हावड़ा | प्रतिनिधि
विद्यार्थी मंच एवं मुक्तांचल के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को हावड़ा में मुक्तांचल पत्रिका के स्वर्णिम 50वें विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ का लोकार्पण एवं ‘साहित्यिक अड्डा’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर साहित्यकारों, आलोचकों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, शोधार्थियों और युवा रचनाकारों ने कोलकाता की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत, हिंदी साहित्य की परंपरा और समकालीन सामाजिक चुनौतियों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुक्तांचल की संपादक एवं विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष डॉ. मीरा सिन्हा के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ केवल एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि दो सदियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक बदलावों का दस्तावेज है। उन्होंने बताया कि इस विशेषांक में शहर के इतिहास, प्रमुख व्यक्तित्वों और सांस्कृतिक विकास की विविध झलकियों को समेटने का प्रयास किया गया है।
Muktanchal 50th Special Issue Launch
प्रख्यात आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने मुक्तांचल के 50 अंकों की निरंतर प्रकाशन यात्रा को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं समाज की वैचारिक चेतना को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। उन्होंने हावड़ा और कोलकाता की साहित्यिक परंपरा तथा हिंदी साहित्य के संघर्षशील इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल दौर में ऐसे आयोजनों का महत्व और बढ़ गया है।
वरिष्ठ आलोचक डॉ. अमरनाथ ने कहा कि समय के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव आया है, लेकिन साहित्य आज भी समाज को दिशा देने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने मुक्तांचल को गंभीर, परिपक्व और संग्रहणीय पत्रिका बताते हुए संपादकीय दृष्टि की सराहना की।
डॉ. अमित कुमार ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना ‘कलकत्ता’ होता है और यह शहर संघर्ष, संस्कृति, विचार और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक है। वहीं सुप्रसिद्ध कथाकार शर्मीला जालान ने कहा कि मुक्तांचल और अन्य साहित्यिक मंच समाज में सकारात्मक वैचारिक वातावरण तैयार कर रहे हैं।

कार्यक्रम में डॉ. पंकज साहा, महेश जायसवाल, मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. चित्रा माली, सुरेश शॉ, प्रकाश अग्रवाल, डॉ. विजया सिंह, जितेंद्र जितांशु, मीनाक्षी सांगनेरिया, विनय जायसवाल और दिव्या प्रसाद सहित अनेक साहित्यकारों ने कोलकाता के साहित्यिक इतिहास, स्त्री-विमर्श, रंगमंच, पत्रकारिता और हिंदी साहित्य की समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार रखे।
साहित्यिक सत्र में वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज़ ख़ान बातिश ने अपनी नई ग़ज़लों का पाठ किया, जबकि विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने अरुण कमल की चर्चित कविता “जाऊँगा मैं जाऊँगा, कोलकाता जाऊँगा” का सस्वर पाठ किया। विद्यार्थियों रागिनी पांडेय, स्वराज पांडेय, सुकन्या तिवारी, राव्या श्रीवास्तव और रोहित शर्मा ने भी कविता-पाठ कर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।
इस अवसर पर गाथा प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज के नए कविता-संग्रह ‘अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी’ का भी लोकार्पण किया गया। वक्ताओं ने इसे समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदनाओं और जनपक्षधर चेतना का महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह बताया।
वरिष्ठ समाजसेवी रामनिवास द्विवेदी ने मुक्तांचल की निरंतर साहित्यिक यात्रा की सराहना करते हुए इसे हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। कार्यक्रम का संचालन विनोद यादव ने किया, जबकि अंत में मुक्तांचल के प्रबंध संपादक सुशील कुमार पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

