Controversy over RTI Responses: महाराष्ट्र के लोकभवन से जुड़ा एक RTI मामला अब गंभीर विवाद का रूप ले चुका है। राज्यपाल के प्रशासनिक अधिकारियों पर RTI के जवाब में “लीपापोती” करने के आरोप लगे हैं, जिससे पूरे प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। RTI आवेदक गिरीश केशवराम मिश्रा ने दावा किया है कि उन्हें मांगी गई जानकारी देने के बजाय भ्रामक, अधूरी और देरी से सूचना दी गई।
आवेदक के अनुसार, उन्होंने 28 मार्च 2023 के सरकारी निर्णय (GR) को निरस्त करने वाली आधिकारिक अधिसूचना की प्रमाणित प्रति मांगी थी, लेकिन इसके स्थान पर लोकभवन सचिवालय ने एक आंतरिक “गाइडलाइन” पत्र भेज दिया। यह दस्तावेज ADC स्तर से जारी बताया गया है, जिससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि क्या बिना वैध अधिसूचना के ही नियमों में बदलाव कर दिया गया।
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विवाद तब और बढ़ गया जब RTI के कई महत्वपूर्ण सवालों पर “Not Available” लिखकर जवाब दे दिया गया। बिना यह स्पष्ट किए कि जानकारी उपलब्ध नहीं है या जानबूझकर रोकी जा रही है, इस तरह का जवाब पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस मामले में समय-सीमा का उल्लंघन भी सामने आया है। RTI आवेदन 27 मार्च 2026 को दाखिल किया गया था, जबकि जवाब 4 मई को भेजा गया और 6 मई को प्राप्त हुआ। यह RTI कानून में तय 30 दिन की सीमा के बाद का जवाब है, जिसे नियमों की अनदेखी माना जा रहा है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी GR को निरस्त करने वाली वैध अधिसूचना मौजूद नहीं है, तो वह GR अब भी प्रभावी माना जाएगा। ऐसे में लोकभवन प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर और भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आवेदक ने 5 मई 2026 को इस मामले में प्रथम अपील दायर कर दी है और साफ संकेत दिया है कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो वह मामला महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग तक ले जाएंगे। इस बीच यह मुद्दा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी तेजी से फैल रहा है, जहां राज्यपाल को टैग कर पारदर्शिता की मांग उठाई गई है।
यह मामला अब केवल एक RTI विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता बनाम जवाबदेही की बड़ी लड़ाई बनता जा रहा है। अब सबकी नजरें अपील प्रक्रिया पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि सच्चाई सामने आती है या नहीं।

