असुरक्षित बिजली खंभों से बड़ा हादसा होने की आशंका, क्या महावितरण(Mahavitaran) को खबर भी है?
सातारा: महाराष्ट्र के सातारा जिले के पाटण तालुका में नदी किनारे चल रहे बड़े पैमाने पर मिट्टी उत्खनन ने एक गंभीर खतरा खड़ा कर दिया है। उत्खनन के कारण खेती और घरों को बिजली देने वाले सैकड़ों बिजली के खंभे बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच गए हैं। कई जगह खंभों के चारों ओर की मिट्टी पूरी तरह हटा दी गई है, जिससे वे जमीन में मजबूती से टिके रहने के बजाय हवा में खड़े दिखाई दे रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर बरसात में बाढ़ या तेज बारिश हुई तो ये खंभे कभी भी गिर सकते हैं। ऐसे में न केवल बिजली आपूर्ति ठप हो सकती है, बल्कि करंट फैलने से लोगों और पशुओं की जान पर भी खतरा मंडरा सकता है।
नदी किनारे बड़े पैमाने पर उत्खनन
जानकारी के मुताबिक पाटण तालुका के नदी किनारे कई इलाकों में भारी मात्रा में मिट्टी निकाली जा रही है। उत्खनन के दौरान कई जगह शेतीपंप और घरों को बिजली देने वाले खंभों के आसपास की मिट्टी पूरी तरह हटा दी गई है।
परिणाम यह हुआ कि कई बिजली के खंभे अब हवा में खड़े दिखाई दे रहे हैं और किसी भी समय गिर सकते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार ऐसे सैकड़ों खंभे क्षतिग्रस्त स्थिति में हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महावितरण को इस बारे में जानकारी है? और अगर है तो अब तक क्या कार्रवाई की गई है, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है।
प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे सवाल
मिट्टी उत्खनन के लिए आमतौर पर राजस्व विभाग, वन विभाग, सिंचन विभाग और सार्वजनिक निर्माण विभाग सहित कई विभागों से अनुमति और ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेना जरूरी होता है।
लेकिन इस मामले में यह सवाल उठ रहा है कि क्या महावितरण से अनुमति ली गई थी या उन्हें इसकी जानकारी दी गई थी? अगर नहीं, तो यह प्रशासन की बड़ी लापरवाही मानी जा रही है।
बाढ़ के समय बढ़ सकता है खतरा
इस इलाके के कई बिजली खंभे कोयना नदी की बाढ़ रेखा के नीचे आते हैं। ऐसे में बारिश के मौसम में अगर नदी में बाढ़ आती है या तेज बारिश होती है, तो इन खंभों के गिरने का खतरा और ज्यादा बढ़ जाएगा।
अगर खंभे गिरते हैं तो बिजली की तारें टूटकर जमीन या पानी में गिर सकती हैं, जिससे आसपास के लोगों, किसानों और पशुओं के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। खासकर अगर करंट पानी में फैल गया तो बड़ी जनहानि से इंकार नहीं किया जा सकता।
शॉर्ट सर्किट और आग का भी खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर खंभे कमजोर हो जाएं तो तेज हवा या तूफान में गिर सकते हैं। इससे बिजली की तारें आपस में टकराकर शॉर्ट सर्किट और आग लगने जैसी घटनाएं भी हो सकती हैं।
ऐसी स्थिति में पूरे इलाके की बिजली आपूर्ति ठप हो सकती है, जिससे किसानों, गांव वालों और स्थानीय व्यवसायों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
खंभों को फिर से लगाने का खर्च कौन उठाएगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन खतरनाक हो चुके खंभों को दोबारा सुरक्षित तरीके से लगाने की जिम्मेदारी किसकी होगी। आम तौर पर एक बिजली खंभे को लगाने में 25 से 30 हजार रुपये तक खर्च आता है।
ऐसे में अगर सैकड़ों खंभों को दोबारा लगाना पड़ा तो इसके लिए काफी बड़ा बजट लगेगा। यह खर्च महावितरण उठाएगा या उत्खनन करने वालों से वसूला जाएगा, इस पर अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।
पर्यटन और नदी के प्रवाह पर भी असर
कोयना नदी के किनारे कृषि पर्यटन और जल पर्यटन विकसित करने की योजनाएं भी चल रही हैं। कई लोगों ने नदी किनारे पर्यटन प्रोजेक्ट, होटल और अन्य व्यवसाय शुरू करने की तैयारी की है।
लेकिन नदी से बड़े पैमाने पर मिट्टी निकालने से नदी का प्रवाह बदल सकता है, जिससे नावों और जल पर्यटन गतिविधियों के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है।
इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि तुरंत जांच कर उत्खनन पर नियंत्रण लगाया जाए और बिजली के खंभों को सुरक्षित किया जाए, ताकि किसी बड़े हादसे को रोका जा सके।
भारतीय विद्युत अधिनियम 2003 क्या कहता है?
भारतीय विद्युत अधिनियम 2003 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की गतिविधि से बिजली के खंभे, तार या अन्य विद्युत उपकरणों को नुकसान पहुंचता है, तो बिजली वितरण कंपनी उस व्यक्ति के खिलाफ कानूनी और आर्थिक कार्रवाई कर सकती है।
ऐसे मामलों में क्षतिग्रस्त उपकरणों की मरम्मत या पुनर्स्थापना का पूरा खर्च संबंधित व्यक्ति से वसूला जा सकता है।
अगर मामला गंभीर पाया जाता है तो दोषी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है। इस कानून के तहत सार्वजनिक बिजली संपत्ति को नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध है, जिसमें जुर्माना, नुकसान की भरपाई और कुछ मामलों में जेल की सजा का भी प्रावधान है।

