PEC Limited कंपनी से सौमित ने चीन को लौह अयस्क की सप्लाई के लिए थे 348 करोड़, व्याज सहित हो गए 613 करोड़
मुंबई। सरकारी कंपनी पीईसी लिमिटेड से जुड़े 613 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय घोटाले को लेकर चार्टर्ड अकाउंटेंट विजय डागर ने जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए संबंधित एजेंसियों से मामले की निष्पक्ष एवं विस्तृत जांच की मांग की है। डागर का दावा है कि उन्होंने इस मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन का अध्ययन कर कई महत्वपूर्ण बिंदु जांच एजेंसियों के समक्ष रखे हैं।
डागर के अनुसार, वर्ष 2011-12 में पिसीज एक्सिम के मुंबई यूनिट के प्रोपराइटर सौमित जेना ने पीईसी लिमिटेड से चीन को लौह अयस्क निर्यात के लिए करीब 613 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। उनका आरोप है कि बाद में कंपनी की संरचना में बदलाव कर कुछ कर्मचारियों को पिसीज एक्सिम (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड का निदेशक बनाया गया और जेना तथा उनकी पत्नी ने निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया। डागर का दावा है कि इस प्रक्रिया के जरिए ऋण की जिम्मेदारी नए निदेशकों वाली कंपनी पर डाल दी गई।
डागर स्वयं पिसीज एक्सिम (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड के वित्त वर्ष 2011-12 के वैधानिक ऑडिटर थे। उनके खिलाफ गोवा में SPCC/10/2019 मामला दर्ज होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन पर सरस्वत को-ऑपरेटिव बैंक से लिए गए करीब 3 करोड़ रुपये के सुरक्षित ऋण को कंपनी की पुस्तकों में नहीं दिखाने का आरोप लगाया गया। डागर का कहना है कि उक्त ऋण वास्तव में पिसीज एक्सिम के प्रोपराइटर सौमित जेना की प्रोपराइटरी इकाई से संबंधित था और ऋण की राशि उसी खाते में दर्ज एवं बाद में चुकाई गई थी।
डागर का कहना है कि इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने सरस्वत बैंक से संबंधित बैंक स्टेटमेंट हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन बैंक ने उन्हें तीसरा पक्ष बताते हुए स्टेटमेंट उपलब्ध नहीं कराया। उनका आरोप है कि बैंक खाते और उसमें हुए लेन-देन की विस्तृत जांच होने पर 613 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय लेन-देन और धन के हस्तांतरण की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
उन्होंने SPCC/11/2019 और SPCC/12/2019 का भी उल्लेख करते हुए दावा किया कि पिसीज एक्सिम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में बाद में बनाए गए कुछ निदेशकों को भी मामले में आरोपी बनाया गया, जबकि उनकी भूमिका और नियुक्ति की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। डागर ने एक पूर्व कानूनी प्रबंधक की मौत का भी उल्लेख किया है और इस संबंध में जांच की मांग की है।
डागर ने आरोप लगाया कि कथित घोटाले में निर्यात से प्राप्त धन के स्थानांतरण, नकद निकासी, कथित फर्जी कारोबार तथा दुबई स्थित खातों में धन भेजे जाने जैसे कई पहलुओं की जांच की जरूरत है। हालांकि, इन गंभीर आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित एजेंसियों अथवा न्यायालय के अंतिम निष्कर्ष का इंतजार है।


उन्होंने यह भी दावा किया कि मामले में आरोपी बताए जा रहे सौमित जेना वर्ष 2018 में भारत से बाहर चला गया, उसकी इतनी पहुंच थी कि उसने अपने रसूख से दो दिन के अंदर अपना और अपनी पत्नी का पासपोर्ट रिन्यू कराकर नेपाल के रास्ते प्राईवेट जेट से दुबई चला गया. सीबीआई दावा करती है कि दुबई की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है लेकिन खुलासा अभी तक नहीं हुआ है। इस कांड में मोहन भागवत का हाथ है और उनकी सह पर सौमित रंजन जेना वर्ष 2018 में सरकारी कंपनी पीईसी लिमिटेड द्वारा दिए गए ऋण को गटकने में सफल हो सका।
