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  • Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर दान गबन मामले की सुनवाई जल्द करने किया इनकार!

    Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर दान गबन मामले की सुनवाई जल्द करने किया इनकार!

    Supreme Court Refuses Early Hearing: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित वित्तीय अनियमितताओं और हेराफेरी की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग को लेकर पेश जनहित याचिका पर सोमवार को जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

    याचिका में मंदिर कोष से जुड़े सभी भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय रिकॉर्ड को तुरंत सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गयी है।न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की अवकाशकालीन पीठ ने अधिवक्ता एन. के. गोस्वामी के जल्द सुनवाई के लिए जनहित याचिका का उल्लेख किये जाने पर कहा कि इस मामले पर उचित समय पर विचार किया जायेगा।

    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को याचिका की एक प्रति रजिस्ट्री को सौंपने का निर्देश दिया। उल्लेख के दौरान वकील ने दलील दी कि ऐसी आशंका है कि जब तक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के निर्देश जारी नहीं किये जाते, तब तक उनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है।

    अधिवक्ता अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव की ओर से दायर इस याचिका में राम मंदिर निर्माण के लिए जनता से मिले दान में गबन, हेराफेरी और दुरुपयोग के आरोपों की सीबीआई द्वारा एक नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने के निर्देश देने की मांग की गयी है।

    याचिका पर विचार लंबित रहने तक, इसमें दान रजिस्टर, खाता बही, सीसीटीवी फुटेज, बैंक रिकॉर्ड और सॉफ्टवेयर डेटाबेस सहित सभी भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के निर्देश देने की भी मांग की गयी है, ताकि उनके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की आशंका को दूर किया जा सके।

    याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हालांकि इन आरोपों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है, लेकिन जांच बिना प्राथमिकी दर्ज किए शुरू हुई है, जिससे इसके निष्कर्षों को चुनौती दी जा सकती है।

    याचिकाकर्ताओं के अनुसार, एसआईटी के पास जटिल वित्तीय लेन-देन और डिजिटल साक्ष्यों से जुड़े आरोपों की जांच के लिए आवश्यक फोरेंसिक विशेषज्ञता और खोजी संसाधनों की भी कमी है।

    एक पुराने उदाहरण का हवाला देते हुए, याचिका में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम से जुड़े कथित मिलावटी घी विवाद की जांच का संदर्भ दिया गया है, जहां सीबीआई के नेतृत्व में एक बहुविषय एसआईटी का गठन किया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान मामले की जांच के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था की आवश्यकता है।

  • Proof of Citizenship: आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब

    Proof of Citizenship: आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब

    Proof of Citizenship: उच्चतम न्यायालय ने आधार कार्ड को नागरिकता, निवास, जन्मतिथि और पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा। याचिका में कहा गया है कि आधार का उपयोग केवल पहचान सत्यापन तक सीमित है और इसे नागरिकता अथवा निवास के प्रमाण के रूप में मानना आधार अधिनियम, 2016 तथा यूआईडीएआई के दिशा-निर्देशों के विपरीत है।

    याचिका में आधार अधिनियम की धारा 9 का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार आधार संख्या या उसका प्रमाणीकरण किसी व्यक्ति की नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं माना जा सकता। साथ ही अगस्त 2023 में जारी यूआईडीएआई की अधिसूचना का भी हवाला दिया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि आधार केवल पहचान का दस्तावेज है, न कि नागरिकता, जन्मतिथि या पते का प्रमाण।

    याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद विभिन्न सरकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में आधार को उम्र, पते और नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इनमें स्कूलों में प्रवेश, जन्म प्रमाण-पत्र जारी करना, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस तथा संपत्ति से जुड़े लेन-देन शामिल हैं।

    याचिका में विशेष रूप से चुनाव आयोग के फॉर्म-6 पर आपत्ति जताई गई है, जिसका उपयोग नए मतदाता पंजीकरण के लिए किया जाता है। इसमें आधार को जन्मतिथि और निवास संबंधी दस्तावेज के रूप में स्वीकार किए जाने को चुनौती दी गई है।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि आधार केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है। यह उन सभी निवासियों के लिए उपलब्ध है, जिनमें ऐसे विदेशी नागरिक भी शामिल हैं जिन्होंने निर्धारित अवधि तक भारत में निवास किया हो। याचिका में यह भी कहा गया है कि आधार प्राप्त करने के लिए किरायानामा या स्थानीय जनप्रतिनिधि के प्रमाण-पत्र जैसे दस्तावेज पर्याप्त होते हैं, इसलिए इसे नागरिकता का आधार नहीं माना जा सकता। मामले की अगली सुनवाई में केंद्र, राज्यों और चुनाव आयोग की ओर से जवाब दाखिल किए जाने की संभावना है।

