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And then there is the most dangerous risk of all — the risk of spending your life not doing what you want on the bet you can buy yourself the freedom to do it later.

  • Rajya Sabha Election: महाराष्ट्र की राज्यसभा सीटों के लिए बीजेपी ने घोषित की नई सूची: पुराने वफादार और जातीय संतुलन पर फोकस

    Rajya Sabha Election: महाराष्ट्र की राज्यसभा सीटों के लिए बीजेपी ने घोषित की नई सूची: पुराने वफादार और जातीय संतुलन पर फोकस

    मुंबई। भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र से खाली होने वाली राज्यसभा(Rajya sabha Election) सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक कर दी है। इस बार पार्टी ने “पुराने वफादार” और “जातीय संतुलन” को ध्यान में रखते हुए चार प्रमुख चेहरों को सूचीबद्ध किया है, जिनमें केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले, राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े, माया ईवनाते और रामराव वडकुते शामिल हैं। इस चयन ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है।

    1. विनोद तावड़े: संगठन के भरोसेमंद ‘संकटमोचक’
    कोंकण क्षेत्र के गिरगांव से आने वाले तावड़े का राजनीतिक सफर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से शुरू हुआ। महाराष्ट्र में शिक्षा और सांस्कृतिक मंत्री रहे तावड़े 2019 में विधानसभा टिकट कटने के बाद कुछ समय हाशिए पर दिखे, लेकिन संगठन में उनके काम को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। तावड़े को राज्यसभा भेजकर बीजेपी का लक्ष्य मराठा और शहरी मध्यम वर्ग को साधना है।

    2. रामदास आठवले: दलित राजनीति का मजबूत चेहरा
    केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (A) के प्रमुख आठवले बीजेपी के पुराने और वफादार सहयोगियों में गिने जाते हैं। दलित पैंथर आंदोलन से जुड़े आठवले तीन बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं। राज्यसभा में उनकी वापसी महाराष्ट्र के दलित, विशेषकर बौद्ध वोट बैंक को पार्टी से जोड़ने का संदेश देती है।

    3. माया चिंतामण ईवनाते: महिला और आदिवासी नेतृत्व का प्रतिनिधित्व
    माया ईवनाते का नाम इस सूची का ‘सरप्राइज एलिमेंट’ है। नागपुर की पूर्व मेयर और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की सदस्य रह चुकी माया ईवनाते को बीजेपी ने महिला नेतृत्व, आदिवासी प्रतिनिधित्व और विदर्भ क्षेत्र के लिए चुना है। आदिवासी समुदाय में उनका प्रभाव और दिल्ली में मंत्रालय का अनुभव उन्हें राज्यसभा के लिए उपयुक्त बनाता है।

    4. रामराव वडकुते: एनसीपी छोड़ भाजपा में शामिल हुए सक्रिय नेता
    मराठवाड़ा के धनगर समुदाय से आने वाले रामराव वडकुते पहले एनसीपी में सक्रिय थे, लेकिन 2019 में विधानसभा टिकट न मिलने के बाद उन्होंने भाजपा जॉइन किया। वडकुते महाराष्ट्र विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी माने जाते हैं। उनकी राज्यसभा नॉमिनेशन से बीजेपी को मराठवाड़ा क्षेत्र में आरक्षण और सामाजिक संतुलन का लाभ मिलेगा।

    इस सूची के माध्यम से बीजेपी ने पुराने वफादारों को सम्मानित करने के साथ-साथ जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का संतुलन बनाए रखने की रणनीति अपनाई है।

  • Blood Moon: 3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण: भारत में कब दिखेगा ‘ब्लड मून’, जानें समय और खास बातें

    Blood Moon: 3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण: भारत में कब दिखेगा ‘ब्लड मून’, जानें समय और खास बातें

    नई दिल्ली। 3 मार्च 2026 को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। यह एक पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा, जिसके दौरान चांद लालिमा लिए दिखाई देगा। इसी वजह से इसे ‘ब्लड मून’ भी कहा जाता है। खगोल विज्ञान के अनुसार, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और उसकी छाया पूरी तरह चंद्रमा को ढक लेती है, तब पूर्ण चंद्र ग्रहण होता है।


    भारत में कब लगेगा चंद्र ग्रहण?

