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    Iran Economy After US Deal: अमेरिका के साथ समझौता ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं, बोले विशेषज्ञ

    Iran Economy After US Deal: अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) से प्रतिबंधों में संभावित राहत, जब्त विदेशी परिसंपत्तियों तक पहुंच और तेल निर्यात में वृद्धि की उम्मीदें जरूर जगी हैं, लेकिन ईरानी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल कूटनीतिक प्रगति से देश की गहरी आर्थिक चुनौतियों का समाधान नहीं होगा।

    समझौते में 60 दिनों की वार्ता अवधि, होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजों के लिए खोलने की दिशा में कदम, ईरानी तेल निर्यात पर अमेरिकी छूट और प्रतिबंधों व जब्त संपत्तियों पर चर्चा का प्रावधान शामिल है। इन संभावनाओं से ईरानी मुद्रा को मजबूती मिलने, महंगाई घटने और आम लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार की उम्मीद बढ़ी है।

    हालांकि, विशेषज्ञों ने इन उम्मीदों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है। ईरान के पूर्व केंद्रीय बैंक उप-गवर्नर हैदर मोस्तख्देमीन-हुसैनी ने कहा कि समझौता आर्थिक सुधार के लिए आवश्यक शर्त हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

    विशेषज्ञों के अनुसार समझौते से मिलने वाले अधिकांश आर्थिक लाभ कई शर्तों और भविष्य की वार्ताओं की प्रगति पर निर्भर करेंगे। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि प्रतिबंधों में स्वतः राहत, जब्त धनराशि की तत्काल वापसी या ईरान को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी।

    समझौते के तहत प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण एवं विकास कार्यक्रम को भी प्रत्यक्ष अमेरिकी सहायता के बजाय तीसरे देशों और निजी निवेशकों की संभावित भागीदारी से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका ईरान को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं कराएगा।

    ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती ने कहा कि समझौते में परिसंपत्तियों की रिहाई से जुड़े अमेरिकी दायित्वों का उल्लेख जरूर है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ईरान की समस्याएं केवल प्रतिबंधों तक सीमित नहीं हैं। बजट घाटा, मुद्रा आपूर्ति में तेज वृद्धि, बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरियां, कम उत्पादकता, ऊर्जा संकट, निवेश की कमी और तकनीकी पिछड़ापन जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।

    अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अली गनबरी ने कहा कि यह मान लेना उचित नहीं होगा कि किसी प्रारंभिक समझौते से ईरान की सभी आर्थिक समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि स्थायी आर्थिक विकास के लिए व्यापक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।

    ईरान फिलहाल 80 प्रतिशत से अधिक वार्षिक मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नया समझौता तेल निर्यात बढ़ाने और विदेशी राजस्व तक पहुंच आसान बनाने में मददगार हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए घरेलू सुधारों को प्राथमिकता देना अनिवार्य होगा।