भगोड़े कारोबारी Vijay Mallya ने भारत लौटने को लेकर असमर्थता जताई है। बुधवार को Bombay High Court में सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि वह यह नहीं बता सकते कि वह भारत कब लौट पाएंगे।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश आलोक आराधे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ कर रही है। पिछली सुनवाई में अदालत ने माल्या से पूछा था कि क्या उनका भारत लौटने का इरादा है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि उनकी अनुपस्थिति में याचिकाओं पर सुनवाई करना मुश्किल होगा।
माल्या ने क्या कहा?
माल्या की ओर से वरिष्ठ वकील अमित देसाई ने अदालत में उनका बयान पढ़ा। बयान में कहा गया कि उनका भारतीय पासपोर्ट 2016 में रद्द कर दिया गया था। साथ ही, यूनाइटेड किंगडम की अदालतों के आदेशों के कारण वह ब्रिटेन से बाहर यात्रा नहीं कर सकते।
दलील दी गई कि उन्हें किसी भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा दस्तावेज के लिए आवेदन करने या उसे रखने की अनुमति नहीं है। ऐसे में वह यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि भारत कब लौट सकेंगे।
माल्या मार्च 2016 से ब्रिटेन में रह रहे हैं।
किन याचिकाओं पर चल रही है सुनवाई?
माल्या ने हाई कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल की हैं—
उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने के आदेश को चुनौती।
भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती।
बचाव पक्ष का कहना है कि आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के लिए उनका भारत में मौजूद होना जरूरी नहीं है।
क्या हैं आरोप?
70 वर्षीय माल्या पर बैंकों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज की अदायगी में चूक और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। जनवरी 2019 में एक विशेष अदालत ने उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया था।
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को माल्या के बयान पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई अगले महीने होगी।
अहमदाबाद में खेले गए टी20 वर्ल्ड कप (ICC Men’s T20 World Cup) 2026 के 36वें मुकाबले में भारतीय टीम ने नीदरलैंड को 17 रन से हराकर टूर्नामेंट में अपनी लगातार चौथी जीत दर्ज की। पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने 20 ओवर में 5 विकेट के नुकसान पर 193 रन बनाए। जवाब में नीदरलैंड की टीम निर्धारित 20 ओवर में 176 रन ही बना सकी।
भारत की पारी: दुबे की तूफानी अर्धशतकीय पारी
टॉस के बाद पहले बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम की शुरुआत निराशाजनक रही। अभिषेक शर्मा लगातार तीसरे मैच में बिना खाता खोले आउट हो गए। हालांकि इसके बाद ईशान किशन ने आक्रामक अंदाज में 7 गेंदों पर 18 रन बनाकर रनगति तेज की, लेकिन वे भी बड़ी पारी नहीं खेल सके।
मुकाबले का रुख उस समय बदला जब शिवम दुबे क्रीज पर आए। उन्होंने विस्फोटक बल्लेबाजी करते हुए महज 31 गेंदों में 66 रन ठोक दिए। उनकी पारी में 4 चौके और 6 गगनचुंबी छक्के शामिल रहे। हार्दिक पांड्या ने भी 21 गेंदों में 30 रन का योगदान दिया। रिंकू सिंह 6 रन बनाकर नाबाद रहे। भारत ने निर्धारित 20 ओवर में 193/5 का मजबूत स्कोर खड़ा किया।
नीदरलैंड की ओर से लोगन वैन बीक ने 3 विकेट लेकर भारतीय बल्लेबाजों पर दबाव बनाने की कोशिश की, जबकि आर्यन दत्त को 2 सफलता मिली।
नीदरलैंड की पारी: संघर्ष के बावजूद लक्ष्य से दूर
194 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी नीदरलैंड की टीम ने शुरुआत संभलकर की, लेकिन नियमित अंतराल पर विकेट गिरने से वे दबाव में आ गए। भारतीय गेंदबाजों ने बीच के ओवरों में सटीक लाइन-लेंथ के साथ रन गति पर लगाम कसी।
मध्यक्रम के बल्लेबाजों ने साझेदारी की कोशिश की, लेकिन रन रेट बढ़ने के साथ जोखिम उठाने पड़े और विकेट गिरते रहे। अंतिम ओवरों में तेज रन बटोरने की कोशिश के बावजूद टीम 20 ओवर में 176 रन तक ही पहुंच सकी।
प्लेइंग इलेवन में बदलाव
इस मुकाबले में भारतीय टीम मैनेजमेंट ने दो बदलाव किए। अक्षर पटेल और कुलदीप यादव की जगह वॉशिंगटन सुंदर और अर्शदीप सिंह को मौका दिया गया। वहीं, नीदरलैंड ने भी एक बदलाव करते हुए नोह क्रोस को अंतिम एकादश में शामिल किया।
मैच का नतीजा और महत्व
इस जीत के साथ भारत ने अंक तालिका में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। लगातार चार जीत दर्ज कर टीम ने सेमीफाइनल की ओर मजबूत कदम बढ़ा दिए हैं। दूसरी ओर, नीदरलैंड को इस हार के बाद आगे के मुकाबलों में जीत की सख्त जरूरत होगी।
शिवम दुबे की तूफानी पारी इस मैच का सबसे बड़ा आकर्षण रही, जिसने भारत को 190 के पार पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यूट्यूबर Elvish Yadav के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज मामले की सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि लोकप्रिय व्यक्तियों को “बेजुबान पीड़ित” जैसे सांपों का मनोरंजन के लिए उपयोग करने की अनुमति दी जाती है, तो इससे समाज में “बहुत गलत संदेश” जाएगा।
मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
क्या कहा अदालत ने?