  • Alwar Court Action: झूठे मुकदमे दर्ज कराने वालों पर अदालत का शिकंजा, दो परिवादी दंडित

    Alwar Court Action: झूठे मुकदमे दर्ज कराने वालों पर अदालत का शिकंजा, दो परिवादी दंडित

    Alwar Court Action: राजस्थान के अलवर जिले में अदालत ने फर्जी शिकायतें दर्ज कराने के दो मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित परिवादियों पर आर्थिक दंड लगाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस जांच रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद दोनों शिकायतों को निराधार माना तथा शिकायतकर्ताओं को झूठा मामला दर्ज कराने का दोषी ठहराया। इसके तहत उन पर जुर्माना लगाया गया।

    यह कार्रवाई राजस्थान पुलिस द्वारा झूठे मुकदमों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे विशेष अभियान के अंतर्गत की गई। पुलिस अधीक्षक सुधीर चौधरी के मार्गदर्शन में खेड़ली थाना पुलिस ने दोनों मामलों की जांच कर अपनी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की थी।

    पहले मामले में खेड़ली थाना क्षेत्र के भनोखर गांव निवासी फारूक खान ने एक व्यक्ति पर दुकान में घुसकर मारपीट करने और नकदी चोरी करने का आरोप लगाया था। जांच के दौरान शिकायत में लगाए गए आरोप असत्य पाए गए। इसके बाद पुलिस ने अदालत में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की। न्यायिक मजिस्ट्रेट, खेड़ली ने शिकायतकर्ता को झूठा आरोप लगाने का दोषी मानते हुए उस पर 1500 रुपये का जुर्माना लगाया।

    दूसरे मामले में गंगा देवी ने कुछ व्यक्तियों के खिलाफ घर में घुसकर छेड़छाड़ और दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था। पुलिस की जांच में ये आरोप भी बेबुनियाद साबित हुए। इसके बाद न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए शिकायतकर्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की।

  • Bombay High Court: बम्बई उच्च न्यायालय को मिले छह नए स्थायी न्यायाधीश, केंद्र सरकार ने जारी की नियुक्ति अधिसूचना

    Bombay High Court: बम्बई उच्च न्यायालय को मिले छह नए स्थायी न्यायाधीश, केंद्र सरकार ने जारी की नियुक्ति अधिसूचना

    Bombay High Court: केंद्र सरकार ने बम्बई उच्च न्यायालय के छह अतिरिक्त न्यायाधीशों को स्थायी न्यायाधीश नियुक्त करने की अधिसूचना जारी की है। विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रपति ने संविधान के तहत प्राप्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए इन नियुक्तियों को मंजूरी प्रदान की है।

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    स्थायी न्यायाधीश बनाए गए न्यायाधीशों में निवेदिता प्रकाश मेहता, प्रफुल्ल सुरेंद्र कुमार खुबलकर, अश्विन दामोदर भोबे, रोहित वासुदेव जोशी, अद्वैत महेंद्र सेथना और प्रवीण शेषराव पाटिल शामिल हैं। ये सभी अब बम्बई उच्च न्यायालय में नियमित रूप से न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करेंगे।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इन नियुक्तियों से न्यायालय की कार्यक्षमता बढ़ेगी और लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है। न्यायपालिका में रिक्त पदों को भरने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • Supreme Court New Judges: सुप्रीम कोर्ट को मिले पांच नए जज, कुल संख्या बढ़कर होगी 37

    Supreme Court New Judges: सुप्रीम कोर्ट को मिले पांच नए जज, कुल संख्या बढ़कर होगी 37

    Supreme Court New Judges: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। इन न्यायाधीशों के शपथ लेने के बाद मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के जजों की कुल संख्या 37 हो जाएगी।

    विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकिटा सुब्रमणि मोहना तथा चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों/न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त करने की मंजूरी दी है।

    नियुक्त किए गए न्यायाधीशों में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति चंद्रशेखर, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण पल्ली शामिल हैं।

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    सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, इन सभी की नियुक्ति उनके पदभार ग्रहण करने की तारीख से प्रभावी मानी जाएगी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पिछले महीने इन नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी, जिसके बाद नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की गई।

    वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकिटा सुब्रमणि मोहना की नियुक्ति के साथ ही सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर दो हो जाएगी। फिलहाल केवल B. V. Nagarathna महिला न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। अगस्त 2021 के बाद पहली बार किसी महिला न्यायाधीश की नियुक्ति हुई है।

