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  • Ghazal: चुप-चुप क्यों रहते हो तुम

    Ghazal: चुप-चुप क्यों रहते हो तुम

    चुप-चुप क्यों रहते हो तुम
    क्यों दर्द इतना सहते हो तुम
    ख़ामोशी के साये में क्यों
    खुद को तुम रखते हो गुम
    आखिर क्या मजबूरी है
    क्यों दर्द को सहना ज़रूरी है
    जीवन के सूनेपन की ये
    कैसी कथा अधूरी है ?
    दिल में तुम तड़पोगे कब तक
    उलझन से निकले न अब तक
    भंवर जाल में फंसे हुए हो
    देख रहा है ये सारा जग
    लब तक अपने आने दो
    सारी परतें खुल जाने दो
    जो शिकवे गिले थे उन सबको
    ऑंसु में बह जाने दो
    अच्छा साथ निभाया है
    दिल को भी समझाया है
    मुस्कान तुम्हारे होंठों की
    क्यों फूलों सा मुरझाया है ?
    कलियों सा खिलना सीखो
    भौरों सा फिरना सीखो
    अरमानों के पंख लगाकर
    पक्षी सा उड़ना सीखो
    अच्छी नहीं तन्हाई है मिलना
    नियामत-ए-खुदाई है
    दिल का हाल सुनाने वाला
    ही सच्चा सौदाई है
    नीर कहे नहीं गुमसुम रहना
    जीवन को तुम खुश रह जीना
    खुशियां बाॅंटो और बढ़ेंगी
    जग को भी तुम खुश कर देना

    संजीव कुमार घोष (नीर)

  • Ghazal: वो मेरी चालाकियों पर मुस्कुरा कर रह गया…….

    Ghazal: वो मेरी चालाकियों पर मुस्कुरा कर रह गया…….

    वो मेरी चालाकियों पर मुस्कुरा कर रह गया
    और कुछ बोले बिना ही बात सारी कह गयाI(Ghazal)

    स्वप्न जो उसने बुने थे सारे आलम के लिए
    जंग के उन्माद में कैसे कहाँ सब ढह गया

    उसने तो चाहा नहीं था पर यकायक एक दिन
    ढाई आखर जो दबा रक्खा था दिल में कह गया

    ज़िन्दगी तूफ़ान से लड़ कर गुज़ारी इसलिए
    दोस्तों ने दीं थीं जो पीड़ाएँ वो भी सह गया

    प्रश्न विचलित कर रहे थे पर नहीं उत्तर मिला
    अपनी पीड़ाओं को सहते एक दिन वह दह गया

    दूर ही हरदम रहा वो जश्न के माहौल से
    जंग है हक़ के लिए ये सोच कर ही वह गया

    किशन तिवारी
    भोपाल