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरश और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ एल्विश यादव की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने नोएडा में कथित रेव पार्टी में सांप के जहर के उपयोग से जुड़े मामले में दाखिल आरोपपत्र और आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने सवाल उठाया:
“क्या लोकप्रिय लोग मनोरंजन के लिए वन्यजीवों(Wildlife) के साथ इस प्रकार का व्यवहार कर सकते हैं? यदि उन्हें ऐसा करने दिया गया तो समाज में बहुत गलत संदेश जाएगा… क्या आप चिड़ियाघर जाकर जानवरों के साथ खेल सकते हैं? आप यह नहीं कह सकते कि आप जो चाहें करेंगे।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका मुख्य सरोकार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत से है।
क्या है मामला?
एल्विश यादव के खिलाफ नवंबर 2023 में मामला(Case) दर्ज हुआ था और 17 मार्च 2024 को उन्हें गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन के अनुसार पुलिस ने नौ सांप, जिनमें पांच कोबरा शामिल थे, बरामद किए थे। आरोप है कि कथित रेव पार्टियों में सांप के जहर का नशीले पदार्थ की तरह उपयोग किया जाता था।
आरोपपत्र में दावा किया गया कि ऐसी पार्टियों में विदेशी नागरिकों सहित कई लोग कथित तौर पर सांप के जहर का सेवन करते थे।
बचाव पक्ष की दलील
यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि वे केवल गायक के एक वीडियो में अतिथि के रूप में शामिल हुए थे और किसी रेव पार्टी या प्रतिबंधित पदार्थ के सेवन का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने कहा कि यादव कथित स्थल पर मौजूद नहीं थे, न ही उनके पास से कोई सांप या नशीला पदार्थ बरामद हुआ।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त 2024 को ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। अब शीर्ष अदालत मामले में दर्ज शिकायत की जांच करेगी और अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि केवल योनि के बाहरी हिस्से पर वीर्यपात करना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के तहत ‘बलात्कार’ की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बलात्कार की कानूनी परिभाषा में ‘संभोग’ या ‘प्रवेश’ (penetration) का तत्व आवश्यक है।
अदालत की प्रमुख टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि यदि अभियोजन पक्ष ‘प्रवेश’ साबित नहीं कर पाता, तो इसे बलात्कार नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी हरकत अन्य धाराओं के तहत दंडनीय हो सकती है, जिनमें यौन उत्पीड़न या महिला की मर्यादा भंग करने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं।
क्या था मामला?
