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Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर दान गबन मामले की सुनवाई जल्द करने किया इनकार!

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Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित वित्तीय अनियमितताओं और हेराफेरी की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग को लेकर पेश जनहित याचिका पर सोमवार को जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

याचिका में मंदिर कोष से जुड़े सभी भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय रिकॉर्ड को तुरंत सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गयी है।न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की अवकाशकालीन पीठ ने अधिवक्ता एन. के. गोस्वामी के जल्द सुनवाई के लिए जनहित याचिका का उल्लेख किये जाने पर कहा कि इस मामले पर उचित समय पर विचार किया जायेगा।

पीठ ने याचिकाकर्ताओं को याचिका की एक प्रति रजिस्ट्री को सौंपने का निर्देश दिया। उल्लेख के दौरान वकील ने दलील दी कि ऐसी आशंका है कि जब तक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के निर्देश जारी नहीं किये जाते, तब तक उनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है।

अधिवक्ता अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव की ओर से दायर इस याचिका में राम मंदिर निर्माण के लिए जनता से मिले दान में गबन, हेराफेरी और दुरुपयोग के आरोपों की सीबीआई द्वारा एक नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने के निर्देश देने की मांग की गयी है।

याचिका पर विचार लंबित रहने तक, इसमें दान रजिस्टर, खाता बही, सीसीटीवी फुटेज, बैंक रिकॉर्ड और सॉफ्टवेयर डेटाबेस सहित सभी भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गयी है, ताकि उनके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की आशंका को दूर किया जा सके।

याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हालांकि इन आरोपों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है, लेकिन जांच बिना प्राथमिकी दर्ज किए शुरू हुई है, जिससे इसके निष्कर्षों को चुनौती दी जा सकती है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, एसआईटी के पास जटिल वित्तीय लेन-देन और डिजिटल साक्ष्यों से जुड़े आरोपों की जांच के लिए आवश्यक फोरेंसिक विशेषज्ञता और खोजी संसाधनों की भी कमी है।

एक पुराने उदाहरण का हवाला देते हुए, याचिका में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम से जुड़े कथित मिलावटी घी विवाद की जांच का संदर्भ दिया गया है, जहां सीबीआई के नेतृत्व में एक बहुविषय एसआईटी का गठन किया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान मामले की जांच के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था की आवश्यकता है।

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