    भारतीय समय (IST) के अनुसार अनुमानित समय इस प्रकार है:

    • 🌒 आंशिक ग्रहण शुरू: देर रात लगभग 3:20 बजे
    • 🔴 पूर्ण ग्रहण (Blood Moon) शुरू: सुबह करीब 4:30 बजे
    • 🌕 पूर्ण ग्रहण समाप्त: लगभग 5:40 बजे
    • 🌑 ग्रहण समाप्त: सुबह लगभग 6:50 बजे

    (सटीक समय स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।)


    कितनी देर दिखेगा ‘ब्लड मून’?

    पूर्ण चंद्र ग्रहण की अवस्था लगभग 1 घंटा 10 मिनट तक रहने की संभावना है। इस दौरान चंद्रमा गहरे लाल या तांबे रंग का दिखाई देगा।

    हालांकि भारत के कई हिस्सों में सूर्योदय के कारण पूरा चरण स्पष्ट रूप से देखने में कठिनाई हो सकती है। पश्चिमी और मध्य भारत में दृश्यता अपेक्षाकृत बेहतर रहने की संभावना है।


    क्यों लाल दिखता है चांद?

    जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, तो सूर्य की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरती हैं। वायुमंडल नीली रोशनी को अधिक बिखेर देता है और लाल रोशनी चंद्रमा तक पहुंचती है। इसी कारण चांद लालिमा लिए दिखाई देता है।


    क्या रखें सावधानी?

    • चंद्र ग्रहण को नंगी आंखों से देखना सुरक्षित होता है।
    • दूरबीन या टेलीस्कोप से देखने पर दृश्य और भी आकर्षक दिखता है।
    • किसी विशेष चश्मे की आवश्यकता नहीं होती (यह सूर्य ग्रहण से अलग है)।

    धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं

    भारत में चंद्र ग्रहण को लेकर धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। कई लोग ग्रहण के दौरान भोजन नहीं करते और मंत्र जाप या पूजा-पाठ करते हैं। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है।


    3 मार्च 2026 की यह खगोलीय घटना आसमान में दुर्लभ नजारा पेश करेगी। मौसम साफ रहा तो देशभर में लाखों लोग ‘ब्लड मून’ का अद्भुत दृश्य देख सकेंगे।

  • Ali Khamenei: अली खामेनेई की मौत से खाड़ी देशों में बढ़ा तनाव, हजारों फ्लाइट रद्द

    Ali Khamenei: अली खामेनेई की मौत से खाड़ी देशों में बढ़ा तनाव, हजारों फ्लाइट रद्द

    तेहरान/दोहा/दुबई। ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच सुरक्षा कारणों से हजारों अंतरराष्ट्रीय और घरेलू उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। कई देशों ने अपने हवाई क्षेत्र को अस्थायी रूप से बंद या सीमित कर दिया है।

    एयरलाइंस कंपनियों ने यात्रियों को एडवाइजरी जारी कर वैकल्पिक रूट अपनाने की जानकारी दी है। दुबई, दोहा, अबू धाबी और रियाद जैसे प्रमुख एयर हब पर भारी भीड़ और अफरातफरी का माहौल देखा गया।

    किन-किन देशों पर असर?

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    https://saudigazette.com.sa/saudigazette/uploads/images/2026/01/27/2653339.webp
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    ईरान द्वारा खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के बाद कतर, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात ने सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ हमलों के कारण हवाई यातायात प्रभावित हुआ है। खाड़ी देशों के एयरस्पेस से गुजरने वाली यूरोप-एशिया उड़ानों को भी वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़े हैं, जिससे उड़ानों में देरी और लागत बढ़ गई है।

    सैन्य टकराव और बढ़ी अनिश्चितता

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    तनाव के बीच अमेरिकी युद्धपोत पहले से ही फारस की खाड़ी में तैनात हैं। इस बीच Islamic Revolutionary Guard Corps ने ब्रिगेडियर जनरल Ahmad Vahidi को नया कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया है, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि ईरान सैन्य रूप से पीछे हटने के मूड में नहीं है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात नहीं संभले तो क्षेत्रीय संघर्ष और गहरा सकता है, जिसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, शेयर बाजार और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर पड़ेगा।

  • Air New Zealand: बिना शोर और धुएं की उड़ान: एयर न्यूजीलैंड ने किया ऑल-इलेक्ट्रिक विमान का सफल परीक्षण

    Air New Zealand: बिना शोर और धुएं की उड़ान: एयर न्यूजीलैंड ने किया ऑल-इलेक्ट्रिक विमान का सफल परीक्षण

