नई दिल्ली। मौत की सजा देने के पारंपरिक तरीके ‘फांसी’ को लेकर उठे संवैधानिक और मानवीय सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत में दाखिल जनहित याचिका में फांसी को क्रूर, अमानवीय और पीड़ादायक बताते हुए इसकी जगह लीथल इंजेक्शन, इलेक्ट्रिक चेयर या गोली मारने जैसे वैकल्पिक तरीकों को अपनाने की मांग की गई है।
यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दाखिल की गई है, जिसमें कहा गया है कि फांसी देने की प्रक्रिया में दोषी को लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित गरिमामय जीवन और मृत्यु के अधिकार के खिलाफ है। याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि कम से कम दोषी को यह विकल्प दिया जाए कि वह फांसी चाहता है या घातक इंजेक्शन के जरिए मृत्यु।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर विचार के लिए एक समिति का गठन किया गया है, जो मौत की सजा के वैकल्पिक तरीकों का अध्ययन कर रही है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल फांसी को ही सबसे तेज और सुरक्षित तरीका माना जाता है और उसे बदलने के पक्ष में केंद्र नहीं है।
केंद्र के इस रुख पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि समय के साथ कानून और प्रक्रियाओं में बदलाव आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान एक जीवंत और मानवीय दस्तावेज है, जिसमें सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार भी निहित होना चाहिए।
गौरतलब है कि यह याचिका वर्ष 2017 में दाखिल की गई थी और तब से इस पर कई चरणों में सुनवाई हो चुकी है। अदालत ने याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार दोनों को तीन सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दुनिया के कई देशों ने फांसी को समाप्त कर लीथल इंजेक्शन जैसे तरीकों को अपनाया है, जबकि भारत में अब भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत मौत की सजा का एकमात्र तरीका फांसी ही है। सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला न केवल कानूनी बल्कि नैतिक और मानवीय दृष्टि से भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