डागर ने भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान (ICAI) और नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) से भी इस मामले के लेखांकन पक्ष पर विशेषज्ञ राय देने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि यदि 3 करोड़ रुपये के बैंक ऋण की वास्तविक प्रकृति और उधारकर्ता की स्थिति स्पष्ट हो जाती है तो उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही के महत्वपूर्ण पहलुओं का समाधान हो सकता है।
उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग, सीबीआई और अन्य संस्थानों को शिकायतें भेजे जाने का भी दावा किया है। डागर का आरोप है कि वर्ष 2022 में उनसे मामला समाप्त कराने के लिए रिश्वत की मांग की गई थी। इस आरोप की भी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
डागर का कहना है कि पिछले कई वर्षों से वह इस मामले में न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्हें दो बार जान से मारने की धमकी भी मिली है। उनका कहना है कि इतने बड़े सरकारी वित्तीय मामले में केवल आरोपियों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बैंकिंग लेन-देन, निर्यात प्राप्तियों और धन के अंतिम उपयोग का फॉरेंसिक ऑडिट कर वास्तविक लाभार्थियों और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जानी चाहिए।
उन्होंने केंद्र सरकार, सीबीआई, संबंधित न्यायिक संस्थाओं और वित्तीय नियामक एजेंसियों से पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने के लिए शिकायत की गई है तथा यदि सरकारी धन की हेराफेरी प्रमाणित होती है तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।
पीईसी लिमिटेड 613 करोड़ रुपये का वित्तीय घोटाला
- घोटाले का स्वरूप: वर्ष 2011-12 में ‘पिसीज एक्सिम’ के मुंबई यूनिट के प्रोपराइटर सौमित जेना द्वारा सरकारी कंपनी पीईसी लिमिटेड से चीन को लौह अयस्क निर्यात के नाम पर लगभग 613 करोड़ रुपये का ऋण लिया गया था।
- कंपनी संरचना में बदलाव का आरोप: आरोप है कि बाद में कंपनी की संरचना बदलकर कुछ अन्य कर्मचारियों को ‘पिसीज एक्सिम (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड’ का निदेशक बना दिया गया, जबकि जेना और उनकी पत्नी ने निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया। इस प्रक्रिया के जरिए ऋण की देयता नई कंपनी पर डाले जाने का दावा किया गया है।
- फॉरेंसिक ऑडिट और निष्पक्ष जांच की मांग: मामले के वित्तीय लेन-देन, निर्यात प्राप्तियों, धन के अंतिम उपयोग, दुबई स्थित खातों में धन ट्रांसफर और नकद निकासी की गहराई से फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की गई है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट विजय डागर के दावे और पक्ष
- वैधानिक ऑडिटर की भूमिका: विजय डागर वर्ष 2011-12 के दौरान पिसीज एक्सिम (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड के वैधानिक ऑडिटर थे।
- गोवा मामला (SPCC/10/2019): डागर पर सरस्वत को-ऑपरेटिव बैंक से लिए गए लगभग 3 करोड़ रुपये के सुरक्षित ऋण को कंपनी की पुस्तकों में नहीं दिखाने का आरोप है। डागर का स्पष्ट कहना है कि यह ऋण सौमित जेना की प्रोपराइटरी इकाई से संबंधित था और उसी खाते में दर्ज एवं चुकाया गया था।
- अन्य मामले: डागर ने SPCC/11/2019 और SPCC/12/2019 का हवाला देते हुए बाद के निदेशकों की भूमिका और नियुक्ति की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच की मांग की है। साथ ही, उन्होंने एक पूर्व कानूनी प्रबंधक की संदिग्ध मौत की जांच की भी मांग उठाई है।
- संस्थानों से अपील: डागर ने भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान (ICAI) और नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) से इस मामले के लेखांकन पक्ष पर विशेषज्ञ राय देने का आग्रह किया है।
- सुरक्षा और धमकियां: डागर का दावा है कि वह लंबे समय से न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इस दौरान उन्हें दो बार जान से मारने की धमकियां भी मिली हैं। साथ ही उन्होंने वर्ष 2022 में मामला समाप्त करने के एवज में रिश्वत मांगे जाने का भी गंभीर आरोप लगाया है।
एजेंसियों और सरकार से मांग
- प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई जैसी प्रमुख संस्थाओं को शिकायतें भेजी गई हैं।



