अश्विनी कुमार दुबे
भिवंडी।
भिवंडी-निजामपुर महानगरपालिका में महापौर पद की सियासत(The fight for power) अब बिल्कुल उसी कहावत को चरितार्थ करती दिख रही है, “दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली रोटी ले जाती है।” सत्ता के लिए सेक्युलर फ्रंट की पार्टियां आपस में उलझी हुई हैं और इसी उहापोह के बीच भारतीय जनता पार्टी ‘बिल्ली’ की तरह सही मौके की ताक में बैठी है, ताकि भिवंडी की महापौर कुर्सी चुपचाप अपने पाले में खींच ले जाए।

कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और समाजवादी पार्टी द्वारा गठित ‘भिवंडी सेक्युलर फ्रंट’ संख्या बल के लिहाज से मजबूत जरूर है, लेकिन नेतृत्व और श्रेय को लेकर जारी खींचतान ने उसकी ताकत को कमजोर कर दिया है। महापौर पद पर कांग्रेस का दावा होगा या समाजवादी पार्टी का—इसी सवाल ने फ्रंट को भीतर से बांध रखा है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि कांग्रेस के लिए सत्ता तक पहुंच पाना अब आसान नहीं, बल्कि मुश्किल नजर आ रहा है।

दूसरी ओर भाजपा ने प्रदेश नेतृत्व के निर्देश पर नारायण रतन चौधरी के नाम की घोषणा कर साफ संकेत दे दिया है कि वह किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। भाजपा और शिवसेना के पास फिलहाल 34 पार्षद हैं, जो बहुमत से कम हैं, लेकिन राजनीति में केवल गणित ही सब कुछ नहीं होता। पार्टी के भीतर गुटबाजी और वर्चस्व की जंग के बावजूद भाजपा का पूरा फोकस सेक्युलर फ्रंट की अंदरूनी कमजोरी पर टिका है। यही कमजोरी भाजपा के लिए अवसर बनती जा रही है।
भाजपा के भीतर विधायक महेश चौघुले और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल पाटिल के बीच चल रही खींचतान इसे और दिलचस्प बनाती है। वहीं सुमित पाटिल की दावेदारी ने पार्टी के सामने अनुशासन और रणनीति की परीक्षा खड़ी कर दी है। इसके बावजूद भाजपा की नजर साफ है—यदि विरोधी खेमे आपस में लड़ते रहे, तो सत्ता की ‘रोटी’ उसके हिस्से आ सकती है।
इस पूरे खेल में भिवंडी विकास अघाड़ी, कोणार्क विकास अघाड़ी और निर्दलीय पार्षद मिलकर ‘किंगमेकर’ की भूमिका में हैं। ये पार्षद तय करेंगे कि बंदरों की लड़ाई लंबी चलेगी या बिल्ली बाज़ी मार ले जाएगी। अफसोस की बात यह है कि इस राजनीतिक शतरंज में शहर के विकास का एजेंडा पूरी तरह हाशिए पर चला गया है।
जलापूर्ति, स्वच्छता, यातायात, अवैध निर्माण और उद्योग-व्यापार जैसे बुनियादी सवालों पर चर्चा की जगह सिर्फ कुर्सी की गणना हो रही है। भिवंडी की जनता यह देख रही है कि नेता सत्ता की बाज़ी में उलझे हैं, जबकि शहर को स्थिर नेतृत्व की सख्त जरूरत है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि महापौर कौन बनेगा, बल्कि यह है कि क्या राजनीतिक दल यह समझ पाएंगे कि सत्ता कोई शिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। अगर सेक्युलर फ्रंट आपसी लड़ाई में उलझा रहा, तो भिवंडी की महापौर कुर्सी भाजपा की ‘बिल्ली’ उठा ले जाएगी—और कांग्रेस को सत्ता के सपने से हाथ धोना पड़ सकता है।

