निजी अंग पकड़ना, पायजामे का नाड़ा खींचना ‘बलात्कार का प्रयास’?, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विवादास्पद आदेश को किया रद्द
नई दिल्ली – उच्चतम न्यायालय(Supreme Court) ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक विवादास्पद आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना ‘‘बलात्कार का प्रयास’’ माना जाएगा, न कि केवल ‘‘तैयारी’’।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारी की पीठ ने कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से गलत प्रयोग किया गया था, इसलिए उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया जाना आवश्यक है।
🔎 क्या था मामला?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने 17 मार्च, 2025 के आदेश में कहा था कि स्तन पकड़ना और पायजामे की डोरी खींचना बलात्कार का अपराध नहीं, बल्कि केवल उसकी तैयारी है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 10 फरवरी को सुनवाई की।
शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि आरोपी व्यक्तियों ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के तहत अपराध करने के पूर्व निर्धारित इरादे से कार्य किया।
📜 पीओसीएसओ के तहत बहाल हुआ आरोप
सर्वोच्च न्यायालय(Supreme Court) ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दो आरोपियों के खिलाफ ‘‘बलात्कार के प्रयास’’ का गंभीर आरोप बहाल कर दिया। साथ ही विशेष न्यायाधीश (पीओसीएसओ), कासगंज द्वारा 23 जून, 2023 को पारित मूल समन आदेश को भी बहाल कर दिया गया।
पीठ ने कहा:
“आरोपी व्यक्तियों द्वारा किया गया प्रयास स्पष्ट रूप से इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष द्वारा बलात्कार के प्रयास के प्रावधानों को लागू करने का मामला बनता है। अतः विवादित निर्णय को रद्द किया जाता है।”
इस फैसले को यौन अपराधों के मामलों में ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

