डॉ प्रशांत सिनकर बोले- बढ़ता न्यूनतम तापमान ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव और बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन का संकेत
ठाणे | संवाददाता
ठाणे शहर में अब केवल दिन का अधिकतम तापमान ही नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता न्यूनतम तापमान भी चिंता का विषय बन गया है। शहर में इन दिनों रात का न्यूनतम तापमान 27.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया जा रहा है। मानसून का मौसम होने के बावजूद रात के समय अपेक्षित ठंडक महसूस नहीं हो रही है, जिसे पर्यावरण विशेषज्ञ शहर के बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन का गंभीर संकेत मान रहे हैं।

पर्यावरणविद् डॉ. प्रशांत सिनकर के अनुसार, न्यूनतम तापमान में लगातार हो रही वृद्धि सामान्य मौसमी परिवर्तन नहीं, बल्कि शहरीकरण और पर्यावरणीय असंतुलन का परिणाम है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष गर्मियों में ठाणे का अधिकतम तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। मानसून के देर से आगमन के कारण लंबे समय तक हीटवेव जैसी स्थिति बनी रही। जुलाई के पहले सप्ताह में हुई भारी बारिश के बाद कुछ समय के लिए मौसम में राहत मिली, लेकिन बारिश का दौर थमते ही रात का तापमान फिर तेजी से बढ़ने लगा।
डॉ. सिनकर का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में शहर में तेजी से बढ़े कंक्रीटीकरण, सीमेंट-कंक्रीट सड़कों के विस्तार, ऊंची इमारतों की संख्या में वृद्धि, वाहनों से निकलने वाली गर्मी और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के कारण दिन में अवशोषित हुई गर्मी रात के समय भी वातावरण में बनी रहती है। इसी वजह से शहर में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और रात के तापमान में गिरावट नहीं हो पा रही है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में शहर का अधिकतम तापमान लगभग 32 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 27 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है। रात में पर्याप्त ठंडक नहीं मिलने से वातावरण की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि पेड़-पौधों की वृद्धि, मिट्टी की नमी, पक्षियों एवं अन्य जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास पर भी पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार गर्म रहने वाली रातें मानव स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय हैं। इससे नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, शरीर पर गर्मी का दबाव बढ़ता है और हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
डॉ. सिनकर ने कहा कि ठाणे में बढ़ता न्यूनतम तापमान केवल एक मौसम संबंधी आंकड़ा नहीं, बल्कि शहर में घटते हरित क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव का स्पष्ट संकेत है। उन्होंने शहर में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, खुले स्थानों के संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन तथा पर्यावरण अनुकूल शहरी नियोजन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना है कि टिकाऊ विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर ही भविष्य में शहर को बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाया जा सकता है।

