Category: Hindi Sahitya

  • घिर घिर आए काले कजरारे मेघ (The sky is filled with deep, dark monsoon clouds)

    रविन्द्र गिन्नौरे

    मानसून आने का उल्लास आस बांधे उन किसानों की आखों से झलकता है जो जेठ की तपती हुई धरती माता के दुख से व्यथित होकर आसमान की ओर टकटकी लगाये बादलों की प्रतीक्षा करते हैं कि कब बादल छाए और बरसात हो। बादलों के छाते ही मोरों के पैर थिरक उठते हैं, पपीहे के बोल फूट पड़ते हैं, दादुरों का राग, झींगुरों का संगीत मुखरित हो उठता है। ऐसा मधुरम संगीत जिसके स्वागत के लिए वो अतिथि कितना अमृतमयी होगा। मानसून के आते ही धरा पर काले कजरारे मेघ छा जाते हैं, रिमझिम बरसात से चराचर जीवन धन्य हो उठता है। हर कवि ने प्रकृति के इस अनूठे कौतुक को अपने काव्य में पिरोया है। लोक गायकों ने अपने गीतों के माध्यम से इसकी यशोगाथा गाई है जिनमें बादलों के लिए जीवन्त प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। संस्कृत कवियों ने बादलों को अमृतमयी व वात्सल्य से भरे कहा है तो कहीं उनके विद्रूप रूप को भी प्रस्तुत किया है। महाकवि जयदेव ने बादलों को ऐसे ही दूसरे रूप में प्रस्तुत करते हुए “भामिनी विलास’ में लिखा है कि
    “धनी से अपने लिए धन लेने वाले का मुँह यदि काला हो तो क्या विचित्रता है कि दूसरों के लिए भी समुद्रों से जल लेने वाले मेघ पूरा का पूरा ही काला हो जाता है,
    “स्वार्थ धनानि धनिकात् प्रतिगृह्रतो यत् आस्यं, भजेन्मालिनता किमिद विचित्रम, गृहणः परार्थमपि वारिनिधेः पयोऽपिं, मेघोऽ‌यमेति सकलोऽपि च कालिमान्‌म।”
    पौराङ्गनाएं कटाक्षों से मेघ के साथ विलास करती हैं। उज्यियिनी की उन्मादिनियाँ मेघ दर्शन से उन्मन्त हो जाती हैं। जनपद की वधुएं कामपुरुष मेघ के अभिराम रूप का पान करती हैं, किन्तु यह सब निरर्थक नहीं है, उनका लक्ष्य कृषि फल प्राप्ति है। मेध कृषि प्रवर्तक हैं, यदि इनके आगमन में विलंब हो जाये तो संपूर्ण वन प्रकृति विस्फारित नेत्रों से आकाश की ओर एकटक निहारने लगती है। मेघ का सुधावर्षण उनके लिए प्राणद है। मेघदूत में कालिदास ने इसलिए ही कहा है,
    “त्वरयत्यायतकृषिफलमिति भूविलासानभिज्ञैः
    प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूधूलिचनैः पीयमानः।।”
    मानसून के आते ही विरहणी की दशा कैसी हो जाती है उनके विरह को संस्कृत कवियों ने चित्रित किया है। विरहणी वर्षा की शोभा को कातर दृष्टि से देख अपनी सखी से कहती है, “देखो आषाढ़ आ गया है, दसों दिशाओं में मेघ आच्छादित हो चुके हैं। कजरारे बादलों के साथ हवाएँ कैसी अठखेलियाँ कर रही हैं, पर है सखी मेरी आशा मुझे केवल धोखा दे रही है,
    “आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाशास्ते ।
    प्रिय सखि मम पुनराशा भ्रमयति भूरि ॥”
    वैसे वर्षा का अनूठा सौंदर्य किसका मन नहीं मोह लेता है। पृथ्वी पर फैली हरियाली और काली घटाओं के बीच रह रह कर प्रदीप्त होती चपला बिजली की चमक अद्‌भुत दिखती है। फूलते हुए कदम्ब के पेड़ पर नाचते मोरों की थिरकन को देखने इंद्रवधू भी घरा पर आ उतरती है। कविवर नंददास ने अत्यंत सूक्ष्मता से बरसात के मौसम का हृदयग्राही चित्र अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से दिखाया है-