मामला एक आपराधिक अपील से जुड़ा था, जिसमें निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने साक्ष्यों और चिकित्सकीय रिपोर्ट के आधार पर पाया कि ‘प्रवेश’ का स्पष्ट प्रमाण नहीं है, इसलिए बलात्कार का आरोप टिक नहीं सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि आरोपित का आचरण आपत्तिजनक और दंडनीय है तथा संबंधित अन्य धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
यह फैसला कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है और ‘बलात्कार’ की परिभाषा को लेकर बहस छिड़ गई है।
निजी अंग पकड़ना, पायजामे का नाड़ा खींचना ‘बलात्कार का प्रयास’?, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विवादास्पद आदेश को किया रद्द
नई दिल्ली – उच्चतम न्यायालय(Supreme Court) ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक विवादास्पद आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना ‘‘बलात्कार का प्रयास’’ माना जाएगा, न कि केवल ‘‘तैयारी’’।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारी की पीठ ने कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से गलत प्रयोग किया गया था, इसलिए उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया जाना आवश्यक है।
🔎 क्या था मामला?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने 17 मार्च, 2025 के आदेश में कहा था कि स्तन पकड़ना और पायजामे की डोरी खींचना बलात्कार का अपराध नहीं, बल्कि केवल उसकी तैयारी है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 10 फरवरी को सुनवाई की।
शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि आरोपी व्यक्तियों ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के तहत अपराध करने के पूर्व निर्धारित इरादे से कार्य किया।
📜 पीओसीएसओ के तहत बहाल हुआ आरोप
सर्वोच्च न्यायालय(Supreme Court) ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दो आरोपियों के खिलाफ ‘‘बलात्कार के प्रयास’’ का गंभीर आरोप बहाल कर दिया। साथ ही विशेष न्यायाधीश (पीओसीएसओ), कासगंज द्वारा 23 जून, 2023 को पारित मूल समन आदेश को भी बहाल कर दिया गया।
पीठ ने कहा:
“आरोपी व्यक्तियों द्वारा किया गया प्रयास स्पष्ट रूप से इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष द्वारा बलात्कार के प्रयास के प्रावधानों को लागू करने का मामला बनता है। अतः विवादित निर्णय को रद्द किया जाता है।”
इस फैसले को यौन अपराधों के मामलों में ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
नई दिल्ली – भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने 10 राज्यों में राज्यसभा की 37 सीटों के लिए द्विवार्षिक चुनावों का कार्यक्रम घोषित किया है। मतदान 16 मार्च को होगा, जबकि पूरी चुनाव प्रक्रिया 20 मार्च तक संपन्न कर ली जाएगी।
📅 प्रमुख तिथियां:
अधिसूचना जारी: 26 फरवरी
नामांकन की अंतिम तिथि: 5 मार्च
नामांकन पत्रों की जांच: 6 मार्च
नाम वापसी की अंतिम तिथि: 9 मार्च
मतदान: 16 मार्च
मतगणना: 16 मार्च, शाम 5 बजे से
आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतपत्रों पर वरीयता अंकित करने के लिए केवल रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा उपलब्ध कराए गए बैंगनी रंग के निर्धारित रेखाचित्र पेन का ही उपयोग किया जाएगा। किसी अन्य पेन का उपयोग मान्य नहीं होगा।
📍 राज्यवार रिक्त सीटें
महाराष्ट्र – 07
ओडिशा – 04
तेलंगाना – 02
तमिलनाडु – 06
छत्तीसगढ़ – 02
पश्चिम बंगाल – 05
असम – 03
हरियाणा – 02
हिमाचल प्रदेश – 01
बिहार – 05
🧾 प्रमुख सेवानिवृत्त सांसद
इस चुनाव में जिन प्रमुख सांसदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें शामिल हैं:
Sharad Pawar (एनसीपी-एसपी)
Abhishek Manu Singhvi (कांग्रेस)
Saket Gokhale (टीएमसी)
Ramdas Athawale (आरपी-आई-ए)
M. Thambidurai (एआईएडीएमके)
Tiruchi Siva (डीएमके)
📢 EVM-VVPAT जागरूकता अभियान
एक अलग पहल के तहत आयोग ने असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में ईवीएम और वीवीपीएटी के प्रति मतदाताओं को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया है।
आयोग के अनुसार:
1,20,000 से अधिक मतदाता प्रदर्शन शिविरों में शामिल हुए।
1,16,000 से अधिक लोगों ने मॉक वोट डाले।
10 फरवरी तक मोबाइल प्रदर्शन वैन 29,000 से अधिक मतदान केंद्रों को कवर कर चुकी हैं।
नई दिल्ली। भारत में देशभक्ति सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि जनमानस की पहचान है। “वंदे मातरम्”(Vande Mataram 2026) और “भारत माता की जय” जैसे उद्घोष स्वतंत्रता संग्राम की विरासत हैं। लेकिन आज एक गंभीर सवाल उठ रहा है— क्या राष्ट्रवाद के नारों का इस्तेमाल जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए किया जा रहा है?
नारा बनाम नौकरियाँ: बहस का केंद्र
देश का युवा पूछ रहा है—
नौकरी कहाँ है?
भर्ती परीक्षाएँ समय पर क्यों नहीं हो रहीं?
पेपर लीक क्यों रुक नहीं रहा?
मध्यम वर्ग पूछ रहा है—
महंगाई पर नियंत्रण कब होगा?
