RTE Admission 2026: आरटीई (शिक्षा का अधिकार) के तहत प्रवेश आवंटित होने के बावजूद मुलुंड (पूर्व) स्थित बॉम्बे प्रेसिडेंसी इंटरनेशनल स्कूल में विद्यार्थियों को वास्तविक प्रवेश नहीं दिए जाने का आरोप अभिभावकों ने लगाया है। इस मामले में अभिभावकों ने शिक्षा विभाग तथा बाल अधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कर न्याय की मांग की है। अभिभावकों का आरोप है कि अप्रैल 2026 से स्कूल प्रबंधन लगातार अलग-अलग कारण बताकर प्रवेश प्रक्रिया टालता रहा।
कभी 15 जून को आने के लिए कहा गया, कभी आरटीई के तहत प्रवेश देने से इनकार किया गया। वहीं, कभी नर्सरी कक्षा बंद होने और कभी नर्सरी किसी अन्य संस्था को संचालित करने के लिए दिए जाने की बात कही गई। इतना ही नहीं, अभिभावकों को मुलुंड (पश्चिम) स्थित मराठी विद्यामंदिर स्कूल में प्रवेश लेने की सलाह भी दी गई। 15 जून को स्कूल द्वारा दी गई तारीख के अनुसार सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ पहुंचे अभिभावकों को फिर भी प्रवेश नहीं दिया गया।
इस बीच अन्य विद्यार्थियों की कक्षाएं शुरू हुए 15 दिनों से अधिक समय बीत चुका है, जिससे संबंधित बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। 29 जून को अभिभावकों ने उत्तर विभाग, चेंबूर के शिक्षा अधिकारी मुस्ताक शेख से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी दी। इसके बाद उप शिक्षा निदेशक कांबले से भी मिलकर शिकायत प्रस्तुत की गई। अभिभावकों के अनुसार, उप शिक्षा निदेशक ने इस मामले की सुनवाई गुरुवार को करने का आश्वासन दिया है।
वहीं, शिक्षा अधिकारी मुस्ताक शेख ने संबंधित स्कूल को नोटिस जारी कर आरटीई के तहत पात्र विद्यार्थियों को तत्काल प्रवेश देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही चेतावनी दी गई है कि आदेश का पालन नहीं होने पर नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई अधिनियम) के तहत प्रत्येक पात्र बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। अधिनियम की धारा 12(1)(सी) के अनुसार निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों को निर्धारित प्रतिशत सीटों पर प्रवेश देना अनिवार्य है।
यदि आरटीई पोर्टल पर प्रवेश आवंटित होने के बाद भी किसी पात्र विद्यार्थी को प्रवेश नहीं दिया जाता है, तो यह अधिनियम के उद्देश्य और प्रावधानों के अनुरूप गंभीर प्रश्न खड़े करता है तथा संबंधित प्राधिकरण द्वारा इसकी जांच और आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है। इस पूरे मामले ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आरटीई के तहत चयनित बच्चों को भी स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता, तो क्या यह शिक्षा के अधिकार की भावना के विपरीत नहीं है? यदि कुछ स्कूलों की मनमानी और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण बच्चे पूरे शैक्षणिक वर्ष शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
अभिभावकों ने मांग की है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही तय की जाए ताकि किसी भी बच्चे का भविष्य प्रभावित न हो। इस मामले की शिकायत बाल अधिकार आयोग में भी की गई है। अभिभावकों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर बच्चों को तत्काल प्रवेश दिलाया जाए, उनका शैक्षणिक नुकसान रोका जाए और दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाए। अब सभी की नजर इस बात पर है कि शिक्षा विभाग इस मामले में कितनी प्रभावी कार्रवाई कर विद्यार्थियों को समय पर न्याय दिला पाता है।यदि इसे इन्वेस्टिगेटिव न्यूज़, टीवी पैकेज, या वेब पोर्टल की शैली में और अधिक प्रभावशाली बनाना हो, तो मैं वह संस्करण भी तैयार कर सकता हूँ।