    कल्पना कीजिए कि आप बादलों के ऊपर सफर कर रहे हैं, लेकिन न इंजन का तेज शोर है और न ही धुआं। यह अब सपना नहीं रहा। Air New Zealand ने अपने ‘मिशन नेक्स्ट जेनरेशन एयरक्राफ्ट’ के तहत पहले ऑल-इलेक्ट्रिक विमान की सफल टेस्टिंग पूरी कर ली है।

    यह पहल विमानन क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति मानी जा रही है, जो भविष्य में पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम कर सकती है।


    अमेरिका–न्यूजीलैंड की साझेदारी

    ग्रीन एयर न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए एयर न्यूजीलैंड ने अमेरिकी कंपनी BETA Technologies के साथ साझेदारी की है।

    इस समझौते के तहत ‘ALIA’ नाम के इलेक्ट्रिक विमान को चुना गया है। यह विमान eVTOL (इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेकऑफ एंड लैंडिंग) तकनीक पर आधारित है, यानी यह हेलिकॉप्टर की तरह सीधा ऊपर उठ सकता है और उतर सकता है।

    टेस्टिंग के दौरान इस विमान ने न्यूजीलैंड के पहाड़ी इलाकों और समुद्र के ऊपर उड़ान भरते हुए एक बार चार्ज होने पर 480 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय की। छोटे रूटों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।


    क्यों खास है ALIA?

    • यह पूरी तरह प्रदूषण मुक्त है और उड़ान के दौरान कार्बन उत्सर्जन नहीं करता।
    • इसका शोर बेहद कम है—घरेलू वैक्यूम क्लीनर या मिक्सी से भी कम।
    • खराब मौसम और तेज हवाओं में भी इसने 2000 फीट की ऊंचाई पर सफल उड़ान भरी।
    • इसकी ताकत पारंपरिक टर्बोप्रॉप इंजनों के बराबर मानी जा रही है।

    2050 नेट-जीरो लक्ष्य की ओर कदम

    न्यूजीलैंड सरकार ने 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। एयर न्यूजीलैंड का यह कदम न केवल इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा, बल्कि दुनिया को यह संदेश देगा कि बिजली से हवाई सफर अब हकीकत बनने की राह पर है।

    अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो आने वाले समय में आसमान में उड़ते विमान शोर और धुएं से मुक्त नजर आ सकते हैं।

  • CSMT Parcel Transfer Row Raises Vigilance and Administrative Concerns: क्या ट्रांसफर रोकने के लिए सीएसएमटी पार्सल में कार्यरत शैलेन्द्र पंडित ने शिकायत को बनाया हथियार?

    CSMT Parcel Transfer Row Raises Vigilance and Administrative Concerns: क्या ट्रांसफर रोकने के लिए सीएसएमटी पार्सल में कार्यरत शैलेन्द्र पंडित ने शिकायत को बनाया हथियार?

    ” विजिलेंस पर दबाव डालने की कोशिश या प्रशासन को खुली चुनौती!”–सीएसएमटी पार्सल प्रकरण ने उठाया सवाल

    सीएसएमटी पार्सल विभाग में स्थानांतरण के बाद जीआरपी शिकायत से मचा बवाल, विजिलेंस कार्रवाई और प्रशासनिक तंत्र पर उठे गंभीर सवाल
    सीएसएमटी पार्सल विभाग में स्थानांतरण के बाद जीआरपी शिकायत से मचा बवाल, विजिलेंस कार्रवाई और प्रशासनिक तंत्र पर उठे गंभीर सवाल

    मुंबई: मध्य रेलवे के मुंबई डिवीजन(CR Mumbai Division) स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) के पार्सल विभाग में सामने आया विवाद अब एक कर्मचारी के स्थानांतरण से कहीं आगे बढ़ चुका है। यह मामला रेलवे की प्रशासनिक पारदर्शिता, विजिलेंस तंत्र की स्वतंत्रता और शिकायत प्रणाली के संभावित दुरुपयोग जैसे गंभीर मुद्दों को केंद्र में ले आया है।

