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  • Bharat Tiwari Encounter: उच्चतम न्यायालय ने भरत तिवारी एनकाउंटर जांच की याचिका खारिज की, उच्च न्यायालय जाने को कहा

    Bharat Tiwari Encounter: उच्चतम न्यायालय ने भरत तिवारी एनकाउंटर जांच की याचिका खारिज की, उच्च न्यायालय जाने को कहा

    Bharat Tiwari Encounter: उच्चतम न्यायालय ने बिहार के भोजपुर जिला में 28 वर्षीय भारत भूषण तिवारी के फर्जी एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को विचार करने से इनकार कर दिया।

    न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता विशाल तिवारी को पटना उच्च न्यायालय जाने को कहा। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय जाने की स्वतंत्रता देते हुए टिप्पणी की कि स्थानीय परिस्थितियों की बेहतर निगरानी के लिए उच्च न्यायालय जाना अधिक उचित होगा।

    अधिवक्ता विशाल तिवारी ने अपनी याचिका में संबंधित पुलिस टीम के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने इस मौत की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति के गठन का भी आग्रह किया था।

    आरोपों के अनुसार, 17 जून को एक एनकाउंटर में भारत भूषण तिवारी की मौत हुई थी। याचिका में तिवारी के पिता और स्थानीय लोगों के बयानों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि आत्मसमर्पण करने और हथियार डाल देने के बावजूद पुलिस ने उसे गोली मार दी।

    याचिकाकर्ता का कहना है कि तिवारी ने इस एनकाउंटर का अपने फेसबुक पेज पर लाइवस्ट्रीम किया था। यह घटना पुलिस के उस दावे के 24 घंटे के भीतर हुई, जिसमें उन्होंने तिवारी को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हुए उसे सुरक्षित हिरासत में लेने की बात कही थी।

    याचिका में ‘पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले के दिशा-निर्देशों के पालन और निष्पक्ष जांच पर सवाल उठाये गये थे। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि पुलिस का इस तरह कानून हाथ में लेना पूरी कानून व्यवस्था को ध्वस्त करता है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।

  • Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर दान गबन मामले की सुनवाई जल्द करने किया इनकार!

    Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर दान गबन मामले की सुनवाई जल्द करने किया इनकार!

    Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित वित्तीय अनियमितताओं और हेराफेरी की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग को लेकर पेश जनहित याचिका पर सोमवार को जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

    याचिका में मंदिर कोष से जुड़े सभी भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय रिकॉर्ड को तुरंत सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गयी है।न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की अवकाशकालीन पीठ ने अधिवक्ता एन. के. गोस्वामी के जल्द सुनवाई के लिए जनहित याचिका का उल्लेख किये जाने पर कहा कि इस मामले पर उचित समय पर विचार किया जायेगा।

    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को याचिका की एक प्रति रजिस्ट्री को सौंपने का निर्देश दिया। उल्लेख के दौरान वकील ने दलील दी कि ऐसी आशंका है कि जब तक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के निर्देश जारी नहीं किये जाते, तब तक उनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है।

    अधिवक्ता अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव की ओर से दायर इस याचिका में राम मंदिर निर्माण के लिए जनता से मिले दान में गबन, हेराफेरी और दुरुपयोग के आरोपों की सीबीआई द्वारा एक नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने के निर्देश देने की मांग की गयी है।

    याचिका पर विचार लंबित रहने तक, इसमें दान रजिस्टर, खाता बही, सीसीटीवी फुटेज, बैंक रिकॉर्ड और सॉफ्टवेयर डेटाबेस सहित सभी भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गयी है, ताकि उनके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की आशंका को दूर किया जा सके।

    याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हालांकि इन आरोपों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है, लेकिन जांच बिना प्राथमिकी दर्ज किए शुरू हुई है, जिससे इसके निष्कर्षों को चुनौती दी जा सकती है।

    याचिकाकर्ताओं के अनुसार, एसआईटी के पास जटिल वित्तीय लेन-देन और डिजिटल साक्ष्यों से जुड़े आरोपों की जांच के लिए आवश्यक फोरेंसिक विशेषज्ञता और खोजी संसाधनों की भी कमी है।

