गुरुग्राम: रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड(Richa Industries) से जुड़े बड़े बैंक फ्रॉड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गुरुग्राम जोनल टीम ने कंपनी के पूर्व प्रमोटर और सस्पेंडेड मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप गुप्ता को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें ED की कस्टडी में 8 दिन के लिए भेजा गया।
236 करोड़ का चूना, फर्जी बिलिंग का खेल:
ED की जांच में सामने आया है कि संदीप गुप्ता ने 2015 से 2018 के बीच जानबूझकर बिना माल सप्लाई किए फर्जी बिक्री दिखाकर सार्वजनिक बैंकों को 236 करोड़ रुपए का नुकसान पहुँचाया। इसमें कॉटन फैब्रिक सेल 7.42 करोड़ और सोलर संबंधित फर्जी बिक्री 8.50 करोड़ की पाई गई। फर्जी लेन-देन के लिए कई शेल कंपनियों का सहारा लिया गया और इनवॉइस व अकाउंट बुक्स में हेराफेरी की गई।
फर्जी खरीद और लोन का घोटाला:
कंपनी ने ZLD प्लांट और मशीनरी की 9.23 करोड़ की फर्जी खरीद दिखाई, जबकि FY 2015-16 से 2017-18 के बीच 16.40 करोड़ रुपये ग्रुप कंपनियों में लोन रीपेमेंट के नाम पर घुमाए गए। FY 2018-19 में RIL के पैसों से रिचा कृष्णा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड में controlling stake खरीदकर अहम प्रोजेक्ट को बाहर ले जाया गया।
संपत्तियों में हेरफेर, CIRP प्रभावित:
ED ने आरोप लगाया कि CIRP शुरू होने से ठीक पहले संदीप गुप्ता ने कंपनी की कीमती संपत्तियों को डायवर्ट करने में भूमिका निभाई। इसके लिए कई शेल कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। दिसंबर 2018 में CIRP शुरू हुआ, लेकिन कोई रिज़ॉल्यूशन प्लान पास नहीं हो सका। 11 जून 2025 को NCLT ने कंपनी को लिक्विडेशन में डाल दिया।
बैंकों को भारी नुकसान, रिजर्व प्राइस पर बेची गई कंपनी:
16 अक्टूबर 2025 को कंपनी को ई-ऑक्शन में 96 करोड़ के रिजर्व प्राइस पर बेचा गया। इससे IOB और यूनियन बैंक जैसे पब्लिक सेक्टर बैंकों को 696 करोड़ के दावों के बदले मात्र 40.29 करोड़ मिले, यानी लगभग 94% का हेयरकट झेलना पड़ा।
कोरपोरेट गारंटी और शेल कंपनियों का इस्तेमाल:
ED की जांच में खुलासा हुआ कि CIRP शुरू होने से पहले रिचा इंडस्ट्रीज़ ने छह कंपनियों को 232 करोड़ से ज्यादा की कॉरपोरेट गारंटी दी, जिनमें CoC में करीब 48.25% वोटिंग राइट्स थे। संदीप गुप्ता ने शेल कंपनी सारिगा कंस्ट्रक्शन प्रा. लिमिटेड बनाई, जिसमें पूर्व कर्मचारी नेहा सिंह को बेनामी डायरेक्टर बनाया गया।
ED की जांच जारी:
ED ने आरोप लगाया कि CIRP के दौरान संदीप गुप्ता और उनके परिवार ने गैरकानूनी तरीके से कंपनी पर कंट्रोल बनाए रखा, एग्रीमेंट किए और सैलरी भी ली। CIRP शुरू होने से पहले मसूरी के एक बड़े प्रोजेक्ट को प्रमोटर से जुड़ी कंपनी को सब-कॉन्ट्रैक्ट दे दिया गया, जिससे करीब 40 करोड़ रुपये बाहर चले गए।

