अमेरिका के टैरिफ को लेकर पहले बजट पर बड़े पैमाने पर चर्चाएँ होती थीं और उसे विस्तार से समझाया जाता था, लेकिन अब बजट ही निरर्थक होता जा रहा है। बजट को लेकर जनता में उत्सुकता समाप्त हो चुकी है, और यह स्थिति अत्यंत निराशाजनक व चिंताजनक है। राहुल गांधी ने यह स्पष्ट किया कि बजट का “हलवा” किस सामाजिक वर्ग को मिलता है, यह सामाजिक न्याय पर की गई एक सटीक टिप्पणी थी। लेकिन आज बजट से सामाजिक न्याय की भूमिका पूरी तरह गायब हो चुकी है और यह केवल पैसे फेंकने का तमाशा बनकर रह गया है, ऐसा महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा।
तिलक भवन में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल की अध्यक्षता में बजट पर विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा में अर्थशास्त्री अजित जोशी, संजीव चांदोरकर, एस. नागराजन, विश्वास उटगी तथा पूर्व सांसद कुमार केतकर ने भाग लिया।
इस अवसर पर सपकाल ने कहा कि बजट के माध्यम से देश की वार्षिक प्रगति और आम नागरिक के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से न तो सरकार और न ही आम जनता बजट को लेकर गंभीर दिखाई देती है। यदि हम अर्थव्यवस्था को इसी प्रकार उदासीनता से देखते रहे, तो समय हमें माफ़ नहीं करेगा। किसान और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर आंदोलन होते रहे हैं, और अब ऐसा लगता है कि बजट पर भी आंदोलन करने की नौबत आ सकती है। पहले ग्रामीण नेतृत्व की प्रशासन और नीति निर्धारण में मज़बूत भूमिका होती थी, जिससे सामाजिक न्याय बना रहता था, लेकिन अब यह स्थिति पूरी तरह बदल गई है। डॉ. मनमोहन सिंह के बाद देश की दिशा बदल गई और नई तरह की शक्तियाँ प्रभावी हो गईं। ग्रामीण और बहुजन वर्ग की पकड़ कमज़ोर हुई और उसकी जगह दलालों का वर्चस्व बढ़ता गया, यह अत्यंत चिंताजनक है।
हाल ही में संपन्न नगरपालिका और महानगरपालिका चुनावों में भारी धनबल और गुंडागर्दी का प्रयोग किया गया। दलालों द्वारा खुलेआम खर्च किए गए इस धन के गंभीर परिणाम क्या होंगे, इसका किसी को अंदाज़ा नहीं है। आज देश का हर नागरिक असुरक्षा और भय की स्थिति में है। जो भरोसे का चेहरा दिखाया गया था, वह भी अब गायब है। नीतियाँ स्पष्ट नहीं हैं। देश की मौजूदा परिस्थितियाँ किसी विस्फोटक स्थिति की ओर इशारा कर रही हैं, जो किसी भी समय ज्वालामुखी की तरह फूट सकती हैं, ऐसी आशंका सपकाल ने व्यक्त की।
अर्थशास्त्री संजीव चांदोरकर ने कहा कि बजट में वित्तीय संसाधनों और उनके वितरण की रूपरेखा प्रस्तुत की जाती है। मोदी सरकार के 11 वर्षों के कार्यकाल को देखते हुए इस बजट को केवल एक वर्ष का बजट मानकर नहीं देखा जा सकता। इन 11 वर्षों में सरकार की आर्थिक नीतियों में एक स्पष्ट निरंतरता रही है। इसलिए किसी एक बजट के बजाय पूरे आर्थिक मॉडल को समग्रता में समझना आवश्यक है। पिछले वर्ष अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद उसके वैश्विक प्रभाव भारत पर भी दिखाई देने लगे हैं। जो पिछले 40 वर्षों में दुनिया में नहीं हुआ, वह अब घटित हो रहा है, और यह केवल शुरुआत है।
अनिश्चितता के इस दौर में अर्थव्यवस्था को अधिक मज़बूत और लचीला बनाना आवश्यक है, ताकि किसी भी वैश्विक झटके का न्यूनतम प्रभाव पड़े। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था को व्यापक बनाने के प्रयास नाकाफ़ी रहे हैं। बजट में कृषि की पूरी तरह उपेक्षा की गई है। कृषि का जीडीपी में योगदान घटकर 15 प्रतिशत रह गया है, जबकि कोरोना काल में कृषि ने पूरे देश को संभाला। कर सुधारों की अनदेखी हो रही है। कर्ज़ का बोझ लगातार बढ़ रहा है — केवल कर्ज़ चुकाने के लिए ही 19 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। कर्ज़ लेकर कर्ज़ चुकाने की यह नीति ख़तरनाक है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बातें तो की जा रही हैं, लेकिन उसके लिए अमीरों पर कर लगाने, संसाधनों की पुनर्वितरण नीति अपनाने और आर्थिक समानता बढ़ाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती।
प्रशांत गावंडे ने कहा कि केंद्रीय बजट में किसान पूरी तरह गायब है और मुख्यधारा के मीडिया ने भी इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया है। कृषि अनुसंधान, तकनीक और निवेश के लिए बजट में अत्यंत नगण्य प्रावधान किए गए हैं। सोयाबीन, कपास, ज्वार, बाजरा, सरसों और गन्ना जैसी प्रमुख फसलों की अनदेखी की गई है। देश में 550 चीनी मिलें हैं, जिनमें से अधिकांश घाटे में हैं, जबकि करोड़ों किसान इन पर निर्भर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक जमा घट रही हैं, जो गंभीर चेतावनी है। भारत में 92 प्रतिशत किसान छोटे और मध्यम हैं, जिनके पास 2 से 8 एकड़ भूमि है, जबकि अमेरिका में ‘छोटे’ किसान के पास भी कम से कम 2,000 एकड़ भूमि होती है। ऐसी असमान प्रतिस्पर्धा में भारत सरकार का मज़बूत समर्थन आवश्यक है, जो पूरी तरह अनुपस्थित है। सरकार की मौजूदा कृषि नीति से किसानों की आत्महत्याएँ बढ़ने की आशंका है।

