Hindi Poetry: तपन बढ़ती जा रही है। विरह में बदन तप रहा है तो तपते सूरज से धरती की तपन। उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने दिल का दर्द किससे कहे।
अंखियां से बरसइ रोज सपनवां
सुगनवां हमरे।
केतनउ दिल के समुझाई
फिर भी आवेला रोवाई
साजन बिनु हमरी हालत
जल बिनु मछरी की नाईं
होरहा जस जरेला मोर परनवां
अंखियां से बरसइ रोज सपनवां
सुगनवां हमरे।
सेजिया पर गरम तवा पे
बूनी जस तड़पत बानी
पानी न बरसइ बालम
फिर भी हम पानी-पानी
पिसि-पिसि के जियरा भइल पिसनवां
सुगनवां हमरे।
अमराई चहकत बाटइ
तरुणाई बहकत बाटइ
लेकिन आंवां के जइसन
ई देहिया धधकत बाटइ
काटइ दउड़इ हमके मधुबनवां
सुगनवां हमरे।
तोहरे जियरा में का बा?
समुझइं न काशी-काबा
हमरी भगिया मा साजन
लागत बाटइ सुख ना बा
मटिया म मिलि गा सबइ सपनवां
सुगनवां हमरे।
परती बा खेतिया हमरी
सुनी बा रतिया हमरी
फोनवा ना लागइ तोहरा
आवइ न पतिया तोहरी
रूठल बा काहें मोर किसनवां
सुगनवां हमरे।
गउवां में डीजे बाजइ
नाचइं जब छोरा-छोरी
झांकी हम रहिया तोहरी
मदमाइल मतिया मोरी
उपरा से मारइ बान मदनवां
सुगनवां हमरे।

सुरेश मिश्र