टैक्स और EMI के बीच राहत कहाँ है?
किसान पूछ रहा है—
लागत से कम दाम क्यों मिल रहा है?
MSP पर कानूनी गारंटी क्यों नहीं?
लेकिन सार्वजनिक विमर्श में इन सवालों से ज्यादा चर्चा राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की दिखाई देती है। यही विरोधाभास बहस को जन्म देता है।
राष्ट्रवाद: भावना या राजनीतिक रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि भावनात्मक मुद्दे—
राष्ट्रवाद
धार्मिक प्रतीक
सीमा और सुरक्षा
ऐतिहासिक विवाद
—अक्सर चुनावी विमर्श में प्रमुखता पा जाते हैं, क्योंकि वे तेज प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं।
आलोचकों का आरोप है कि जब आर्थिक या प्रशासनिक सवालों पर दबाव बढ़ता है, तो भावनात्मक मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है।
वहीं सरकार और समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रवाद और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय गौरव, सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान भी उतने ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जितने रोज़गार और महंगाई।
बेरोज़गारी और महंगाई: आंकड़ों की हकीकत
विभिन्न रिपोर्टों में युवाओं में बेरोज़गारी दर चिंता का विषय बताई जाती रही है।
भर्ती परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक की घटनाएँ कई राज्यों में सुर्खियाँ बनी हैं।
महंगाई, विशेषकर खाद्य और ईंधन की कीमतें, घरेलू बजट पर असर डाल रही हैं।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की बड़ी आबादी युवा है, और रोजगार सृजन सरकारों के लिए केंद्रीय चुनौती बना हुआ है।
मीडिया की भूमिका पर भी सवाल
एक वर्ग का आरोप है कि मुख्यधारा मीडिया में बहसें अक्सर राष्ट्रवाद और राजनीतिक टकराव पर केंद्रित रहती हैं, जबकि रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं।
हालाँकि, मीडिया संस्थानों का पक्ष है कि वे वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं और जो राजनीतिक रूप से प्रासंगिक होता है।
असली राष्ट्रवाद क्या है?
राष्ट्रवाद का अर्थ सिर्फ नारे नहीं, बल्कि नागरिकों का जीवन स्तर भी है। अगर राष्ट्र सशक्त है, तो—
युवा को अवसर मिलना चाहिए
किसान को सम्मानजनक आय मिलनी चाहिए
शिक्षा और स्वास्थ्य सुलभ होने चाहिए
महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए
देशभक्ति और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है, और जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी।
“वंदे मातरम्” का सम्मान, राजनीतिक हथियार नहीं
“वंदे मातरम्” भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का गौरवशाली प्रतीक है। इसका सम्मान तब और सार्थक होगा जब:
देश का युवा आत्मनिर्भर बने
किसान कर्ज और संकट से मुक्त हो
गरीब भूखा न सोए
मध्यम वर्ग आर्थिक असुरक्षा से बाहर निकले
नारा तब ताकत बनता है, जब उसके पीछे ठोस नीति और परिणाम हों।
निष्कर्ष: शोर नहीं, समाधान चाहिए
देश को राष्ट्रवाद बनाम रोज़गार की बहस में उलझने की बजाय दोनों के बीच संतुलन चाहिए।
भावनात्मक मुद्दे अपनी जगह
आर्थिक और सामाजिक मुद्दे अपनी जगह
आखिरकार लोकतंत्र में नागरिकों का अधिकार है कि वे पूछें— विकास कहाँ है? रोजगार कब मिलेगा? महंगाई कब घटेगी?
