कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी पारा चढ़ने लगा है। चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) को झटका देते हुए उत्तर बंगाल के कर्सियोंग से विधायक विष्णु प्रसाद शर्मा ने पार्टी छोड़कर All India Trinamool Congress (टीएमसी) का दामन थाम लिया है। इस बात की जानकारी टीएमसी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के जरिए साझा की गई।

ममता बनर्जी के नेतृत्व पर जताया भरोसा
टीएमसी ने अपने बयान में कहा कि शर्मा का मानना है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही बंगाल का समावेशी विकास संभव है। उन्होंने विश्वास जताया कि वह अब ममता बनर्जी की अगुवाई में राज्य की जनता की सेवा करेंगे। पार्टी ने उनका “तहे दिल से स्वागत” करते हुए कहा कि उनके शामिल होने से संगठन की ताकत बढ़ेगी और जनहित के कार्यों को गति मिलेगी।
पहले भी जताया था असंतोष
गौरतलब है कि शर्मा ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा से बगावत कर दी थी। उन्होंने दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। उस समय उन्होंने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग का समर्थन करते हुए कहा था कि दार्जिलिंग पहाड़ियों के विकास और विशेष ध्यान की आवश्यकता है।
शर्मा ने कई बार सार्वजनिक रूप से भाजपा नेतृत्व पर क्षेत्रीय मांगों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि पार्टी ने आश्वासन तो दिए, लेकिन जमीनी स्तर पर वादे पूरे नहीं किए।
भाजपा की प्रतिक्रिया
पश्चिम बंगाल विधानसभा में भाजपा के मुख्य सचेतक शंकर घोष ने दावा किया कि शर्मा का अपने निर्वाचन क्षेत्र में कोई खास जनाधार नहीं है और वह लंबे समय से पार्टी के संपर्क में भी नहीं थे। भाजपा ने इस घटनाक्रम को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है।
चुनावी समीकरण पर असर?
पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा का कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है। चुनाव की घोषणा मार्च के दूसरे या तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है, जबकि अप्रैल में सभी सीटों पर मतदान कराया जा सकता है। ऐसे में चुनाव से पहले भाजपा विधायक का टीएमसी में शामिल होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
टीएमसी ने यह भी बताया कि ब्रात्य बसु और डॉ शशि पांजा की मौजूदगी में शर्मा ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो भी साझा किया गया है।
बंगाल की सियासत में यह दलबदल आगामी चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना सकता है। अब देखना होगा कि इस कदम का उत्तर बंगाल और दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र की राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ता है।