    “घन होति हरीरी मही को लखै,
    निरखै घन जो घनज्योति छटा।
    अवलोकति इन्द्रवधू की पत्यारी,
    विलोकति है खिन कारी घटा।
    ताकि डार कदंबन की बरसे
    दरसे, उत नाचत मोर अटा ।
    अधऊरध आवत जात भयो,
    चित नागरि को नर कैसो बटा ।।”

    उमड़‌ते घुमड़‌ते बरसते काले बादलों के बीच चंचला बिजली रह रह कर थिरक उठती है, कहीं जल-वृष्टि के बाद निष्प्रभ हो श्वेत हो जाना, कैसा सुन्दर व्यतिरेक है। जिसको देख विरही पपीहा बोल उठता है ,कोयल कूक उठती हैं। कलरव करते पक्षियों के साथ दादुर भी सुर मिलाते हैं। विरही का मन इन आवाज़ों को सुन कम्पित हो उठता है। तारों की चमक देख विरहिणी कहती है कि मैं प्रीतम को मना करती रही, जिसके बिना मेरा तन विरह से जल रहा है। सावन के ये बादल मेरी विरहाग्नि को और बढ़ा रहे हैं।
    कविवर मतिराम ने विरहिणी की विषम व्यथा को उकेरते हुए कहा है-

    “उमड़ि घुमड़ि धन छोड़त अखंड धार,
    चंचला उठति तामें तरजि तरजि कै।
    बरही, पपीहा, भेक, पिग, खग टेरत हैं,
    धुनि सुनि प्राण-प्राण उठे लरजि लरजि कै ।
    कहै कवि राम लखि चमक खदोतन की,
    प्रीतम को रही मैं तो बरजि बरजि कै।
    लगे तन तावन बिना री मनभावन कै,
    सावन दुक्न आयो गरजि गरजि कै।।”
    ग्रीष्म की भीषण ज्वाला को, वर्षा की सौंद‌र्यमयी अद्‌भुत छटा अपने आगोश में ले लेती है। धूल के बवंडर बरसात की श्वेत चाँदी सी बूंदों में मिल एकाकार हो जाते हैं। घरा पर सोंधी महक और शीतल प्राणद वायु से चहुंओर हर्षोल्लास हो उठता है। वर्षा जल ग्रहण करने के लिए चातक स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा करता है। मेंढ़क बादल गर्जना से होड़ लिये टर्राने लगते हैं। स्याह बाद‌लों के बीच कौंधती बिजली क्षण भर को दसों दिशाओं को प्रकंपित कर देती है। पहली वर्षा में बगुलें भी पंक्तिबद्ध हो आकाश में विचरते बागों का सौंदर्य निहारने उड़ान भरने लगते हैं। ऋतुओं का वर्णन करने वाले कवि पद्‌माकर ने वर्षा का अनूठा चित्रण किया है,

    “दौरत ददेरी देत दादुर सूं दू़दै दीह,
    दामिनी दमंकत दिसान में दसा की है,
    पहलन बूंदन बिलोक बगुलान बाग.
    बंगलान बेगिन बहार बरषा की है।”
    घने काले बादल चारों ओर से उमड़‌ते घुमड़ते बरस घिर आये हैं, कविवर द्विजदेव की नायिका अपनी सखी से कहती है, सखी! ऐसी वर्षा मुझे विरह में विष बूंद सी लगती है। वह उलाहना देते कहती है कि पापी पपीहा तुझे मेरी सौगंध, ऐसी छटा में अपना दांव मत चूक जो बार बार प्रीतम की ढेर लगाये हुए मुझे सुना रहा है,
    बाद‌लों को संदेश वाहक बनाते समय कालिदास का मन कितना व्यथित होगा! इस की कल्पना करना सहज नहीं है। कालिदास की इन्हीं भावनाओं पर कवि नागार्जुन ने मर्म कटाक्ष करते के हुए कहते हैं,
    “वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,
    प्रथम दिवस आषाढ़ मास का,
    रोया यक्ष कि तुम रोए थे,
    कालिदास, सच-सच बतलाना।”

    (The sky is filled with deep, dark monsoon clouds)

  • Commitment and Contract:आश्वासन और अनुबंध

    Commitment and Contract:आश्वासन और अनुबंध

    अख़तर अली

    बहुत से कामों के लिये अनुबंध होता है और बहुत से कामों के लिये आश्वासन होता है। अनुबंध वाले काम समय पर सफ़लता के साथ संपूर्ण हो जाते हैं और आश्वासन वाले काम कभी आरंभ ही नही होते।

