अश्विनी कुमार दुबे
मुंबई। भारतीय जनता पार्टी की वाराणसी जिला इकाई में नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। लंबे समय से फैसले के टलने के पीछे संगठन के भीतर बढ़ती खींचतान और बड़े नेताओं के प्रभाव के चलते उनके प्रतिनिधियों को आगे बढ़ाने की कोशिशों को कारण माना जा रहा है। इससे 25–30 वर्षों से पार्टी के साथ खड़े पुराने कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना गहरी होती दिख रही है।


चार बड़े नेता – चार प्रतिनिधि, बढ़ी खींचतान
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के वर्तमान एमएलसी और जिलाध्यक्ष हंसराज विश्वकर्मा अपने प्रतिनिधि तथा सपा से आए रामप्रकाश सिंह ‘विरु’ को जिलाध्यक्ष बनवाने की तैयारी में लगे हैं।
वहीं, पिंडरा विधायक और कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले डॉ. अवधेश सिंह, अपने करीबी पवन सिंह को दौड़ में सबसे आगे लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
योगी सरकार के प्रभावशाली मंत्री अनिल राजभर की पसंद संजय सिंह बताई जा रही है।
इसके अलावा, पूर्व केंद्रीय मंत्री महेंद्र पांडेय भी अपने करीबी और विवादित भूमि कारोबारी अखंड प्रताप सिंह को अध्यक्ष बनाने की मशक्कत में जुटे हैं।
चार नेताओं के चार अलग-अलग नामों की अनुशंसा ने संगठन में गुटबाजी को तेज कर दिया है, जिससे निर्णय लगातार अटकता जा रहा है।

पुराने कार्यकर्ताओं में बढ़ी उपेक्षा की भावना
जिलाध्यक्ष पद की रेस में पूरी तरह नेताओं के प्रतिनिधियों के शामिल होने से उन समर्पित कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ गई है, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी की जड़ों को सींचा है।
सवाल यह उठ रहा है कि—
क्या भाजपा अपने पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं को फिर से दरकिनार करने जा रही है?
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश तेजी से फैल रहा है कि नेतृत्व केवल शक्ति केंद्रित गुटों और उनके प्रतिनिधियों को तरजीह दे रहा है, जबकि संगठन को जमीन पर मजबूत बनाने वाले पुराने चेहरे पीछे छूटते जा रहे हैं।

मोदी के संसदीय क्षेत्र में पद का महत्व बढ़ा दबाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र होने के कारण वाराणसी जिलाध्यक्ष का पद अत्यंत रणनीतिक माना जाता है।
यही वजह है कि प्रदेश नेतृत्व किसी तरह की चूक नहीं करना चाहता। गुटों को साधने और विवाद को शांत करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अलग-अलग नेताओं के दबाव में निर्णय बार-बार आगे बढ़ता जा रहा है।
जल्द मिल सकता है नया अध्यक्ष, लेकिन कौन?
संगठन सूत्रों का कहना है कि गहन खींचतान के बावजूद जल्द ही जिलाध्यक्ष की घोषणा हो सकती है।
लेकिन बड़ा सवाल जस का तस है—
- क्या पद नेताओं के प्रतिनिधियों को मिलेगा?
- या तीन दशक से पार्टी का झंडा उठाने वाले किसी पुराने चेहरे को मौका मिलेगा?
फिलहाल यह वाराणसी भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली बनी हुई है।

