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  • Neonatal ICU Inaugurated: सांसद नरेश म्हस्के के हाथों से  लखमीचंद फतिचंद हॉस्पिटल में नवजात बच्चों के लिए आइसीयू यूनिट का उद्घाटन!

    Neonatal ICU Inaugurated: सांसद नरेश म्हस्के के हाथों से लखमीचंद फतिचंद हॉस्पिटल में नवजात बच्चों के लिए आइसीयू यूनिट का उद्घाटन!

    Neonatal ICU Inaugurated: कोपरी स्थित लखमीचंद फतिचंद हॉस्पिटल में नवजात बच्चों के लिए 18 बेड वाले आइसीयू यूनिट का उद्घाटन सांसद नरेश म्हस्के ने किया और महापौर शर्मिला पिंपलोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। इस मौके पर उपमहापौर कृष्णा पाटिल,सभागृह नेता हनुमंत जगदाले,नगरसेवक राम रेपाले, भरत चव्हाण, नगरसेविका मालती पाटिल, नम्रता पमनानी, उपायुक्त मनीष जोशी, मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रसाद पाटिल, डॉ. धायगुडे, डॉ. समिधा गोरे और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में मौजूद थे।

    शेठ लखमीचंद फतिचंद प्रसूतिगृह कई सालों से इलाके के आम लोगों, मजदूरों और स्लम एरिया के नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रसूतिगृह रहा है। स्थानीय नगरसेवक लगातार इस हॉस्पिटल के डेवलपमेंट के लिए फॉलोअप और कोशिशें की हैं।

    महिला के बच्चे को जन्म देने के बाद, अगर बच्चे को आइसीयू में रखना होता था, तो उसे छत्रपति शिवाजी महाराज हॉस्पिटल या कहीं और शिफ्ट करना पड़ता था। लेकिन अब, जब से इस जगह पर 18 बेड का आईसीयू बन गया है, तब से नए जन्मे बच्चों को कहीं और शिफ्ट नहीं करना पड़ेगा।

  • UE LifeSciences Technology: स्तन कैंसर की बढ़ती चुनौती के बीच यूई लाइफसाइंसेज की तकनीक बनी उम्मीद!

    UE LifeSciences Technology: स्तन कैंसर की बढ़ती चुनौती के बीच यूई लाइफसाइंसेज की तकनीक बनी उम्मीद!

    UE LifeSciences Technology: देशभर में महिलाओं में तेजी से बढ़ रहे स्तन कैंसर के मामलों के बीच समय पर जांच और शुरुआती पहचान को सबसे प्रभावी उपाय माना जा रहा है। इसी दिशा में यूई लाइफसाइंसेज की अत्याधुनिक तकनीकें राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रही हैं।

    सरकार की महत्वाकांक्षी ‘RaKSA’ पहल के तहत कंपनी द्वारा विकसित पोर्टेबल और किफायती तकनीकों के जरिए कैंसर स्क्रीनिंग को अधिक तेज, आसान और व्यापक बनाया जा रहा है। कंपनी के ‘iBreastExam’ डिवाइस के माध्यम से महाराष्ट्र के 22 सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है, जिसके तहत अब तक 1 लाख से अधिक महिलाओं की जांच की जा चुकी है।

    रेडिएशन-फ्री और दर्द रहित जांच
    iBreastExam पूरी तरह रेडिएशन-फ्री, दर्द रहित और नॉन-इनवेसिव तकनीक पर आधारित है। यह कुछ ही मिनटों में स्तन की जांच कर संभावित असामान्यताओं की पहचान कर सकता है। जांच के दौरान हजारों महिलाओं में शुरुआती स्तर पर बदलाव पाए गए, जिन्हें आगे उपचार के लिए रेफर किया गया।

    यह स्क्रीनिंग कार्यक्रम सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल, गोकुलदास तेजपाल अस्पताल, कामा एंड अल्ब्लेस हॉस्पिटल और ग्रांट मेडिकल कॉलेज सहित महाराष्ट्र के कई सरकारी अस्पतालों में संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा नांदेड़, अकोला, औरंगाबाद, नागपुर, कोल्हापुर, धुले, यवतमाल, चंद्रपुर, पुणे, सांगली और सतारा जैसे जिलों में भी यह अभियान जारी है।