    सूत्रों के अनुसार, विजिलेंस की अनुशंसा के आधार पर सीएसएमटी पार्सल सीबीएस बैच इंचार्ज शैलेन्द्र पंडित का स्थानांतरण सीएसएमटी से शिवुड़–दारावे स्टेशन किया गया। लेकिन स्थानांतरण आदेश जारी (CSMT Parcel Transfer Row Raises Vigilance and Administrative Concerns) होने के तुरंत बाद 11 फरवरी 2026 को सीएसएमटी जीआरपी में वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराए जाने से पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े हो गए हैं।

    https://epaper.rashtriyaswabhimaan.com/view/501/rashtriya-swabhimaan

    जीआरपी में प्रस्तुत शिकायत(Complain) में मुंबई डिवीजन के सीनियर डीसीएम डॉ. शिवराज मानसपुरे, मध्य रेलवे के डिप्टी सीवीओ (ट्रैफिक) प्रदीप हिरडे तथा चीफ विजिलेंस इंस्पेक्टर सुमित दूधे के नाम शामिल बताए जा रहे हैं। रेलवे के जानकार अधिकारियों का कहना है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के तुरंत बाद इस प्रकार की शिकायत दर्ज होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इससे यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह कदम विभागीय कार्रवाई को प्रभावित करने या दबाव बनाने की रणनीति तो नहीं।

    पहले से दर्ज थीं अनियमितताएँ

    • दस्तावेजों के अनुसार, संबंधित कर्मचारी की कार्यप्रणाली को लेकर पूर्व में भी आपत्तियाँ दर्ज की जा चुकी थीं।
    • 23 अप्रैल 2025 को निरीक्षण में अनियमितता दर्ज होने की बात सामने आई।
    • 25 जून 2025 को ड्यूटी से अनुपस्थित पाए जाने का उल्लेख रिकॉर्ड में है।
    • ड्यूटी मस्टर में नाम का कॉलम खाली छोड़ने और बाद में हस्ताक्षर करने की प्रवृत्ति भी नोट की गई।
    • 3 अगस्त 2025 को सीआरबी निरीक्षण के दौरान अनुपस्थिति के बाद चेतावनी जारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

    इन्हीं तथ्यों के आधार पर चार्जशीट और बाद में स्थानांतरण आदेश जारी किए जाने की बात कही जा रही है।

    एसोसिएशन की मान्यता पर भी प्रश्न

    मामले का एक और संवेदनशील पहलू यह है कि शिकायत पत्र ‘ऑल इंडिया एससी एंड एसटी रेलवे एम्प्लॉइज एसोसिएशन’ के नाम से प्रस्तुत किया गया है। हालांकि, रेलवे के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार संबंधित संगठन की रेलवे बोर्ड से मान्यता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि संगठन की वैधता संदिग्ध पाई जाती है, तो यह मामला फर्जी संगठन के नाम पर दबाव बनाने तक जा सकता है।

    क्या शिकायत तंत्र बन रहा है ‘ढाल’?

    रेलवे के भीतर अब यह चर्चा तेज है कि क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए शिकायत प्रणाली का उपयोग एक ‘ढाल’ के रूप में किया गया। यदि हर विभागीय जांच या स्थानांतरण के बाद इसी तरह की रणनीति अपनाई जाती है, तो निष्पक्ष कार्रवाई करने वाले अधिकारियों के लिए भय और असुरक्षा का वातावरण बन सकता है।

    एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि यदि जांच एजेंसियों और विजिलेंस अधिकारियों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा, तो भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ कार्रवाई करना कठिन हो जाएगा। यह केवल एक कर्मचारी बनाम प्रशासन का मामला नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है।

    रेलवे प्रशासन के लिए चेतावनी संकेत

    यह प्रकरण रेलवे के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। यदि विजिलेंस की अनुशंसा पर की गई कार्रवाई को शिकायतों के माध्यम से दबाने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो भविष्य में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों का मनोबल प्रभावित हो सकता है।

    रेलवे को चाहिए कि:

    • शिकायत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराए।
    • विजिलेंस कार्रवाई के तथ्यों को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करे (नियमों के दायरे में)।
    • एसोसिएशन की मान्यता की सत्यता की जांच कर स्पष्ट स्थिति सामने लाए।
    • ईमानदार अधिकारियों को संस्थागत संरक्षण प्रदान करे।

    यदि समय रहते स्पष्ट और दृढ़ रुख नहीं अपनाया गया, तो यह मामला भविष्य में अनुशासनात्मक प्रक्रिया को कमजोर करने वाली मिसाल बन सकता है।

    अब सबकी निगाहें रेलवे बोर्ड और मध्य रेलवे के शीर्ष प्रशासन पर टिकी हैं कि वे संस्थागत साख को मजबूत करते हैं या यह प्रकरण भी फाइलों में सिमट कर रह जाता है।

  • INDIA-US Agro Trade Deal: क्या अमेरिका के साथ कृषि समझौता भारतीय किसानों के लिए “डेथ वारंट” साबित होगा?

