डबल इंजन सरकार में भी दमघोंटू लापरवाही
डबल इंजन सरकार में भी दमघोंटू लापरवाही

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R. S. Network
मुंबई। केंद्र और राज्य—दोनों जगह भाजपा की “डबल इंजन सरकार” होने के बावजूद मुंबई आज भी धूल प्रदूषण से कराह रही है। हालात इतने बदतर हैं कि बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) द्वारा जारी किए गए सख्त पर्यावरणीय आदेशों का पालन हुआ या नहीं, इसकी जानकारी तक खुद सरकारी महकमों के पास मौजूद नहीं है। यह चौंकाने वाला सच एक आरटीआई आवेदन के जवाब में सामने आया है, जिसने प्रशासनिक लापरवाही की परतें खोल दी हैं।
हाईकोर्ट का आदेश, पर अमल नदारद
पिछले साल मई में बीएमसी के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए सभी निर्माण स्थलों पर वायु गुणवत्ता सेंसर और एलईडी डिस्प्ले लगाना अनिवार्य किया था। नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना और सख्त कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि इन आदेशों का कितना पालन हुआ, कितनी कार्रवाई हुई और कितने बिल्डरों पर जुर्माना लगा—इसका कोई समेकित रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं है।
RTI में सरकारी स्वीकारोक्ति
सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे द्वारा दायर आरटीआई के जवाब में बीएमसी के पर्यावरण विभाग ने स्वीकार किया कि कितने निर्माण स्थलों पर सेंसर लगाए गए, इसकी जानकारी नहीं, नियम तोड़ने वालों पर कितनी कार्रवाई हुई, इसका कोई डेटा नहीं, इस योजना पर कितना सरकारी पैसा खर्च हुआ, इसका भी कोई विवरण उपलब्ध नहीं, इतना ही नहीं, विभाग ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि जानकारी अलग-अलग वार्ड कार्यालयों से मांगी जा सकती है।
सवालों के घेरे में डबल इंजन सरकार
जहां भाजपा बार-बार “डबल इंजन सरकार” के फायदे गिनाती है, वहीं यह मामला दिखाता है कि जिम्मेदारी का इंजन ही गायब है। शहर स्तर पर आदेश जारी होते हैं, लेकिन उसकी निगरानी के लिए न तो कोई केंद्रीय तंत्र है और न ही जवाबदेही तय की गई है।
कार्यकर्ता का सीधा आरोप
जितेंद्र घाडगे ने कहा कि जब सरकार और नगर निगम दोनों भाजपा के नियंत्रण में हैं, तब भी अगर हाईकोर्ट से जुड़े आदेशों की निगरानी नहीं हो रही, तो यह सीधी प्रशासनिक विफलता है। आदेश केवल कागज़ों में रह गए हैं और जनता प्रदूषण की कीमत अपनी सेहत से चुका रही है।”
निर्माण माफिया को खुली छूट?
मुंबई में मेट्रो, कोस्टल रोड, पुनर्विकास परियोजनाओं और ऊंची इमारतों के निर्माण से धूल प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। आरोप है कि सरकारी ढील और निगरानी के अभाव में निर्माण माफिया को खुली छूट मिल रही है, जबकि आम नागरिक सांस की बीमारियों से जूझ रहे हैं।
जनता पूछ रही है सवाल कि जब केंद्र, राज्य और नगर निकाय—तीनों जगह भाजपा का शासन है, तब भी अगर पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दे पर यह हाल है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या डबल इंजन सरकार सिर्फ नारों तक सीमित है, और ज़मीनी स्तर पर सरकारी महकमे बेलगाम हैं?

