख्त रुख के आगे किसी की एक नहीं चली। यह कार्रवाई साफ संकेत है कि रेलवे में वर्षों से जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार के नेटवर्क को सिर्फ विजलेंस के भरोसे खत्म करना आसान नहीं है।
अब जनता यह जानना चाहती है कि कार्रवाई केवल दो कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या फिर उन अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय होगी जिनकी नाक के नीचे यात्रियों की जेब काटकर रेलवे राजस्व को चूना लगाया जाता रहा। इस पूरे काण्ड का मास्टरमाइंड रमीज़ सय्यद के पैसों व रसूख के आगे रेलवे के उच्चाधिकारी कथक कली नृत्य करते नज़र आएँगे या लीपा-पोती करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल देंगे।