    INDIA-US Agro Trade Deal: क्या अमेरिका के साथ कृषि समझौता भारतीय किसानों के लिए “डेथ वारंट” साबित होगा?

    मोदी सरकार की एग्री-डील पर उठते सवाल और हकीकत

    भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र (INDIA-US Agro Trade Deal) में बढ़ते सहयोग और संभावित व्यापारिक समझौतों को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। विपक्ष के कुछ नेताओं और किसान संगठनों का आरोप है कि यह समझौता भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है और “किसानों के डेथ वारंट” पर हस्ताक्षर जैसा कदम है।

    लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आइए विस्तार से समझते हैं।


    कृषि समझौते की पृष्ठभूमि

    भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार पहले से ही जारी है। भारत अमेरिका से बादाम, सेब, दालें और कृषि तकनीक आयात करता है, जबकि अमेरिका को चावल, मसाले, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि उत्पाद निर्यात करता है।

    हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच:

    • कृषि बाजारों को खोलने,
    • टैरिफ कम करने,
    • जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों के आयात,
    • डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के व्यापार
      को लेकर चर्चा तेज हुई है।

    इसी संदर्भ में प्रस्तावित या चर्चित “कृषि डील” को लेकर किसानों में आशंकाएँ पैदा हुई हैं।


    किसानों की प्रमुख चिंताएँ

    1. सस्ते आयात का खतरा

    अमेरिका में कृषि बड़े पैमाने पर, अत्याधुनिक तकनीक और भारी सरकारी सब्सिडी के सहारे की जाती है। यदि भारतीय बाजार अमेरिकी गेहूं, मक्का, सोयाबीन या डेयरी उत्पादों के लिए खुलता है, तो:

    • भारतीय किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में भारी नुकसान हो सकता है
    • एमएसपी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है
    • छोटे और सीमांत किसान बाजार से बाहर हो सकते हैं

    2. जीएम फसलों का मुद्दा

    अमेरिका जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों का बड़ा उत्पादक है। यदि ऐसे उत्पाद भारत में व्यापक रूप से आयात होते हैं, तो:

    • जैव विविधता पर असर पड़ सकता है
    • पारंपरिक बीजों और स्थानीय खेती पर संकट आ सकता है
    • बीज कंपनियों की निर्भरता बढ़ सकती है

    3. डेयरी सेक्टर पर दबाव

    भारत का डेयरी क्षेत्र मुख्यतः छोटे किसानों और सहकारी मॉडल (जैसे अमूल) पर आधारित है। अमेरिकी डेयरी उत्पादों को अनुमति मिलने से लाखों दुग्ध उत्पादकों की आय पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।


    सरकार का पक्ष क्या है?

    सरकार का कहना है कि:

    • कोई भी समझौता भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करते हुए ही किया जाएगा।
    • निर्यात के नए अवसर खुलेंगे, जिससे किसानों को वैश्विक बाजार मिलेगा।
    • कृषि तकनीक, कोल्ड स्टोरेज, सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग में निवेश बढ़ेगा।
    • भारत को उच्च गुणवत्ता वाले बीज और तकनीकी सहयोग मिलेगा।

    सरकार यह भी तर्क देती है कि वैश्विक व्यापार से अलग रहकर भारत कृषि क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी नहीं बना सकता।


    “डेथ वारंट” वाली राजनीति

    “डेथ वारंट” जैसे शब्द राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं। विपक्ष इसे 2020 के कृषि कानूनों की याद से जोड़ता है, जब बड़े कॉर्पोरेट और विदेशी कंपनियों के प्रवेश को लेकर व्यापक किसान आंदोलन हुआ था।

    आलोचकों का कहना है कि:

    • यह समझौता धीरे-धीरे कृषि बाजार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल देगा
    • एमएसपी कानूनी गारंटी से ध्यान हटाया जा रहा है
    • आत्मनिर्भर कृषि मॉडल कमजोर होगा

    वहीं समर्थकों का दावा है कि:

    • भारतीय किसान अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं
    • निर्यात-आधारित कृषि से आय दोगुनी करने का लक्ष्य मजबूत होगा

    वास्तविक खतरा कहाँ है?

