प्रभाग 10 में फेरीवालों से 90 रुपये की कथित अवैध वसूली, ठेकेदार पर FIR की मांग
आर. एस. नेटवर्क। प्रेम चौबे
नालासोपारा: वसई-विरार शहर महानगरपालिका(VVMC) के प्रभाग क्रमांक 10 क्षेत्र में फेरीवालों से प्रति व्यक्ति 90 रुपये की कथित जबरन वसूली का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि यह वसूली ठेकेदार कैलाश यादव के माध्यम से की जा रही है। स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई को अवैध, अन्यायपूर्ण और गरीबों के हक पर डाका बताया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, पहले से ही महंगाई और बेरोजगारी (Unemployed) की मार झेल रहे छोटे फेरीवाले अपनी रोजी-रोटी के लिए सड़कों पर छोटे-मोटे सामान बेचकर परिवार चला रहे हैं। ऐसे समय में प्रति व्यक्ति 90 रुपये की वसूली उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं, तब जो लोग स्व-रोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहे हैं, उनके रास्ते में ही बाधाएं खड़ी की जा रही हैं।
प्रभाग 10 के नगरसेवक किशोर पाटिल ने इस मामले में कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि गरीब फेरीवालों से इस प्रकार की वसूली सीधे तौर पर उनकी आजीविका पर हमला है। “जब देश और प्रदेश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, तब महानगरपालिका को रोजगार सृजन पर ध्यान देना चाहिए, न कि स्व-रोजगार कर रहे लोगों से वसूली कर उन्हें परेशान करना चाहिए,” उन्होंने कहा।
इस संबंध में तुलिंज पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत(Complain) दर्ज कराई गई है। शिकायत में ठेकेदार कैलाश यादव के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। साथ ही यह भी मांग उठाई गई है कि जब तक वसई-विरार शहर महानगरपालिका की महासभा में इस विषय पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उक्त वसूली पूरी तरह बंद रखी जाए।
नगरसेवक किशोर पाटिल ने चेतावनी दी है कि यदि अवैध वसूली (Illegal extortion) पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई, तो क्षेत्र में जनआक्रोश फैल सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फेरीवालों के साथ हो रहे अन्याय को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जरूरत पड़ी तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन भी किया जाएगा।
स्थानीय फेरीवालों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में पहले ही कमाई सीमित है। ऊपर से इस प्रकार की कथित वसूली उनके लिए दोहरी मार साबित हो रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जब महानगरपालिका रोजगार उपलब्ध कराने में असफल साबित हो रही है, तो क्या स्व-रोजगार कर रहे गरीबों को भी चैन से काम करने का अधिकार नहीं है?
मामले ने अब राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया है और देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर आरोप पर क्या कार्रवाई करता है।

