बुनियादी कौशल

Written by

in

नील मणि


आज का युग, ज्ञान के साथ ही विज्ञान का युग बन गया है। बच्चे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पा रहे हैं, विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ लेकर लौट रहे हैं परंतु जीवन के बुनियादी कौशलों से कोसों दूर हैं। वे ‘कक्षा ज्ञान’ में पारंगत हैं लेकिन ‘ज़िंदगी के सबक़’ से अनजान।


मेरी छोटी बहन की कैंसर की कीमो थेरेपी के दौरान मैं उसके भावनात्मक सहयोग के लिए कुछ दिन उसके पास रही। एक रात्रि, जब घरेलू सहायिका जा चुकी थी… मैं अपने भांजे को, जो प्रशासनिक अधिकारी है, दो महीने पहले ही भारतीय सिविल सेवा का प्रशिक्षण लेकर लौटा था… रात्रि का भोजन गर्म करके दे रही थी। तभी मैंने महसूस किया कि किचिन सिंक का पानी रुक रहा है। किचिन में जो भी साधन, नुस्खे- पेचकस, सिरका, नींबू रस, चक्कू आदि मिला- उनसे मैंने सिंक के छिद्रों को खोलने की नाकाम कोशिश की।
अब तक बेटा भी भोजन समाप्त कर, किचिन में आ गया… मुझे सिंक में सटर पटर करते देख पूछने लगा- मौसी क्या हुआ? मैंने तुरंत कहा- बेटा कोई मोटा मजबूत तार मिलेगा… लगता है सिंक के छिद्रों में कचरा फंसा है… पानी बह नहीं रहा।”
बेटा अपनी मासूम सी अनभिज्ञता जताते धीरे से बोला- “मौसी तार-वार तो मुझे कुछ पता नहीं…”
“- ठीक है, तुम अपने कपड़ों की अलमारी से एक एल्यूमिनियम वाला या जिसका तार सख्त न हो… हैंगर ला दो।”

  • “ठीक है।” बेटा तुरंत हैंगर ले आया। मैंने हैंगर के हुक के नीचे जुड़े दोनों सिरों को प्लास व पेचकस की मदद से खोल, तार को सीधा कर सिंक के छिद्रों में बारी-बारी घुमाया- जिससे सारा कचरा पाइप से होता हुआ, नीचे जाली पर इकट्ठा होने लगा। कुछ ही मिनटों में सारा पानी गड़-गड़ कर बह गया।
    बेटा ध्यान से मेरे सब उपक्रम देख रहा था।
    वह चकित होकर बोला— “मौसी, आपने तो कमाल कर दिया! मौसी आज आप नहीं होती तो मैं क्या करता; मुझे तो ऐसे काम बिल्कुल नहीं आते।”
    मैंने सहजता से कहा- बेटा जिंदगी की रोजमर्रा की जरूरतें किताबें नहीं, हमारे अनुभव ही हमें सिखाते हैं।
    उसके चेहरे पर संकोच और भीतर एक अजीब-सी आत्म-स्वीकृति थी— किताबी ज्ञान के बावजूद वह जीवन की छोटी-छोटी परिस्थितियों से निपटने में असहाय है।
    यही आज के शिक्षित समाज की सच्चाई है। हमारे बच्चे तकनीकी, प्रबंधन और प्रशासनिक पाठ्यक्रमों में दक्ष हैं, उनके पास डिग्री है, ज्ञान है, पर अनुभव नहीं। असल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं होता बल्कि जीवन जीने की समझ विकसित करना होता है। परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में ‘जीवन कौशल’ (Life Skills) के लिए कोई स्थान नहीं है। हम बच्चों को हर विषय की थ्योरी सिखा रहे हैं लेकिन प्रयोग नहीं।
    कभी-कभी लगता है— हमने बच्चों को इतना ‘स्मार्ट’ बना दिया कि वे अब किसी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए गूगल सर्च करते हैं। हर ज्ञान का असली मूल्य तभी है, जब वह जीवन को आसान बनाए। आज आवश्यकता है कि हम बच्चों को केवल बुद्धिमान नहीं, व्यवहारिक भी बनाएं क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी डिग्री— ‘अनुभव’ होती है, जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती, बस व्यवहार में लाने से मिलती है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *