अख़तर अली

बहुत से कामों के लिये अनुबंध होता है और बहुत से कामों के लिये आश्वासन होता है। अनुबंध वाले काम समय पर सफ़लता के साथ संपूर्ण हो जाते हैं और आश्वासन वाले काम कभी आरंभ ही नही होते।
अनुबंध सोच समझ कर किया जाता है और आश्वासन में भला सोचने समझने की क्या दरकार? आश्वासन सबसे अधिक किये जाने वाला मज़ाक है जिसे कोई भी, कहीं भी, किसी से भी कर सकता है। अनुबंध में अनुबंध का अध्ययन भी करते रहना होता है कि काम अनुबंध के अनुसार ही हो। आश्वासन में इस तरह का तनाव नही होता क्योंकि आश्वासन का अनुबंध नही होता है।
बदलाव प्रकृति का नियम है। आश्वासन में भी बदलाव हुआ है। पहले आश्वासन देने वाले कोई और थे, आज कोई और हैं, कल कोई और होंगे। यही बदलाव आश्वासन ग्रहण करने वालों भी हुआ है।
अनुबंध में स्पष्टता और आश्वासन में दुष्टता है। न उधर की स्पष्टता दुष्टता में बदलती है न इधर की दुष्टता स्पष्टता में। जब आश्वासन में धोखा मिला होगा तभी अनुबंध जन्मा होगा। काम करने वाले अनुबंध करते है। आश्वासन दे रहे हैं तो समझ जाना इन्हें काम नही करना है।
अनुबंध दो होशियार पक्षों के बीच में होता है जबकि आश्वासन होशियार और मूर्ख के बीच की घटना है। होशियार का आश्वासन सुन मूर्ख ताली बजाते हैं और जय जयकार करते हैं। अगर कहीं मूर्खो का हुजूम ख़ुशी मनाते, झूमते, गाते दिखे तो समझ जाना इन्हें बड़ा भारी आश्वासन मिला है।
आश्वासन देने वाले हेलीकाप्टर में आते है, आश्वासन देते हैं और जाने के जैसे ही हेलीकाप्टर में बैठते है दिया गया आश्वासन भूल जाते हैं। वे अपना ब्रीफ़केस नही भूलते, चश्मा नही भूलते, रुमाल नही भूलते, मोबाईल नही भूलते बस दिया गया आश्वासन भूल जाते हैं। आश्वासन को भूलने के लिये भूलने की बीमारी का होना ज़रूरी नही है। जिनकी याददाश्त तेज़ है उन्हें भी आश्वासन भूलने में क्षण भर का समय भी नही लगता।
बहुत चमकीला है आश्वासन का मीना बाज़ार। अभी कई दशकों तक चलता रहेगा यह कारोबार क्योंकि ऐसे लोगों की संख्या चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती जा रही है जिनके कानों में आश्वासन रस घोल देता है। जब लुटने को लोग तैयार बैठे हैं तो लुटेरों को क्या दोष देना। यह ऐसा पाप है जो पुण्य जैसा लगता है।
अनुबंध तो लिखित करार है लेकिन मनमाने आश्वासन पर नियंत्रण ज़रूरी है। चुनाव आयोग की तरह आश्वासन आयोग होना चाहिये जो नेताओं के दिये गये आश्वासनों का लेखा-जोखा रखें | नये आश्वासन तभी दिये जा सके जब पुराने आश्वासन पूरे हो जायें। बात बात पर आश्वासन देना प्रतिबंधित हो। जिस नेता के आश्वासन का रिकार्ड ख़राब हो उसकी चुनाव लड़ने की पात्रता समाप्त हो जाये। नामांकन दाखिल करते समय आश्वासन आयोग की एन .ओ.सी. आवश्यक हो। आयोग हर नेता को हिदायत दे कि ज़ुबान दुर्लभ अंग है इसका इस्तेमाल झूठे आश्वासन देने के लिये न करें।
मैंने नेता जी से कहा– भय्या आश्वासन का अनुबंध होना चाहिये तो उन्होंने तुरंत अनुबंध का आश्वासन दे दिया |