    सवाल यह नहीं है कि अमेरिका के साथ समझौता हो या न हो। असली मुद्दा यह है कि:

    • क्या भारतीय किसानों को बराबर की सब्सिडी और सुरक्षा मिलेगी?
    • क्या एमएसपी और सार्वजनिक खरीद प्रणाली बरकरार रहेगी?
    • क्या छोटे किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी?

    यदि सुरक्षा उपायों के बिना बाजार पूरी तरह खोल दिया गया, तो छोटे किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन यदि समझौता संतुलित शर्तों और चरणबद्ध तरीके से लागू हुआ, तो यह अवसर भी बन सकता है।

  • Discovery Channel: डिस्कवरी चैनल पर 11 फरवरी को प्रसारित होगी ‘यूनानी की कहानी’, जिम सर्भ बने नैरेटर

    Discovery Channel: डिस्कवरी चैनल पर 11 फरवरी को प्रसारित होगी ‘यूनानी की कहानी’, जिम सर्भ बने नैरेटर

    मुंबई। अपनी दमदार आवाज़, बेबाक अंदाज़ और अलग पहचान वाले किरदारों के लिए मशहूर अभिनेता जिम सर्भ एक बार फिर दर्शकों को नए अनुभव से रूबरू कराने जा रहे हैं। इस बार वे अभिनय नहीं, बल्कि एक खास डॉक्यूमेंट्री के नैरेटर (सूत्रधार) के रूप में नजर आएंगे। हमदर्द लेबोरेटरीज के सहयोग से बनी यह डॉक्यूमेंट्री ‘यूनानी की कहानी’(Unani Ki Kahaani) 11 फरवरी 2026 को डिस्कवरी चैनल(Discovery Channel) पर प्रसारित होगी।

    डॉक्यूमेंट्री से जुड़ी ज्यादा जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है, लेकिन जिम सर्भ और हमदर्द लेबोरेटरीज का यह सहयोग पहले से ही चर्चा में है। एक ओर आधुनिक सिनेमा का अलग तेवर रखने वाले जिम सर्भ हैं, तो दूसरी ओर भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति से जुड़ी सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक हमदर्द—इस संयोजन ने दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा दी है।

    सूत्रों के मुताबिक, ‘यूनानी की कहानी’ डॉक्यूमेंट्री यूनानी चिकित्सा पद्धति की शुरुआत, उसके ऐतिहासिक विकास और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता को दर्शाएगी। इसे आधुनिक प्रस्तुति शैली में तैयार किया गया है, ताकि युवा दर्शक और इतिहास व समग्र स्वास्थ्य पद्धतियों में रुचि रखने वाले लोग इसे नए दृष्टिकोण से समझ सकें।

    डॉक्यूमेंट्री का टीज़र खुद जिम सर्भ ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर साझा किया है। यह टीज़र रिलीज़ से पहले शुरू होने वाले मल्टी-फेज़ प्रमोशनल कैंपेन की पहली झलक माना जा रहा है। प्रीमियर की तारीख नजदीक आने के साथ-साथ इससे जुड़ी और जानकारियां, फर्स्ट लुक और बिहाइंड-द-सीन्स कंटेंट सामने लाया जाएगा।

  • Religion News: बद्रीनाथ–केदारनाथ में मोबाइल पर नो-एंट्री? गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक

    Religion News: बद्रीनाथ–केदारनाथ में मोबाइल पर नो-एंट्री? गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक

    देहरादून: चारधाम यात्रा 2026 से पहले बद्रीनाथ–केदारनाथ मंदिर समिति मोबाइल फोन पर पूर्ण प्रतिबंध और गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर सख्त नियम लागू करने पर विचार कर रही है। (BKTC) आगामी चारधाम यात्रा सीजन के लिए श्रद्धालुओं पर कड़े नियम लागू करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित नियमों में मंदिर परिसर में मोबाइल फोन ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध और गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक जैसे अहम बिंदु शामिल हैं।

    ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ फोटो

    समिति का कहना है कि इन प्रस्तावों का मुख्य उद्देश्य मंदिरों की पवित्रता बनाए रखना और हाल के वर्षों में मंदिर परिसर में बढ़ती वीडियोग्राफी, रील्स और ब्लॉगिंग की प्रवृत्ति पर लगाम लगाना है। समिति अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के अनुसार, इन नियमों को लेकर जल्द होने वाली बैठक में अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।