    अनुबंध सोच समझ कर किया जाता है और आश्वासन में भला सोचने समझने की क्या दरकार? आश्वासन सबसे अधिक किये जाने वाला मज़ाक है जिसे कोई भी, कहीं भी, किसी से भी कर सकता है। अनुबंध में अनुबंध का अध्ययन भी करते रहना होता है कि काम अनुबंध के अनुसार ही हो। आश्वासन में इस तरह का तनाव नही होता क्योंकि आश्वासन का अनुबंध नही होता है।

    बदलाव प्रकृति का नियम है। आश्वासन में भी बदलाव हुआ है। पहले आश्वासन देने वाले कोई और थे, आज कोई और हैं, कल कोई और होंगे‌। यही बदलाव आश्वासन ग्रहण करने वालों भी हुआ है।

    अनुबंध में स्पष्टता और आश्वासन में दुष्टता है। न उधर की स्पष्टता दुष्टता में बदलती है न इधर की दुष्टता स्पष्टता में। जब आश्वासन में धोखा मिला होगा तभी अनुबंध जन्मा होगा। काम करने वाले अनुबंध करते है। आश्वासन दे रहे हैं तो समझ जाना इन्हें काम नही करना है।

    अनुबंध दो होशियार पक्षों के बीच में होता है जबकि आश्वासन होशियार और मूर्ख के बीच की घटना है। होशियार का आश्वासन सुन मूर्ख ताली बजाते हैं और जय जयकार करते हैं। अगर कहीं मूर्खो का हुजूम ख़ुशी मनाते, झूमते, गाते दिखे तो समझ जाना इन्हें बड़ा भारी आश्वासन मिला है।

    आश्वासन देने वाले हेलीकाप्टर में आते है, आश्वासन देते हैं और जाने के जैसे ही हेलीकाप्टर में बैठते है दिया गया आश्वासन भूल जाते हैं। वे अपना ब्रीफ़केस नही भूलते, चश्मा नही भूलते, रुमाल नही भूलते, मोबाईल नही भूलते बस दिया गया आश्वासन भूल जाते हैं। आश्वासन को भूलने के लिये भूलने की बीमारी का होना ज़रूरी नही है। जिनकी याददाश्त तेज़ है उन्हें भी आश्वासन भूलने में क्षण भर का समय भी नही लगता।

    बहुत चमकीला है आश्वासन का मीना बाज़ार। अभी कई दशकों तक चलता रहेगा यह कारोबार क्योंकि ऐसे लोगों की संख्या चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती जा रही है जिनके कानों में आश्वासन रस घोल देता है। जब लुटने को लोग तैयार बैठे हैं तो लुटेरों को क्या दोष देना। यह ऐसा पाप है जो पुण्य जैसा लगता है।

    अनुबंध तो लिखित करार है लेकिन मनमाने आश्वासन पर नियंत्रण ज़रूरी है। चुनाव आयोग की तरह आश्वासन आयोग होना चाहिये जो नेताओं के दिये गये आश्वासनों का लेखा-जोखा रखें | नये आश्वासन तभी दिये जा सके जब पुराने आश्वासन पूरे हो जायें। बात बात पर आश्वासन देना प्रतिबंधित हो। जिस नेता के आश्वासन का रिकार्ड ख़राब हो उसकी चुनाव लड़ने की पात्रता समाप्त हो जाये। नामांकन दाखिल करते समय आश्वासन आयोग की एन .ओ.सी. आवश्यक हो। आयोग हर नेता को हिदायत दे कि ज़ुबान दुर्लभ अंग है इसका इस्तेमाल झूठे आश्वासन देने के लिये न करें।

    मैंने नेता जी से कहा– भय्या आश्वासन का अनुबंध होना चाहिये तो उन्होंने तुरंत अनुबंध का आश्वासन दे दिया |

  • Rachanakar Bharat Foundation Speech Competition: रचनाकार भारत फाउंडेशन की भाषण प्रतियोगिता में गूंजी प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता

    Rachanakar Bharat Foundation Speech Competition: रचनाकार भारत फाउंडेशन की भाषण प्रतियोगिता में गूंजी प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता

    कोलकाता | प्रतिनिधि

    अंतर्राष्ट्रीय संस्था रचनाकार भारत फाउंडेशन द्वारा आयोजित भाषण प्रतियोगिता श्रृंखला की तीसरी कड़ी रविवार को कोलकाता में सफलतापूर्वक संपन्न हुई। प्रतियोगिता का विषय “21वीं सदी में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता” रखा गया, जिसमें विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर अपने विचार प्रस्तुत किए।

    कार्यक्रम की शुरुआत संस्था की अध्यक्ष रचना सरन के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने प्रतिभागियों, निर्णायकों और उपस्थित श्रोताओं का स्वागत करते हुए प्रतियोगिता के उद्देश्य एवं मूल्यांकन के मानदंडों की जानकारी दी।

    कार्यक्रम का संयुक्त संचालन संस्था के मीडिया प्रभारी सुरेंद्र सिंह एवं शिक्षिका प्रिया श्रीवास्तव ने किया। प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में ब्रजेश कुमार त्रिपाठी (रेलवे अधिकारी), विवेक लाल (शिक्षक), डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी (व्याख्याता एवं शिक्षाविद), प्रिया श्रीवास्तव (कवयित्री) तथा रचना सरन शामिल रहीं।

    प्रतियोगिता के समापन पर निर्णायकों ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए। डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी ने प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों का विश्लेषण करते हुए उनकी खूबियों और सुधार की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। ब्रजेश कुमार त्रिपाठी ने वर्तमान समय में प्रेमचंद के साहित्य की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि विवेक लाल ने ऐसे साहित्यिक आयोजनों के महत्व को रेखांकित किया। नुपुर श्रीवास्तव ने भी विषय से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।

    प्रतियोगिता में रानी कुमारी महतो ने प्रथम, सुमन कुमारी राम ने द्वितीय और वर्षा सिंह ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।

    कार्यक्रम के विशेष अतिथि युगांडा से आए विश्व प्रसिद्ध कवि एवं रचनाकार भारत फाउंडेशन के विदेश विभाग के प्रभारी अजय गोयल रहे। संस्था के संस्थापक सभापति सुरेश चौधरी एवं अन्य सदस्यों ने उनका मुक्ताहार, स्मृति-चिह्न और दुपट्टा भेंट कर सम्मान किया। अजय गोयल ने विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए, जबकि सभी प्रतिभागियों को स्मृति-चिह्न और सहभागिता प्रमाणपत्र दिए गए। कार्यक्रम के अंत में अजय गोयल ने अपने मधुर गीतों की प्रस्तुति देकर उपस्थित लोगों का मनोरंजन किया।

    संस्था ने बताया कि यह भाषण प्रतियोगिता प्रत्येक माह आयोजित की जाती है और इसमें 16 वर्ष से अधिक आयु के विद्यार्थी भाग ले सकते हैं। पूरे आयोजन का संयोजन विनोद यादव ने किया, जिसकी उपस्थित जनों ने सराहना की।

  • Muktanchal 50th Special Issue Launch: हावड़ा में ‘मुक्तांचल’ के 50वें विशेषांक का लोकार्पण, कोलकाता की साहित्यिक विरासत पर मंथन

    Muktanchal 50th Special Issue Launch: हावड़ा में ‘मुक्तांचल’ के 50वें विशेषांक का लोकार्पण, कोलकाता की साहित्यिक विरासत पर मंथन

    हावड़ा | प्रतिनिधि

    विद्यार्थी मंच एवं मुक्तांचल के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को हावड़ा में मुक्तांचल पत्रिका के स्वर्णिम 50वें विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ का लोकार्पण एवं ‘साहित्यिक अड्डा’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर साहित्यकारों, आलोचकों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, शोधार्थियों और युवा रचनाकारों ने कोलकाता की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत, हिंदी साहित्य की परंपरा और समकालीन सामाजिक चुनौतियों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

    कार्यक्रम का शुभारंभ मुक्तांचल की संपादक एवं विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष डॉ. मीरा सिन्हा के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ केवल एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि दो सदियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक बदलावों का दस्तावेज है। उन्होंने बताया कि इस विशेषांक में शहर के इतिहास, प्रमुख व्यक्तित्वों और सांस्कृतिक विकास की विविध झलकियों को समेटने का प्रयास किया गया है।