देशभक्ति का अर्थ सिर्फ उद्घोष नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन भी है और यही किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत होती है।
भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र (INDIA-US Agro Trade Deal) में बढ़ते सहयोग और संभावित व्यापारिक समझौतों को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। विपक्ष के कुछ नेताओं और किसान संगठनों का आरोप है कि यह समझौता भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है और “किसानों के डेथ वारंट” पर हस्ताक्षर जैसा कदम है।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आइए विस्तार से समझते हैं।
कृषि समझौते की पृष्ठभूमि
भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार पहले से ही जारी है। भारत अमेरिका से बादाम, सेब, दालें और कृषि तकनीक आयात करता है, जबकि अमेरिका को चावल, मसाले, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि उत्पाद निर्यात करता है।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच:
कृषि बाजारों को खोलने,
टैरिफ कम करने,
जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों के आयात,
डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के व्यापार को लेकर चर्चा तेज हुई है।
इसी संदर्भ में प्रस्तावित या चर्चित “कृषि डील” को लेकर किसानों में आशंकाएँ पैदा हुई हैं।
किसानों की प्रमुख चिंताएँ
1. सस्ते आयात का खतरा
अमेरिका में कृषि बड़े पैमाने पर, अत्याधुनिक तकनीक और भारी सरकारी सब्सिडी के सहारे की जाती है। यदि भारतीय बाजार अमेरिकी गेहूं, मक्का, सोयाबीन या डेयरी उत्पादों के लिए खुलता है, तो:
भारतीय किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में भारी नुकसान हो सकता है
एमएसपी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है
छोटे और सीमांत किसान बाजार से बाहर हो सकते हैं
2. जीएम फसलों का मुद्दा
अमेरिका जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों का बड़ा उत्पादक है। यदि ऐसे उत्पाद भारत में व्यापक रूप से आयात होते हैं, तो:
जैव विविधता पर असर पड़ सकता है
पारंपरिक बीजों और स्थानीय खेती पर संकट आ सकता है
बीज कंपनियों की निर्भरता बढ़ सकती है
3. डेयरी सेक्टर पर दबाव
भारत का डेयरी क्षेत्र मुख्यतः छोटे किसानों और सहकारी मॉडल (जैसे अमूल) पर आधारित है। अमेरिकी डेयरी उत्पादों को अनुमति मिलने से लाखों दुग्ध उत्पादकों की आय पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि:
कोई भी समझौता भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करते हुए ही किया जाएगा।
निर्यात के नए अवसर खुलेंगे, जिससे किसानों को वैश्विक बाजार मिलेगा।
कृषि तकनीक, कोल्ड स्टोरेज, सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग में निवेश बढ़ेगा।
भारत को उच्च गुणवत्ता वाले बीज और तकनीकी सहयोग मिलेगा।
सरकार यह भी तर्क देती है कि वैश्विक व्यापार से अलग रहकर भारत कृषि क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी नहीं बना सकता।
“डेथ वारंट” वाली राजनीति
“डेथ वारंट” जैसे शब्द राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं। विपक्ष इसे 2020 के कृषि कानूनों की याद से जोड़ता है, जब बड़े कॉर्पोरेट और विदेशी कंपनियों के प्रवेश को लेकर व्यापक किसान आंदोलन हुआ था।
आलोचकों का कहना है कि:
यह समझौता धीरे-धीरे कृषि बाजार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल देगा
एमएसपी कानूनी गारंटी से ध्यान हटाया जा रहा है
आत्मनिर्भर कृषि मॉडल कमजोर होगा
वहीं समर्थकों का दावा है कि:
भारतीय किसान अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं
निर्यात-आधारित कृषि से आय दोगुनी करने का लक्ष्य मजबूत होगा
वास्तविक खतरा कहाँ है?
सवाल यह नहीं है कि अमेरिका के साथ समझौता हो या न हो। असली मुद्दा यह है कि:
क्या भारतीय किसानों को बराबर की सब्सिडी और सुरक्षा मिलेगी?
क्या एमएसपी और सार्वजनिक खरीद प्रणाली बरकरार रहेगी?
क्या छोटे किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी?