    हेमंत द्विवेदी ने बताया कि मंदिर परिसर में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार चल रहा है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिबंधित क्षेत्र में मोबाइल का उपयोग करते हुए पाया गया, तो मोबाइल जब्त किया जा सकता है और उस पर भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा।

    इसके अलावा, भविष्य में मंदिर परिसर में ब्लॉगिंग, शूटिंग या फिल्मिंग के लिए बीकेटीसी या जिला प्रशासन से लिखित पूर्व-अनुमति लेना अनिवार्य होगा। बिना अनुमति शूटिंग करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। समिति का मानना है कि इससे न केवल अनुशासन बना रहेगा, बल्कि भीड़ प्रबंधन में भी मदद मिलेगी।

    समिति सूत्रों के मुताबिक, चारधाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और सोशल मीडिया गतिविधियों को देखते हुए यह कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

  • Employment News: रेलवे ग्रुप-D भर्ती 2026: एक ही ज़ोन के लिए होगा आवेदन, जानें आयु सीमा, परीक्षा पैटर्न और फीस

    Employment News: रेलवे ग्रुप-D भर्ती 2026: एक ही ज़ोन के लिए होगा आवेदन, जानें आयु सीमा, परीक्षा पैटर्न और फीस

    नई दिल्ली: भारतीय रेलवे द्वारा ग्रुप-D के 21,997 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया जारी है। रेलवे ने स्पष्ट किया है कि उम्मीदवार केवल एक ही रेलवे ज़ोन के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि कोई अभ्यर्थी एक से अधिक ज़ोन के लिए आवेदन करता है, तो उसका फॉर्म रद्द कर दिया जाएगा। हालांकि, एक ही ज़ोन के अंतर्गत उम्मीदवार एक से अधिक पदों के लिए वरीयता क्रम देकर आवेदन कर सकता है, जिसके लिए अलग फॉर्म भरने की आवश्यकता नहीं होगी।

    केवल एक ही फॉर्म भरा जा सकेगा

    उम्मीदवार केवल एक ही रेलवे ज़ोन के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि किसी उम्मीदवार ने एक से अधिक ज़ोन के लिए आवेदन किया, तो उसका फॉर्म रद्द कर दिया जाएगा।
    हालांकि, एक ही ज़ोन के भीतर एक से अधिक पदों के लिए आवेदन किया जा सकता है, जिसके लिए उम्मीदवार को वरीयता क्रम (Preference Order) देना होगा। इसके लिए अलग से कोई आवेदन करने की आवश्यकता नहीं होगी।


    आयु सीमा क्या है?

    इस भर्ती के लिए 18 से 33 वर्ष आयु वर्ग के उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं।
    आयु की गणना 1 जनवरी 2026 के अनुसार की जाएगी।

    आयु में छूट:

    • OBC: 3 वर्ष
    • SC/ST: 5 वर्ष

    खुला वर्ग / EWS:
    उम्मीदवार का जन्म 2 जनवरी 1993 से 1 जनवरी 2008 के बीच होना चाहिए।


    चयन प्रक्रिया कैसी होगी?

    चयन प्रक्रिया निम्न चरणों पर आधारित होगी:

    1. सिंगल स्टेज कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT)
    2. शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET)
    3. दस्तावेज़ सत्यापन
    4. चिकित्सीय परीक्षण

    लिखित परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को ही शारीरिक परीक्षा के लिए बुलाया जाएगा।


    परीक्षा का स्वरूप

    • परीक्षा अवधि: 90 मिनट
    • कुल प्रश्न: 100

    विषयवार प्रश्न:

    • सामान्य विज्ञान: 25 प्रश्न
    • गणित: 25 प्रश्न
    • बुद्धिमत्ता (रीजनिंग): 30 प्रश्न
    • सामान्य ज्ञान एवं समसामयिक घटनाएं: 20 प्रश्न

    नेगेटिव मार्किंग

    प्रत्येक गलत उत्तर पर 1/3 (एक-तिहाई) अंक काटे जाएंगे।


    न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत

    • UR / EWS: 40%
    • OBC / SC / ST: 30%

    शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) की शर्तें

    पुरुष उम्मीदवारों के लिए:

    • 35 किलोग्राम वजन उठाकर 100 मीटर दूरी 2 मिनट में पूरी करनी होगी।
    • 1000 मीटर दौड़ 4 मिनट 15 सेकंड में पूरी करनी होगी।