    Muktanchal 50th Special Issue Launch

    प्रख्यात आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने मुक्तांचल के 50 अंकों की निरंतर प्रकाशन यात्रा को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं समाज की वैचारिक चेतना को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। उन्होंने हावड़ा और कोलकाता की साहित्यिक परंपरा तथा हिंदी साहित्य के संघर्षशील इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल दौर में ऐसे आयोजनों का महत्व और बढ़ गया है।

    वरिष्ठ आलोचक डॉ. अमरनाथ ने कहा कि समय के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव आया है, लेकिन साहित्य आज भी समाज को दिशा देने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने मुक्तांचल को गंभीर, परिपक्व और संग्रहणीय पत्रिका बताते हुए संपादकीय दृष्टि की सराहना की।

    डॉ. अमित कुमार ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना ‘कलकत्ता’ होता है और यह शहर संघर्ष, संस्कृति, विचार और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक है। वहीं सुप्रसिद्ध कथाकार शर्मीला जालान ने कहा कि मुक्तांचल और अन्य साहित्यिक मंच समाज में सकारात्मक वैचारिक वातावरण तैयार कर रहे हैं।

    कार्यक्रम में डॉ. पंकज साहा, महेश जायसवाल, मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. चित्रा माली, सुरेश शॉ, प्रकाश अग्रवाल, डॉ. विजया सिंह, जितेंद्र जितांशु, मीनाक्षी सांगनेरिया, विनय जायसवाल और दिव्या प्रसाद सहित अनेक साहित्यकारों ने कोलकाता के साहित्यिक इतिहास, स्त्री-विमर्श, रंगमंच, पत्रकारिता और हिंदी साहित्य की समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार रखे।

    साहित्यिक सत्र में वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज़ ख़ान बातिश ने अपनी नई ग़ज़लों का पाठ किया, जबकि विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने अरुण कमल की चर्चित कविता “जाऊँगा मैं जाऊँगा, कोलकाता जाऊँगा” का सस्वर पाठ किया। विद्यार्थियों रागिनी पांडेय, स्वराज पांडेय, सुकन्या तिवारी, राव्या श्रीवास्तव और रोहित शर्मा ने भी कविता-पाठ कर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।

    इस अवसर पर गाथा प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज के नए कविता-संग्रह ‘अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी’ का भी लोकार्पण किया गया। वक्ताओं ने इसे समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदनाओं और जनपक्षधर चेतना का महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह बताया।

    वरिष्ठ समाजसेवी रामनिवास द्विवेदी ने मुक्तांचल की निरंतर साहित्यिक यात्रा की सराहना करते हुए इसे हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। कार्यक्रम का संचालन विनोद यादव ने किया, जबकि अंत में मुक्तांचल के प्रबंध संपादक सुशील कुमार पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

  • Story Time: चिपकाने की कला में निपुण समाज: चिपकाने की कला, भला ही भला (व्यंग्य)

    Story Time: चिपकाने की कला में निपुण समाज: चिपकाने की कला, भला ही भला (व्यंग्य)

    Story Time: चिपकाने की कला में माहिर महारथियों के जीवन में, सोशल मीडिया से हर वक्त बहार छाई रहती है। फेविकॉल से भी प्रगाढ़ जोड़ है इनका अपनी कला से, जो हर वक्त इसमें रमें रहते हैं। किसी के मुँह से बात निकली और लपककर पकड़ लिया। आनन-फानन ही चिपका आए किसी और महफ़िल में। मुँहजुबानी की तो बात छोड़िए, नाम, गाँव, पते के साथ लिखी बातों को भी ये मनमौजी आसानी से उड़ा ले जाते हैं।‌

    चिपकाने की कला में समय कम लगता है परंतु मेहनत बहुत ज़्यादा है। पहले पढ़ो, निर्णय करो कि कैसे उठाना है और कहाँ चिपकाना है। गूगल बाबा ने सारी समस्याओं का हल समय रहते ही सोच लिया था। हर बात पर हामी भरने, विचार चिपकाने के लिए शब्दों की जगह इमोजी बना दिए। समय और माँग के अनुसार इनकी गुणवत्ता, संख्या, रूप में बदलाव मानो चिपकाने वाले कलाकारों के लिए वरदान साबित हो गई।

    रचना, पोस्ट पढ़ने की भी जरूरत नहीं, उठाओ रंग-बिरंगे दिलों में से अपने पसंदीदा रंग का दिल और चिपका आओ। कहीं ठेंगा, कहीं ताली, कहीं नमस्कार का चमत्कार तो कहीं सुबह चाय की प्याली। चिपकाने में माहिर इन मनमौजियों को क्या लिखा है यह जानने उसी प्रकार इच्छा नहीं रहती जैसे कुछ को संसद में चलने वाले सत्र के विषय की।