    हाल ही में केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी थी। वर्तमान में शीर्ष अदालत में 32 न्यायाधीश कार्यरत हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम Court की स्थापना के समय इसमें केवल आठ न्यायाधीश थे।

  • Varun Dhawan: वरुण धवन पहुंचे दिल्ली हाईकोर्ट, नाम और तस्वीर के गलत इस्तेमाल पर मांगी कानूनी सुरक्षा

    Varun Dhawan: वरुण धवन पहुंचे दिल्ली हाईकोर्ट, नाम और तस्वीर के गलत इस्तेमाल पर मांगी कानूनी सुरक्षा

    Varun Dhawan: बॉलीवुड अभिनेता वरुण धवन ने अपने नाम, तस्वीर, आवाज और डिजिटल पहचान के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अभिनेता ने अदालत से अनुरोध किया है कि उनकी अनुमति के बिना उनके व्यक्तित्व से जुड़े किसी भी तत्व का व्यावसायिक या भ्रामक उपयोग रोका जाए।

    याचिका में कहा गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग के दौर में किसी सेलिब्रिटी की पहचान का दुरुपयोग करना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। ऐसे में उनकी छवि, नाम और प्रतिष्ठा की सुरक्षा के लिए कानूनी संरक्षण आवश्यक है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अभिनेता को अंतरिम राहत देने की संभावना जताई। कोर्ट ने यह भी माना कि किसी व्यक्ति, विशेषकर सार्वजनिक हस्ती, की पहचान और छवि का अनधिकृत उपयोग उसके अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

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    हाल के वर्षों में कई प्रसिद्ध कलाकारों ने भी अपने पर्सनालिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए अदालत का रुख किया है। मनोरंजन उद्योग में यह मुद्दा तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है, क्योंकि AI आधारित सामग्री, डीपफेक वीडियो और फर्जी विज्ञापनों में सेलिब्रिटीज की तस्वीरों और आवाजों का उपयोग बढ़ रहा है।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में व्यापक दिशा-निर्देश जारी करती है, तो यह अन्य कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पहचान के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिल सकती है।

    फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है और मनोरंजन जगत की नजरें इस पर टिकी हुई हैं। यह मामला डिजिटल युग में सेलिब्रिटी अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस का हिस्सा बन गया है।

  • Twisha Sharma case: विकास पाहवा ने ट्विशा शर्मा मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का किया स्वागत!

    Twisha Sharma case: विकास पाहवा ने ट्विशा शर्मा मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का किया स्वागत!

    Twisha Sharma case: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने सोमवार को ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह आदेश सार्वजनिक दबाव और मीडिया द्वारा गढ़ी गयी कहानियों से मुक्त, निष्पक्ष और तटस्थ आपराधिक जांच के महत्व को और मज़बूत करता है।

    पाहवा ने कहा कि न्यायालय ने जांच में जनता का भरोसा बनाए रखने और कानूनी प्रक्रिया की गरिमा की रक्षा करने के बीच एक संतुलन बनाया है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने इस मामले में शामिल किसी भी व्यक्ति के दोषी होने या निर्दोष होने पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

    पाहवा ने “मीडिया ट्रायल” के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की चेतावनी पर कहा कि आपराधिक मामले तेज़ी से सार्वजनिक तमाशे बनते जा रहे हैं, जहाँ सबूतों की ठीक से जांच किए जाने से पहले ही आरोप और निष्कर्ष बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल आरोपी के अधिकारों को नुकसान पहुँचा सकता है और गवाहों, जांचकर्ताओं तथा न्याय के समग्र प्रशासन पर बुरा असर डाल सकता है।

    संबंधित खबरें: Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील!

    अदालत की टिप्पणियों का ज़िक्र करते हुए पाहवा ने कहा कि शीर्ष अदालत ने मीडिया, परिवार के सदस्यों, आरोपियों और आम जनता सहित सभी संबंधित पक्षों को याद दिलाया है कि बयान जांच एजेंसियों के सामने दिए जाने चाहिए, न कि टेलीविज़न बहसों या सार्वजनिक अभियानों के ज़रिए। उन्होंने कहा कि जांच को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का कदम संस्थागत भरोसे को बहाल करने और इस मामले में एक स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया प्रतीत होता है।

    पाहवा ने कहा कि इस आदेश से संवेदनशील आपराधिक मामलों में ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस शुरू होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बोलने की आज़ादी और प्रेस की आज़ादी के साथ यह कर्तव्य भी जुड़ा है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई दखल न दिया जाए। उन्होंने कहा, “एक युवती की दुर्भाग्यपूर्ण मौत एक निष्पक्ष, तटस्थ और पेशेवर जांच की हकदार है।” उन्होंने कहा कि यह उद्देश्य तभी हासिल किया जा सकता है जब संस्थाओं को सनसनीखेज़पन या बाहरी दबाव के बिना काम करने दिया जाए।

  • Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील!

    Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील!

    Twisha Sharma Death Case: उच्चतम न्यायालय ने ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में मीडिया से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि पीड़िता के परिवार या आरोपियों के परिवार के बयानों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित न किया जाए।

    शीर्ष अदालत ने ट्विशा शर्मा मृत्यु मामले में कथित संस्थागत पक्षपात और प्रक्रियागत त्रुटियों से संबंधित स्वत: संज्ञान मामले पर सुनवाई की। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने की।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “कुछ घटनाक्रमों से हमें पीड़ा हुई है। हम मीडिया से अनुरोध करते हैं कि वह पीड़िता के परिवार या दूसरे पक्ष के बयानों पर ज्यादा ध्यान न दे। मामले को कानून और प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ने दिया जाए।”

    उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मामले में एक पूर्व जिला न्यायाधीश और एक वकील के खिलाफ आरोप होने के कारण न्यायपालिका द्वारा आरोपियों को संरक्षण दिए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

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    शीर्ष अदालत ने मीडिया से भी संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि पीड़िता के परिवार या आरोपियों के परिवार के बयानों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित न किया जाए। नोएडा निवासी ट्विशा शर्मा पूर्व ‘मिस पुणे’ विजेता थीं।

    उन्होंने पांच महीने पहले डेटिंग ऐप के माध्यम से परिचय होने के बाद भोपाल निवासी वकील समर्थ सिंह से विवाह किया था। समर्थ सिंह का परिवार न्यायपालिका से जुड़ा हुआ बताया गया है। समर्थ सिंह जहां पेशे से वकील हैं, वहीं उनकी मां गिरिबाला सिंह सेवानिवृत्त न्यायाधीश और वर्तमान में जिला उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग की अध्यक्ष हैं।

    विवाह के महज पांच महीने बाद 12 मई 2026 को ट्विशा शर्मा अपने घर में जिम्नास्टिक रस्सी से लटकी हुई पाई गई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, सीबीआई की एक टीम ट्विशा शर्मा की मृत्यु मामले की जांच औपचारिक रूप से अपने हाथ में लेने के लिए भोपाल रवाना हो चुकी है।

  • National Lok Adalat: नेशनल लोक अदालत में ठाणे जिले का राज्य में दबदबा; 29 हजार केस निपटाए!

    National Lok Adalat: नेशनल लोक अदालत में ठाणे जिले का राज्य में दबदबा; 29 हजार केस निपटाए!

    National Lok Adalat: नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी और महाराष्ट्र स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी के निर्देशानुसार, साल की दूसरी ‘नेशनल लोक अदालत’ शनिवार, 9 मई, 2026 को ठाणे जिले में लगी। ठाणे जिले ने इस लोक अदालत में पेंडिंग केस निपटाने में अपना दबदबा बनाए रखा है और लगातार पांचवीं बार राज्य में पहला स्थान हासिल किया है। चीफ डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज और डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी के चेयरमैन श्रीनिवास बी. अग्रवाल के मार्गदर्शन में, ठाणे और पालघर जिले की सभी अदालतों में कुल 110 पैनल के ज़रिए इस लोक अदालत की कार्रवाई की गई।

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    इस लोक अदालत में कुल 29 हजार 392 केस निपटाए गए। इसमें 12,186 लंबित मामले और 17,206 प्री-लिटिगेशन मामले शामिल हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से 63,42,52,648 रुपये का रिकॉर्ड समझौता किया गया है।इस बार 5, 10, 20 और यहां तक ​​कि 30 साल से लंबित कुल 567 पुराने मामलों का सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा किया गया।मोटर दुर्घटना बीमा दावे: जिले में 120 मामलों में 15,64,000 रुपये का मुआवजा मंजूर किया गया।

    एक विशेष मामले में, मृतक के उत्तराधिकारियों को 87 लाख रुपये का मुआवजा चेक प्रदान किया गया। पारिवारिक सुलह: पारिवारिक विवादों के 30 मामलों में सफल समझौता किया गया, जिनमें से 7 मामलों में पति-पत्नी ने फिर से साथ रहने का फैसला किया।चेक अनादर और अन्य: चेक अनादर (एन.आई. एक्ट 138) के 1,146 मामलों का निपटारा किया गया और रु। 19 करोड़ 58 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। साथ ही, ट्रांसपोर्ट बिल के 6,983 मामलों का भी निपटारा किया गया।