मुंबई। राज्य की निचली अदालतों में न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मंजूर किए गए 2,800 से अधिक नए न्यायिक अधिकारियों की भर्ती को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट(Bombay High Court) ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि नागरिकों को तेज़ और प्रभावी न्याय देना है, तो राज्य सरकार के साथ-साथ हाईकोर्ट प्रशासन को भी तत्काल और ठोस कदम उठाने होंगे। इसी क्रम में हाईकोर्ट प्रशासन को भर्ती प्रक्रिया की विस्तृत ‘ब्लूप्रिंट’ योजना अदालत के सामने पेश करने को कहा गया है।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल की खंडपीठ ने कहा कि अदालत को इस बात की पूरी समझ है कि न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया किसी निश्चित समय-सीमा में बांधना आसान नहीं है। लेकिन ‘तेज़ न्याय’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन और विधि एवं न्याय विभाग से त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह पूरी भर्ती प्रक्रिया हाईकोर्ट और महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग (MPSC) के माध्यम से प्रभावी ढंग से लागू की जानी चाहिए।
याचिका में क्या है मामला
ये निर्देश वैजनाथ वझे द्वारा दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिए गए। याचिका में राज्य की न्याय व्यवस्था में लंबे समय से खाली पड़े पदों का मुद्दा उठाते हुए उन्हें तत्काल भरने की मांग की गई है। इससे पहले की सुनवाई में अतिरिक्त सरकारी वकील प्रियभूषण काकड़े ने अदालत को 6 फरवरी 2024 के सरकारी निर्णय की जानकारी दी थी। इसके अनुसार राज्य में 2,863 न्यायिक अधिकारियों के पदों को मंजूरी दी गई है। साथ ही 1,164 न्यायालयीन कर्मचारियों और 5,803 संविदा कर्मियों के नए पद भी सृजित किए गए हैं।
भर्ती प्रक्रिया समय लेने वाली
28 जनवरी की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने रिक्त पदों की ओर ध्यान दिलाते हुए तत्काल भर्ती की मांग की थी। इस पर खंडपीठ ने कहा कि भले ही पदों को मंजूरी मिल चुकी हो, लेकिन उनकी भर्ती महाराष्ट्र न्यायिक सेवा नियम, 2008 के अनुसार ही करनी होगी। नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया में उम्मीदवारों की पात्रता और योग्यता का मूल्यांकन जरूरी होता है, जिससे यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से समय लेने वाली बन जाती है।
हालांकि, अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि नई मंजूरियों के बाद भर्ती को किस तरह अंजाम दिया जाएगा, इसका विस्तृत और व्यावहारिक ब्लूप्रिंट पेश करना अनिवार्य है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख को न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