    इमोजी चिपकाने का मायाजाल इतना भाने लगा कि अब एक-दो शब्द लिखना भी इनके बस का रोग नहीं रहा। आपातकालीन स्थिति में दो शब्द लिखने की ज़रूरत पड़ी तो फिर बस, गूगल शरणम् गच्छामि का रास्ता अपना लिया। अब कुछ शुभ प्रभात, शुभरात्रि, शुभकामनाओं के संदेश चिपकाने वाले दल की बात करते हैं। प्रतिदिन सूर्योदय से पहले, निष्ठा के साथ उगते सूरज, मुस्कुराते सूरज, लालिमा लपेटे सूरज को अपने सभी मित्रों-अमित्रों को चिपकाकर ही, बिस्तर से बाहर आते हैं।

    संबंधित ख़बरें: Story Time: IITian ने छोड़ी करोड़ों की अमेरिकी नौकरी, माता-पिता के लिए खोली किराना दुकान

    विभिन्न रूपों के चाँद, घटते-बढ़ते, बादलों में छिपे, तारों संग चमकते चाँदों को जब-तक अपने सब कांटेक्ट में नहीं भेज देते, उनकी स्वयं की रात्रि शुभ नहीं होती।‌ बधाई और शुभकामना शब्दों में न ढालकर रंग-बिरंगे, देशी-विदेशी फूल, गुलदस्ते चिपकाकर, कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेने वाले, इस चिपकाऊ गैंग की महिमा, शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।

    चिपकाने के व्यापक तंत्र में दूसरों की कविताएं, रचनाएं अपनी दीवार पर चिपकाकर, बेसब्री से रंग-बिरंगे दिलों, फूलों और शाब्दिक शुभकामनाओं का इंतजार करते ये मनमौजी आसानी से देखे जा सकते हैं। इधर‌ का संदेश उधर करने में माहिर इन तस्करों की तन्मयता, इन्हें पुरस्कार का पात्र बनाती है।‌ काटने और चिपकाने में निष्ठा से लगे ये मनमौजी, साहित्य की आन-बान-शान हैं।

    सारे अच्छे, संस्कारी संदेशों, सूक्तियों, तुकबंदियों का कॉपीराइट लिए यह दल, सक्रियता से अपने आपको साधारण मानव से श्रेष्ठ साबित करने में जुटा है। इमोजी, संदेश काटकर चिपकाने वाले इन कलाकारों ने सोशल मीडिया में अपना वर्चस्व बनाया है। सारे मुहावरे, सारी कहावतों को अपने बगल में दबाए, चिपकाओ और राज करो की प्रधानता वाले इन कलाकारों की हर तरफ जय-जयकार है। इंतज़ार है किसी मंच द्वारा, इस कला में पारंगत लोगों के लिए पुरस्कारों की, श्रेणीबद्ध घोषणा की जाए। अपनी जगह सुरक्षित रखने के लिए लेखक ने आज ही आवेदन कर दिया है।

    शर्मिला चौहान

  • Story Time: IITian ने छोड़ी करोड़ों की अमेरिकी नौकरी, माता-पिता के लिए खोली किराना दुकान

    Story Time: IITian ने छोड़ी करोड़ों की अमेरिकी नौकरी, माता-पिता के लिए खोली किराना दुकान

    Story Time: मेरा नाम विवेक शर्मा है। उम्र 32 साल। लोग जब पूछते हैं, तुम क्या करते हो, तो मैं कहता हूँ, किराना दुकान चलाता हूँ। वे हँसते हैं, क्योंकि उन्हें पता है मैं आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट था, और मेरे पास सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी का ऑफर लेटर आज भी अलमारी में रखा है, जिस पर सैलरी लिखी है 2,40,000 डॉलर सालाना। मैंने वह लेटर कभी फाड़ा नहीं, पर कभी इस्तेमाल भी नहीं किया।

