नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलवायु क्षेत्रों में से एक ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर तेजी से गर्म हो रहा है। अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के समुद्री सतह तापमान के ताजा आंकड़ों से संकेत मिले हैं कि वर्ष 2026 में प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान पिछले साल की तुलना में काफी अधिक दर्ज किया गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार नीनो 3.4 क्षेत्र मध्य प्रशांत महासागर का वह हिस्सा है, जहां समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव के आधार पर अल नीनो और ला नीना जैसी वैश्विक जलवायु घटनाओं की निगरानी की जाती है।
2026 में समुद्र का तापमान 2025 से काफी अधिक (El-Nino Impact Pacific Ocean Temperature rise)
NOAA के आंकड़ों के मुताबिक 1 जून से 4 जुलाई 2026 के बीच नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान लगातार वर्ष 2025 की इसी अवधि से अधिक रहा।
- 1 जून 2026: तापमान 28.90 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
- 4 जुलाई 2026: तापमान बढ़कर 29.23 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया।
वहीं, वर्ष 2025 में इसी अवधि के दौरान तापमान 27.84 डिग्री सेल्सियस से घटकर 27.59 डिग्री सेल्सियस तक आ गया था।
आंकड़ों के अनुसार 2026 में 1 जून को तापमान का अंतर 1.06 डिग्री सेल्सियस था, जो 4 जुलाई तक बढ़कर 1.64 डिग्री सेल्सियस हो गया। यानी करीब 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
लगातार 29 डिग्री से ऊपर तापमान वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय
2026 में नीनो 3.4 क्षेत्र में तापमान लगातार 29 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना हुआ है। वैज्ञानिक इसे गंभीर संकेत मान रहे हैं, क्योंकि गर्म समुद्री सतह वातावरण में अधिक गर्मी और नमी छोड़ती है।
इसका असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दुनिया के कई हिस्सों में:
- बारिश के पैटर्न,
- हवा के प्रवाह,
- मानसून प्रणाली,
- सूखे और गर्मी की स्थिति
को प्रभावित कर सकता है।
इस साल 19 जून को नीनो 3.4 क्षेत्र का अधिकतम तापमान 29.41 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि न्यूनतम तापमान 1 जून को 28.90 डिग्री सेल्सियस रहा।
भारत के मानसून पर पड़ सकता है असर
प्रशांत महासागर में बढ़ता तापमान भारत के लिए चिंता का कारण बन सकता है। भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। मानसून देश की सालाना बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराता है।
अल नीनो की स्थिति मजबूत होने पर अक्सर भारत में:
- सामान्य से कम बारिश,
- लंबे समय तक गर्मी,
- सूखे जैसे हालात,
- बारिश के असमान वितरण
का खतरा बढ़ जाता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून पर केवल अल नीनो का ही असर नहीं पड़ता। इंडियन ओशन डाइपोल (IOD), स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य समुद्री परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
IMD ने जुलाई में कम बारिश का जताया अनुमान
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पहले ही जुलाई महीने में सामान्य से कम बारिश की संभावना जता चुका है। विभाग के अनुसार इक्वेटोरियल पैसिफिक क्षेत्र में अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है।
यह अनुमान ऐसे समय में आया है जब भारत ने 1901 के बाद से जून महीने में सबसे कम बारिश वाले वर्षों में से एक का अनुभव किया है। कई राज्यों में मानसून की रफ्तार धीमी रही, जिसके कारण:
- खेती प्रभावित हुई,
- जलाशयों में पानी की कमी बढ़ी,
- गर्मी का असर लंबे समय तक बना रहा।
सरकार ने तैयारियों के दिए निर्देश
मानसून की संभावित कमी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबंधित मंत्रालयों को आकस्मिक योजनाएं तैयार रखने के निर्देश दिए हैं।
सरकार का फोकस खास तौर पर:
- कृषि क्षेत्र को राहत,
- जल प्रबंधन,
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों की तैयारी,
- आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता
पर है।
विशेषज्ञों की नजर अब प्रशांत महासागर पर
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में प्रशांत महासागर के तापमान का रुख भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों के मौसम को प्रभावित कर सकता है। यदि अल नीनो का प्रभाव और मजबूत होता है, तो मानसून की स्थिति पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
फिलहाल वैज्ञानिक समुद्र के तापमान, वायुमंडलीय बदलाव और मानसूनी गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