    एक पुराने उदाहरण का हवाला देते हुए, याचिका में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम से जुड़े कथित मिलावटी घी विवाद की जांच का संदर्भ दिया गया है, जहां सीबीआई के नेतृत्व में एक बहुविषय एसआईटी का गठन किया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान मामले की जांच के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था की आवश्यकता है।

  • NEET-UG Re-Exam: सुप्रीम कोर्ट ने 21 जून की परीक्षा CBT मोड में कराने से किया इनकार

    NEET-UG Re-Exam: सुप्रीम कोर्ट ने 21 जून की परीक्षा CBT मोड में कराने से किया इनकार

    NEET-UG Re-Exam: उच्चतम न्यायालय ने 21 जून को होने वाली नीट-यूजी पुनर्परीक्षा को कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) मोड में आयोजित करने की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परीक्षा पहले से तय ‘पेन-एंड-पेपर’ (ऑफलाइन) मोड में ही आयोजित होगी।

    न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सांसद सुधाकर सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया और मामले की अगली सुनवाई जुलाई में तय की।

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    याचिकाकर्ता की ओर से केवल यह मांग रखी गई थी कि 21 जून की परीक्षा CBT मोड में कराई जाए। हालांकि अदालत ने कहा कि इस प्रकार की मांग पहले भी खारिज की जा चुकी है और वर्तमान परिस्थितियों में परीक्षा पद्धति बदलने का कोई औचित्य नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद 21 जून को होने वाली नीट-यूजी पुनर्परीक्षा ऑफलाइन मोड में ही आयोजित किए जाने का रास्ता साफ हो गया है।

  • Supreme Court New Judges: सुप्रीम कोर्ट को मिले पांच नए जज, कुल संख्या बढ़कर होगी 37

    Supreme Court New Judges: सुप्रीम कोर्ट को मिले पांच नए जज, कुल संख्या बढ़कर होगी 37

    Supreme Court New Judges: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। इन न्यायाधीशों के शपथ लेने के बाद मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के जजों की कुल संख्या 37 हो जाएगी।

    विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकिटा सुब्रमणि मोहना तथा चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों/न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त करने की मंजूरी दी है।

    नियुक्त किए गए न्यायाधीशों में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति चंद्रशेखर, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण पल्ली शामिल हैं।

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    सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, इन सभी की नियुक्ति उनके पदभार ग्रहण करने की तारीख से प्रभावी मानी जाएगी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पिछले महीने इन नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी, जिसके बाद नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की गई।

    वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकिटा सुब्रमणि मोहना की नियुक्ति के साथ ही सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर दो हो जाएगी। फिलहाल केवल B. V. Nagarathna महिला न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। अगस्त 2021 के बाद पहली बार किसी महिला न्यायाधीश की नियुक्ति हुई है।

    हाल ही में केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी थी। वर्तमान में शीर्ष अदालत में 32 न्यायाधीश कार्यरत हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम Court की स्थापना के समय इसमें केवल आठ न्यायाधीश थे।

  • Twisha Sharma case: विकास पाहवा ने ट्विशा शर्मा मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का किया स्वागत!

    Twisha Sharma case: विकास पाहवा ने ट्विशा शर्मा मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का किया स्वागत!

    Twisha Sharma case: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने सोमवार को ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह आदेश सार्वजनिक दबाव और मीडिया द्वारा गढ़ी गयी कहानियों से मुक्त, निष्पक्ष और तटस्थ आपराधिक जांच के महत्व को और मज़बूत करता है।

    पाहवा ने कहा कि न्यायालय ने जांच में जनता का भरोसा बनाए रखने और कानूनी प्रक्रिया की गरिमा की रक्षा करने के बीच एक संतुलन बनाया है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने इस मामले में शामिल किसी भी व्यक्ति के दोषी होने या निर्दोष होने पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

    पाहवा ने “मीडिया ट्रायल” के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की चेतावनी पर कहा कि आपराधिक मामले तेज़ी से सार्वजनिक तमाशे बनते जा रहे हैं, जहाँ सबूतों की ठीक से जांच किए जाने से पहले ही आरोप और निष्कर्ष बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल आरोपी के अधिकारों को नुकसान पहुँचा सकता है और गवाहों, जांचकर्ताओं तथा न्याय के समग्र प्रशासन पर बुरा असर डाल सकता है।

    संबंधित खबरें: Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील!