    महिला उम्मीदवारों के लिए:

    • 20 किलोग्राम वजन उठाकर 100 मीटर दूरी 2 मिनट में पूरी करनी होगी।
    • 1000 मीटर दौड़ 5 मिनट 40 सेकंड में पूरी करनी होगी।

    वेतन और आवेदन शुल्क

    वेतन:

    • ₹18,000 प्रति माह (लेवल-1 पे स्केल) + अन्य भत्ते

    आवेदन शुल्क:

    परीक्षा में शामिल होने पर पूरा ₹250 रिफंड

    जनरल / OBC / EWS: ₹500

    परीक्षा में शामिल होने पर ₹400 रिफंड

    SC / ST / महिला / EBC: ₹250

  • Western Railway News: चलती लोकल बनी कत्लखाना! मलाड स्टेशन पर प्रोफेसर की चाकुओं से नृशंस हत्या, रेलवे की नाक के नीचे गैंगराज

    Western Railway News: चलती लोकल बनी कत्लखाना! मलाड स्टेशन पर प्रोफेसर की चाकुओं से नृशंस हत्या, रेलवे की नाक के नीचे गैंगराज

    सुजीत मिश्र | मुंबई।
    मुंबई की लोकल ट्रेनें अब सिर्फ सफर का जरिया नहीं रहीं, बल्कि दिनदहाड़े अपराध की चलती-फिरती प्रयोगशाला बन चुकी हैं। पश्चिम रेलवे की लोकल ट्रेनों में कानून, सुरक्षा और इंसानियत—तीनों का सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार हो चुका है। गुरुवार, 22 जनवरी को बोरीवली जाने वाली स्लो लोकल में मलाड रेलवे स्टेशन पर मामूली बहस ने वह भयावह मोड़ लिया, जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया। 33 वर्षीय प्रोफेसर आलोक कुमार सिंह की चलती ट्रेन में चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई।

    यह सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि सरकारी नाकामी का खून से लिखा दस्तावेज़ है। आरोपी 27 वर्षीय ओमकार शिंदे की गिरफ्तारी अगले दिन हो गई, लेकिन असली सवाल गिरफ्तारी का नहीं—सवाल यह है कि ऐसे कातिल लोकल ट्रेनों में बेखौफ कैसे घूम रहे हैं?

    मुंबई लोकल में अब अकेले यात्री नहीं चलते—गुंडों के झुंड चलते हैं। ये गिरोह तय करते हैं कि कौन चढ़ेगा, कौन उतरेगा और कौन ज़िंदा बचेगा। विरोध किया तो मारपीट, लूट और अब हत्या तय है। विकलांग डिब्बों तक पर दबंगों और माफियाओं का कब्ज़ा है, जहाँ असल में दिव्यांग यात्रियों की एंट्री ही मुश्किल हो चुकी है। यह अव्यवस्था नहीं, बल्कि संस्थागत अपराध है।

    रेलवे के उच्चाधिकारी और कमर्शियल विभाग या तो गहरी नींद में हैं या जानबूझकर आँखें मूंदे बैठे हैं। न नियमित पेट्रोलिंग, न अपराधियों पर सख़्त लगाम। बीते साल महिला डिब्बे में मारपीट का वीडियो वायरल हुआ, चेतावनियाँ दी गईं—लेकिन प्रशासन ने खून बहने तक इंतज़ार किया।

    मृतक आलोक कुमार सिंह उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के चंदवक थाना क्षेत्र के पड़रछा गाँव के निवासी थे और मुंबई के प्रतिष्ठित एन.एम. कॉलेज, विले पार्ले में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। एक शिक्षक, एक शिक्षित नागरिक अगर लोकल ट्रेन में सुरक्षित नहीं है, तो मजदूर, छात्र और महिला यात्रियों की सुरक्षा का दावा कौन करेगा?

    सीधा सवाल, सीधा आरोप—
    क्या मुंबई लोकल अब अपराधियों के लिए फ्री ज़ोन बन चुकी है?
    क्या रेलवे प्रशासन को चेतना सिर्फ लाशों की गिनती से आती है?

    यह घटना चेतावनी नहीं, अंतिम अलार्म है। अगर अब भी सख़्त और दिखाई देने वाली कार्रवाई नहीं हुई, तो अगली मौत किसी और की होगी—और जिम्मेदार फिर भी कोई नहीं होगा।