जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में करीब 32 वर्षों से प्रैक्टिस कर रहीं एक महिला अधिवक्ता को नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) के लिए की गई पैरवी की प्रोफेशनल फीस आखिरकार राज्य सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई के 15 साल बाद मिल गई। मामला कुल 84 याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें उन्होंने बतौर सरकारी वकील पेश होकर पैरवी की थी।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता को वर्ष 2010 में NRHM द्वारा 84 याचिकाओं के एक समूह में पेश होने के लिए नियुक्त किया गया था। इन सभी मामलों का निस्तारण हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 में कर दिया। इसके बाद अधिवक्ता ने अपनी प्रोफेशनल सेवाओं के एवज में 4.25 लाख रुपये का बिल संबंधित विभाग को भेजा, लेकिन भुगतान वर्षों तक लंबित रहा।
बताया गया कि वर्ष 2019 तक फीस का भुगतान नहीं होने पर अधिवक्ता ने तत्कालीन प्रोजेक्ट डायरेक्टर, NRHM को कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। मजबूरन, भुगतान दिलाने के लिए राज्य सरकार के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
याचिका दायर होने के लगभग सात साल बाद, संबंधित प्रोजेक्ट डायरेक्टर, NRHM की ओर से कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया गया, जिसमें यह जानकारी दी गई कि याचिकाकर्ता अधिवक्ता को उनकी प्रोफेशनल फीस के रूप में 4.25 लाख रुपये का चेक जारी कर दिया गया है।
हलफनामे और भुगतान की पुष्टि के बाद अधिवक्ता की ओर से याचिका वापस लेने का आवेदन पेश किया गया, जिसे जस्टिस गणेश राम मीना की एकलपीठ ने स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही यह लंबे समय से चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया।
यह मामला सरकारी विभागों में लंबित भुगतानों और अधिवक्ताओं को समय पर फीस न मिलने की समस्या को एक बार फिर उजागर करता है।