    अदालत की टिप्पणियों का ज़िक्र करते हुए पाहवा ने कहा कि शीर्ष अदालत ने मीडिया, परिवार के सदस्यों, आरोपियों और आम जनता सहित सभी संबंधित पक्षों को याद दिलाया है कि बयान जांच एजेंसियों के सामने दिए जाने चाहिए, न कि टेलीविज़न बहसों या सार्वजनिक अभियानों के ज़रिए। उन्होंने कहा कि जांच को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का कदम संस्थागत भरोसे को बहाल करने और इस मामले में एक स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया प्रतीत होता है।

    पाहवा ने कहा कि इस आदेश से संवेदनशील आपराधिक मामलों में ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस शुरू होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बोलने की आज़ादी और प्रेस की आज़ादी के साथ यह कर्तव्य भी जुड़ा है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई दखल न दिया जाए। उन्होंने कहा, “एक युवती की दुर्भाग्यपूर्ण मौत एक निष्पक्ष, तटस्थ और पेशेवर जांच की हकदार है।” उन्होंने कहा कि यह उद्देश्य तभी हासिल किया जा सकता है जब संस्थाओं को सनसनीखेज़पन या बाहरी दबाव के बिना काम करने दिया जाए।

  • Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील!

    Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील!

    Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि पीड़िता के परिवार या आरोपियों के परिवार के बयानों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित न किया जाए।

    शीर्ष अदालत ने ट्विशा शर्मा मृत्यु मामले में कथित संस्थागत पक्षपात और प्रक्रियागत त्रुटियों से संबंधित स्वत: संज्ञान मामले पर सुनवाई की। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने की।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “कुछ घटनाक्रमों से हमें पीड़ा हुई है। हम मीडिया से अनुरोध करते हैं कि वह पीड़िता के परिवार या दूसरे पक्ष के बयानों पर ज्यादा ध्यान न दे। मामले को कानून और प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ने दिया जाए।”

    उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मामले में एक पूर्व जिला न्यायाधीश और एक वकील के खिलाफ आरोप होने के कारण न्यायपालिका द्वारा आरोपियों को संरक्षण दिए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

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    शीर्ष अदालत ने मीडिया से भी संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि पीड़िता के परिवार या आरोपियों के परिवार के बयानों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित न किया जाए। नोएडा निवासी ट्विशा शर्मा पूर्व ‘मिस पुणे’ विजेता थीं।

    उन्होंने पांच महीने पहले डेटिंग ऐप के माध्यम से परिचय होने के बाद भोपाल निवासी वकील समर्थ सिंह से विवाह किया था। समर्थ सिंह का परिवार न्यायपालिका से जुड़ा हुआ बताया गया है। समर्थ सिंह जहां पेशे से वकील हैं, वहीं उनकी मां गिरिबाला सिंह सेवानिवृत्त न्यायाधीश और वर्तमान में जिला उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग की अध्यक्ष हैं।

    विवाह के महज पांच महीने बाद 12 मई 2026 को ट्विशा शर्मा अपने घर में जिम्नास्टिक रस्सी से लटकी हुई पाई गई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, सीबीआई की एक टीम ट्विशा शर्मा की मृत्यु मामले की जांच औपचारिक रूप से अपने हाथ में लेने के लिए भोपाल रवाना हो चुकी है।

  • Supreme Court Reprimands MP Govt: मंत्री पर कार्रवाई में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मध्यप्रदेश सरकार को लगाई फटकार!

    Supreme Court Reprimands MP Govt: मंत्री पर कार्रवाई में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मध्यप्रदेश सरकार को लगाई फटकार!

    Supreme Court Reprimands MP Govt: उच्चतम न्यायालय ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में मध्य प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए मंत्री कुंवर विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने में देरी पर नाराजगी जताई और कहा कि अब ‘बहुत हो गया’ और दो सप्ताह के भीतर फैसला लें।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शुक्रवार को गौर किया कि मुकदमा चलाने की मंजूरी के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का अनुरोध 19 अगस्त, 2025 से राज्य सरकार के पास लंबित था और अदालत ने 19 जनवरी, 2026 को जो निर्देश दिया था उसके अनुसार इस मंजूरी पर फैसला दो सप्ताह के भीतर लिया जाना था।

