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Genetic Risk Protection: बच्चों को Diabetes से कैसे रखें दूर? जानें 5 आसान तरीके

Vidya Dubey
Last updated: May 4, 2026 5:14 pm
Vidya Dubey
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6 Min Read
Genetic Risk Protection
Genetic Risk Protection
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Genetic Risk Protection: जब माता-पिता से ऐसे जीन बच्चों में ट्रांसफर होते हैं, जो शरीर की इंसुलिन प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं, तो इसे जेनेटिक डायबिटीज कहा जाता है।

⚠️ डायबिटीज के प्रमुख कारण
इंसुलिन रेजिस्टेंस (शरीर इंसुलिन को सही से इस्तेमाल नहीं करता)
बीटा सेल्स का सही से काम न करना
अनहेल्दी लाइफस्टाइल (जंक फूड, मोटापा, तनाव)
🚨 लक्षण जिन पर रखें नजर
बार-बार प्यास लगना
बार-बार पेशाब आना
अचानक वजन कम होना
थकान और कमजोरी
घाव देर से भरना
त्वचा का काला पड़ना

संबंधित खबरें-Summer Skin Care: Parlor जाने की जरूरत नहीं! ये घरेलू नुस्खा देगा चेहरे को Natural Glow

टाइप 1 डायबिटीज (Genetic Risk Protection)
टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। अगर पुरुष को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे को डायबिटीज होने की संभावना 17 में से 1 होती है। वहीं अगर मां को टाइप 1 डायबिटीज है और बच्चे का जन्म 25 साल से पहले हुआ है, तो उन बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज का खतरा 25 में से 1 है। वहीं अगर बच्चे का जन्म 25 साल की उम्र के बाद हुआ, तो उनके बच्चों में इस डायबिटीज का खतरा 100 में से 1 है।

टाइप 2 डायबिटीज
यह जीन और लाइफस्टाइल के मिश्रण से होने वाली समस्या है। अगर फैमिली में पहले से किसी को टाइप 2 डायबिटीज है, तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि आपकी डायबिटीज लाइफस्टाइल की वजह से है या फिर जेनेटिक्स की वजह से है।

जेनेटिक डायबिटीज की वजह
इंसुलिन रेजिस्टेंस

जब पेरेंट्स से ऐसे जीन मिलते हैं, जोकि बॉडी को इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करने देते हैं। तो टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। जब हमारे सेल्स इंसुलिन की बात मानना बंद कर देते हैं, जिसको हम इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं। इससे हमारे ब्लड में शुगर का लेवल बढ़ने लगता है।

बीटा सेल डिस्फंक्शन
बता दें कि पैनक्रियाज वह अंग है, जिसमें बीटा सेल्स होती हैं। इसका काम इंसुलिन हार्मोन प्रोड्यूस करना होता है। इंसुलिन का काम ब्लड से शुगर यानी ग्लूकोज को निकालकर बॉडी की सेल्स तक पहुंचाना है। जिससे हमको एनर्जी मिल सके। इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण पैनक्रियाज बीटा सेल्स नहीं बना पाती है। ऐसे में भी डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।

लक्षण
आंखों की रोशनी में अचानक बदलाव होना।
घाव भरने में अधिक समय लगना।
बहुत ज्यादा प्यास लगना।
बिना कारण वजन घटना
बार-बार पेशाब आना।
त्वचा का काला पड़ना।
थकान और कमजोरी।

टाइप 2 और प्री-डायबिटीज के लिए टेस्ट
एचबीए1सी टेस्ट

एचबीए1सी टेस्ट के जरिए पिछले 2 से 3 महीनों का औसत शुगर लेवल का पता लगाया जा सकता है। बच्चों में डायबिटीज का पता लगाने के लिए यह सबसे आसान टेस्ट है। क्योंकि इस टेस्ट के लिए बच्चे को भूखे रहने की भी जरूरत नहीं है।

फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज
सुबह खाली पेट यह टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट से पहले आमतौर पर बच्चे को कम से कम 8 से 10 घंटे तक भूखे रहना होता है। इस दौरान बच्चा सिर्फ पानी पी सकता है। यह प्री-डायबिटीज और डायबिटीज का पता लगाने का आसान तरीका है।

ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट
इसमें ग्लूकोज वाला पानी पिलाया जाता है। फिर उसको 2 घंटे बाद शुगर लेवल चेक किया जाता है। ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट से पता चलता है कि बॉडी किस तरह से शुगर को हैंडल कर रहा है।

पेरेंट्स बच्चे को ऐसे डायबिटीज से बचाएं
हेल्दी डाइट

अगर माता-पिता को डायबिटीज है, तो उनको अपने बच्चे की डाइट का खास ख्याल रखना चाहिए। बच्चे को प्रोसेस्ड फूड और चीनी जैसे- पैकेट बंद जूस, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स और चॉकलेट्स बहुत कम मात्रा में दें।बच्चों में डाइट मुख्य रूप से जेनेटिक डायबिटीज को ट्रिगर करती है। जोकि आनुवांशिक रूप से संवेदनशील बच्चों में ऑटोइम्यूनिटी के लिए एक एंवायरमेंट फैक्टर्स के रूप में काम करती हैं। या फिर इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। पेरेंट्स को बच्चों की डाइट में फाइबर की मात्रा को बढ़ाना चाहिए। वहीं उनकी डाइट में सलाद और हरी पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करें।

कम करें स्क्रीन टाइम
आज के समय में बच्चों का स्क्रीन टाइम काफी बढ़ गया है। कई बच्चे घंटों तक मोबाइल पर समय बिताते हैं। जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम होता है, टाइप 2 डायबिटीज का खतरा उतना बढ़ जाता है। क्योंकि स्क्रीन टाइम के समय बच्चे निष्क्रिय बैठते हैं, जिससे मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल कम करती हैं। इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ने लगता है। अक्सर स्क्रीन देखते हुए बच्चे अनहेल्दी स्नैक्स का भी सेवन कर बैठते हैं। जिससे मोटापे का खतरा बढ़ता है। इसलिए पेरेंट्स को चाहिए कि बच्चे का स्क्रीन टाइम कम करें।

फिजिकल एक्टिविटी
कम से कम 60 मिनट तक बच्चे को पसीने वाली फिजिकल एक्टिविटी जैसे बैडमिंटन, फुटबॉल, रनिंग या स्विमिंग करने के लिए मोटिवेट करना चाहिए। इससे बच्चा शारीरिक रूप से सक्रिय होता है और मोटापा नहीं बढ़ता है। वहीं मेटाबॉलिज्म भी ठीक तरह से काम करता है। इससे डायबिटीज के खतरे को भी कम किया जा सकता है।

वजन कंट्रोल
माता-पिता के लिए जरूरी है कि वह अपने बच्चे का वेट कंट्रोल में रखने की कोशिश करें। एक रिपोर्ट के मुताबिक मोटापा बच्चों में इंसुलिन रिजेस्टेंस पैदा करके टाइप 2 डायबिटीज की वजह बनता है।

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