वाराणसी। ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद(Amukteshwaranand) सरस्वती से जुड़े बहुचर्चित प्रकरण में सोमवार को घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। केदारघाट स्थित श्रीविद्या मठ में आयोजित प्रेस वार्ता में रमाशंकर दीक्षित नामक व्यक्ति ने दावा किया कि उन पर उनकी नाबालिग बेटी के नाम का सहारा लेकर शंकराचार्य पर गंभीर आरोप लगाने के लिए दबाव बनाया गया।

दीक्षित के अनुसार, उन्हें कथित रूप से आर्थिक प्रलोभन दिया गया ताकि वे लिखित शिकायत देकर मामला दर्ज कराएं। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव को ठुकराने के बाद उन्हें अप्रत्यक्ष धमकियों का सामना करना पड़ा। दीक्षित ने पूरी घटना को लिखित रूप में अपने हस्ताक्षर सहित मठ प्रशासन को सौंपने और मीडिया के सामने रखने की बात कही।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी प्रयागराज जिला न्यायालय में पेश हुए। सुनवाई के दौरान पॉक्सो अधिनियम के तहत कार्रवाई के पहलुओं पर चर्चा हुई। सूत्रों के मुताबिक अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में शिकायत और गवाहों की विश्वसनीयता की गहन जांच अनिवार्य है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं या गवाह बयान से पलटता है, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी विधिक कार्रवाई संभव है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायालय ने निष्पक्ष और तथ्यपरक जांच पर जोर दिया है। फिलहाल सभी पक्ष आगामी सुनवाई और जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।
संपादकीय दृष्टि से यह प्रकरण कानून-प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है। ऐसे मामलों में राजनीतिक बयानबाजी से परे रहकर पारदर्शी और समयबद्ध जांच आवश्यक है, ताकि न तो किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा पर आंच आए और न ही वास्तविक शिकायत दबे। कानून के समक्ष सभी समान हैं—और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।