यदि सुरक्षा उपायों के बिना बाजार पूरी तरह खोल दिया गया, तो छोटे किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन यदि समझौता संतुलित शर्तों और चरणबद्ध तरीके से लागू हुआ, तो यह अवसर भी बन सकता है।
नई दिल्ली। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इंडिया ब्लॉक ने स्पीकर को हटाने से संबंधित प्रस्ताव का नोटिस दाखिल किया है, जिस पर 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। यह प्रस्ताव नियम 94(सी) के तहत दिया गया है, जिसमें 100 से अधिक सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है।
कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कहा कि विपक्ष ने संविधान में अपना पूर्ण विश्वास जताया है। उन्होंने कहा, “माननीय अध्यक्ष महोदय के प्रति हमारा व्यक्तिगत सम्मान है, लेकिन यह बेहद दुखद है कि विपक्षी सांसदों को सार्वजनिक महत्व के मुद्दे उठाने के अवसरों से लगातार रोका जा रहा है। कई वर्षों बाद स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। यह कोई सामान्य कदम नहीं, बल्कि असाधारण परिस्थितियों में उठाया गया असाधारण निर्णय है।”
स्पीकर ने सचिवालय को प्रस्ताव की जांच के निर्देश दिए(Parliament Budget Session)
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने अपने खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को लेकर लोकसभा सचिवालय को निर्देश दिए हैं कि नियमों के तहत इसकी जांच कर आगे की कार्रवाई की जाए।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। टीएमसी नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी संसद को सुचारू रूप से चलने देने के पक्ष में है, इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव से दूरी बनाए रखी है।
इमरान मसूद का तीखा बयान
इस बीच कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का सदन के बाहर दिया गया बयान भी चर्चा में है। उन्होंने कहा, “तो मारते हमें। आप गुंडे हैं न। आप साबित कर रहे हो कि बोलने नहीं देते। लो, अभी यहीं मार लो हमें। सांसदों को बाहर निकाल दिया गया है। आपकी गुंडागर्दी चल रही है, चलाइए। लेकिन लोकतंत्र में गुंडागर्दी की कोई जगह नहीं होती। यह सब इतिहास में दर्ज होगा।”
इन सांसदों ने दिया प्रस्ताव
स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सांसद गौरव गोगोई, के. सुरेश और मोहम्मद जावेद द्वारा दिया गया है। विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्ष तरीके से नहीं चलाई जा रही और विपक्षी सांसदों को लगातार बोलने से रोका जा रहा है।
राजनीतिक मायने
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना अपने आप में दुर्लभ घटना है। इससे संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव और गतिरोध की स्थिति और स्पष्ट होती है।
नई दिल्ली। IDBI बैंक के विनिवेश (IDBI Bank Disinvestment) की प्रक्रिया निर्णायक चरण में पहुंचती नजर आ रही है। स्ट्रेटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट के तहत कोटक महिंद्रा बैंक, एमिरेट्स NBD और फेयरफैक्स इंडिया होल्डिंग्स ने अपनी फाइनेंशियल बोलियां जमा कर दी हैं।
एमिरेट्स NBD दुबई सरकार के स्वामित्व वाला बैंक है, जबकि फेयरफैक्स इंडिया होल्डिंग्स भारतीय मूल के कनाडाई अरबपति प्रेम वत्स की कंपनी है। शॉर्टलिस्ट किए गए इन तीनों बोलीदाताओं की फाइनेंशियल बिड का अब तय प्रक्रिया के तहत वैल्यूएशन किया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, फाइनल चयन केवल सबसे ऊंची बोली के आधार पर नहीं होगा। इसमें प्राइस के साथ-साथ कई क्वालिटेटिव और रेगुलेटरी फैक्टर्स को भी ध्यान में रखा जाएगा, ताकि बैंक की दीर्घकालिक स्थिरता और प्रबंधन क्षमता सुनिश्चित की जा सके।
DIPAM ने की फाइनेंशियल बिड्स की पुष्टि
डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) ने पहले ही फाइनेंशियल बिड्स मिलने की पुष्टि कर दी थी। DIPAM सचिव ने 6 फरवरी को सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी थी कि IDBI बैंक के स्ट्रेटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट के लिए फाइनेंशियल ऑफर प्राप्त हो चुके हैं और उनका मूल्यांकन तय प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।
शॉर्टलिस्ट किए गए निवेशकों से फाइनल फाइनेंशियल ऑफर मिलने के बाद यह सौदा अपने निर्णायक मूल्यांकन चरण में प्रवेश कर जाता है।
सरकार और LIC बेचेगी 60.72% हिस्सेदारी
इस स्ट्रेटेजिक सेल में IDBI बैंक में बहुलांश हिस्सेदारी के साथ-साथ मैनेजमेंट कंट्रोल का हस्तांतरण भी शामिल है। केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर बैंक में कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच रहे हैं। इसमें सरकार की 30.48 प्रतिशत और LIC की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है।
यह विनिवेश केंद्र सरकार के व्यापक स्ट्रेटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य नॉन-टैक्स रेवेन्यू बढ़ाना और नॉन-कोर सेक्टर्स में सरकारी भागीदारी को कम करना है।
2021 में PCA से बाहर निकलने के बाद बढ़ी रफ्तार
IDBI बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया को मार्च 2021 में नई गति मिली थी, जब बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) फ्रेमवर्क से बाहर निकला। एसेट क्वालिटी, कैपिटल एडिक्वेसी और प्रॉफिटेबिलिटी में सुधार के बाद PCA से बाहर आना प्राइवेट निवेशकों को आकर्षित करने के लिए एक अहम शर्त माना जा रहा था। अब फाइनेंशियल बिड्स के मूल्यांकन के साथ IDBI बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया अपने सबसे अहम मोड़ पर पहुंच गई है।