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    महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए समय पर जांच जरूरी
    गौरी नवलकर-गोडसे ने कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य को अब देरी से होने वाले निदान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में वास्तविक बदलाव जागरूकता, समय पर स्क्रीनिंग और ऐसी तकनीकों की उपलब्धता से आता है, जो बीमारी को गंभीर अवस्था तक पहुंचने से पहले पहचान सकें। उन्होंने कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए शुरुआती कदम केवल बचाव नहीं, बल्कि परिवारों और भविष्य को सुरक्षित रखने का अवसर है।

    AI आधारित तकनीकों से होगा विस्तार
    यूई लाइफसाइंसेज अब अपनी AI आधारित तकनीकों का विस्तार करने जा रही है। कंपनी जल्द ही सर्वाइकल कैंसर के लिए cervAIcal और ओरल कैंसर के लिए OrCA को इस अभियान में शामिल करेगी। ये स्मार्टफोन आधारित पोर्टेबल उपकरण स्वास्थ्य कर्मियों को दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों में ‘डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग’ करने में मदद करेंगे, जिससे मरीजों का डेटा तुरंत डॉक्टरों तक पहुंच सकेगा।

    हाल ही में मुंबई में महाराष्ट्र पुलिस कर्मियों के लिए आयोजित विशेष कैंसर स्क्रीनिंग कैंप में भी इन तकनीकों की मदद से लगभग 100 महिला और पुरुष पुलिस कर्मियों की स्तन तथा ओरल कैंसर जांच की गई। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि स्तन कैंसर की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए तो 90 प्रतिशत तक मामलों में सफल उपचार संभव है। ऐसे में तकनीक आधारित समय पर जांच की यह पहल स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव ला रही है।

  • Genetic Mutations: महिलाओं की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ को कमजोर कर रहा जेनेटिक म्यूटेशन!

    Genetic Mutations: महिलाओं की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ को कमजोर कर रहा जेनेटिक म्यूटेशन!

    Genetic Mutations: ऑटिज्म को लेकर सामने आई एक नई रिसर्च ने वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस अध्ययन में दावा किया गया है कि कुछ विशेष जेनेटिक म्यूटेशन महिलाओं में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के खतरे को बढ़ा सकते हैं।

    अब तक यह माना जाता रहा है कि महिलाओं के शरीर और मस्तिष्क में मौजूद एक प्रकार की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ उन्हें न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर से काफी हद तक सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन हालिया रिसर्च से पता चला है कि कुछ आनुवंशिक बदलाव इस प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को भी कमजोर कर सकते हैं।

    शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑटिज्म एक जटिल न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जो व्यक्ति के व्यवहार, संचार क्षमता और सामाजिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। आमतौर पर पुरुषों में ऑटिज्म के मामले अधिक देखे जाते हैं, जबकि महिलाओं में इसके लक्षण कई बार अलग और कम स्पष्ट होते हैं।

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    यही कारण है कि महिलाओं में ऑटिज्म की पहचान अक्सर देर से हो पाती है। नई स्टडी बताती है कि महिलाओं में मौजूद कुछ जेनेटिक म्यूटेशन मस्तिष्क के विकास और न्यूरल कनेक्शन को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे ऑटिज्म का खतरा बढ़ जाता है।

    वैज्ञानिकों ने रिसर्च के दौरान पाया कि जिन महिलाओं में ये विशेष जेनेटिक बदलाव मौजूद थे, उनमें सामाजिक व्यवहार, संवाद और भावनात्मक प्रतिक्रिया से जुड़ी चुनौतियां अधिक देखी गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज महिलाओं में ऑटिज्म की पहचान और समझ को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे भविष्य में शुरुआती जांच, बेहतर उपचार और व्यक्तिगत थेरेपी विकसित करने में मदद मिलने की संभावना है।

    रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि महिलाओं में ऑटिज्म को लेकर लंबे समय से कम अध्ययन हुए हैं, क्योंकि अधिकतर रिसर्च पुरुषों पर केंद्रित रही हैं। ऐसे में यह अध्ययन महिलाओं की मानसिक और न्यूरोलॉजिकल स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को समझने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि ऑटिज्म केवल जेनेटिक कारणों से नहीं होता, बल्कि पर्यावरण, जीवनशैली और अन्य जैविक कारक भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। फिर भी यह अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि कैसे कुछ आनुवंशिक बदलाव महिलाओं की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ को कमजोर कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अभी और व्यापक रिसर्च की आवश्यकता है, ताकि ऑटिज्म के कारणों और उसके प्रभावों को और गहराई से समझा जा सके।