    उच्चतम न्यायालय ने जनवरी, 2026 की सुनवाई के दौरान शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने पर फैसला न लेने के लिए मध्य प्रदेश सरकार से सवाल करते हुए अदालत द्वारा निर्देशित एसआईटी के अनुरोध पर राज्य सरकार की निष्क्रियता पर असंतोष व्यक्त किया था।

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    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मध्य प्रदेश सरकार को दो सप्ताह के भीतर फैसला लेने का निर्देश देते हुए कहा था, “आप 19 अगस्त, 2025 से एसआईटी की रिपोर्ट पर बैठे हुए हैं। कानून आप पर एक दायित्व डालता है और आपको एक फैसला लेना ही होगा। अब 19 जनवरी हो चुकी है।” अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि राज्य सरकार कानून द्वारा अनिवार्य किसी फैसले में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं कर सकती।

    एसआईटी ने शाह पर मुकदमा दायर करने की मंजूरी मांगी थी और उन पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196(1)(ए) और 196(1)(बी) के तहत अपराधों का आरोप लगाया था। गौरतलब है कि अदालत की आज की टिप्पणियां तब आईं जब राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी के लिए एसआईटी का अनुरोध अभी भी मध्य प्रदेश सरकार के पास लंबित है।

    सॉलिसिटर जनरल ने मंत्री के बयान को समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि ये टिप्पणियां दुर्भाग्यपूर्ण थीं और शायद इन्हें गलत समझा गया हो। उन्होंने सुझाव दिया कि शाह का इरादा शायद सेना अधिकारी की प्रशंसा करना था लेकिन वे खुद को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाए।

  • Supreme Court: तृणमूल को उच्चतम न्यायालय से झटका, मतगणना कर्मचारियों पर चुनाव आयोग के नियम रहेंगे बरकरार!

    Supreme Court: तृणमूल को उच्चतम न्यायालय से झटका, मतगणना कर्मचारियों पर चुनाव आयोग के नियम रहेंगे बरकरार!

    नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने शनिवार को तृणमूल कांग्रेस की याचिका पर कोई भी आदेश पारित नहीं किया। इस याचिका में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों (West Bengal Assembly elections) की मतगणना के दौरान केंद्र सरकार और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को तैनात करने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी गयी थी। (Supreme Court)

    तृणमूल कांग्रेस ने इससे पहले चुनाव आयोग के इस फैसले को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने उसकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मतगणना कर्मियों की नियुक्ति करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।तृणमूल कांग्रेस और चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले में किसी आदेश की आवश्यकता नहीं है।

    अदालत ने चुनाव आयोग के वकील के उस बयान को रिकॉर्ड में लिया, जिसमें कहा गया था कि आयोग 13 अप्रैल के सर्कुलर का पूरी तरह से पालन करेगा। अदालत ने तृणमूल की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, “सिवाय इसके कि नायडू (आयोग के लिए) के बयान को दोहराया जाए कि 13 अप्रैल 2026 के सर्कुलर को पूरी तरह लागू किया जायेगा, किसी अन्य आदेश की आवश्यकता नहीं है।”

    चुनाव आयोग के इस निर्देश के खिलाफ याचिका दायर की गयी थी कि प्रत्येक टेबल पर काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट में से कम से कम एक व्यक्ति केंद्र सरकार या केंद्रीय पीएसयू का कर्मचारी होना चाहिए।

    तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चिंता जतायी कि 13 अप्रैल का यह सर्कुलर 29 अप्रैल को सामने आया। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य के अधिकारियों के बजाय केंद्रीय कर्मचारियों को नियुक्त करना राज्य मशीनरी पर अविश्वास दर्शाता है। उन्होंने इसे ‘पक्षपात की उचित आशंका’ बताया, क्योंकि केंद्र सरकार का संचालन तृणमूल की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा कर रही है।

    हालांकि पीठ ने तृणमूल की इस धारणा को भ्रामक बताया कि राज्य के कर्मचारी राज्य की पार्टी के प्रति वफादार होते हैं और केंद्रीय कर्मचारी केंद्र के प्रति। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं और चुनाव के दौरान वे चुनाव आयोग (ईसीआई) के अधीन कार्य करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार इन पदों पर केंद्र या राज्य, किसी भी अधिकारी की नियुक्ति की जा सकती है।