    कहानी 1998 से शुरू होती है, कानपुर के किदवई नगर में। दो कमरे का घर, ऊपर टीन। पापा रेलवे में क्लर्क, माँ ट्यूशन पढ़ातीं। मैं इकलौता बेटा। पापा की सैलरी 8,000 रुपये। माँ की ट्यूशन से 2,000। हम मिडिल क्लास भी नहीं थे, लोअर मिडिल पर पापा का एक सपना था, बेटा बड़ा आदमी बने। उन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा डॉक्टर बन, इंजीनियर बन। वह सिर्फ कहते, बेटा, जितना पढ़ना है पढ़, पैसे की चिंता मत कर। मैं पढ़ता गया। दसवीं में 95 प्रतिशत, बारहवीं में 97। कोचिंग की फीस 1 लाख थी। पापा ने पीएफ निकाला। माँ ने अपनी चूड़ियाँ बेचीं। मैं कोटा गया। दो साल पंखे के नीचे पढ़ा, मच्छर खाए। 2012 में रिजल्ट आया, AIR 147। आईआईटी बॉम्बे, कंप्यूटर साइंस।

    जिस दिन लेटर आया, पापा मिठाई का डिब्बा ले कर पूरे मोहल्ले में बाँट आए। माँ रो पड़ी। बोली, अब मेरा बेटा अमेरिका जाएगा। आईआईटी में मैं उड़ा। कोडिंग, हैकाथॉन, इंटर्नशिप। तीसरे साल में गूगल समर इंटर्न, 1 लाख स्टाइपेंड। मैंने पहली सैलरी से पापा को फोन दिलाया, माँ को वॉशिंग मशीन। पापा ने फोन पर कहा, बेटा, अब तो रिटायरमेंट में आराम करूँगा।

    फाइनल ईयर में प्लेसमेंट। मैं दिन रात तैयारी करता। दिसंबर 2015, मेरा इंटरव्यू हुआ एक कंपनी से, नाम था स्ट्राइप जैसी पेमेंट स्टार्टअप, बेस सैन फ्रांसिस्को। चार राउंड, आखिरी में सीटीओ ने कहा, वी वांट यू। ऑफर आया, 240k डॉलर, H1B, रीलोकेशन। मैंने हॉस्टल में चिल्ला कर दोस्तों को बताया। रात को पापा को फोन किया। पापा चुप रहे, फिर बोले, बेटा, बहुत बड़ी बात है। माँ ने कहा, पासपोर्ट बनवा ले।

    मैंने टिकट देखना शुरू किया, अगस्त 2016 जॉइनिंग। मार्च 2016 में होली पर घर आया। पापा कमजोर लग रहे थे। खाँसी। मैंने कहा, डॉक्टर को दिखाओ। बोले, कुछ नहीं, ठंड लग गई। माँ भी थकी थकी। मैंने सोचा, उम्र है। अप्रैल में फोन आया, माँ का। पापा गिर गए, अस्पताल में। मैं भागा। डॉक्टर ने कहा, लंग्स में इंफेक्शन, साथ में हार्ट की प्रॉब्लम। एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। खर्च, 3 लाख।

    पापा के पास मेडिकल था, पर आधा ही कवर। मैंने अपनी इंटर्नशिप के पैसे, 2 लाख, निकाल कर दिए। ऑपरेशन हुआ। पापा बच गए। मैं वापस बॉम्बे गया, फाइनल प्रोजेक्ट। मई में फिर फोन, माँ को चक्कर आए। जांच हुई, ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज 2। डॉक्टर ने कहा, कीमो शुरू करो, 6 साइकल, हर साइकल 80 हजार। कुल 5 लाख, प्लस सर्जरी।

    मैं सुन्न। पापा रिटायर हो चुके थे, पेंशन 12 हजार। घर में सेविंग खत्म। मैंने दोस्तों से उधार माँगा, 1 लाख मिला। बाकी। जून में मैं घर बैठा था, ऑफर लेटर हाथ में। वीजा इंटरव्यू 15 जुलाई को था। फ्लाइट 10 अगस्त की। माँ की पहली कीमो 20 जून को।

    मैंने पापा से कहा, मैं लोन लेता हूँ। पापा बोले, कौन देगा, घर गिरवी रखना पड़ेगा। मैंने कहा, रख देंगे। पापा ने मना किया, बोले, ये घर तेरी माँ की निशानी है। उस रात मैं छत पर बैठा। आसमान में प्लेन जा रहा था। मैंने सोचा, यही प्लेन मुझे ले जाएगा। दूसरी तरफ माँ नीचे दर्द में।

    मैंने अपने मेंटर को मेल किया, क्या जॉइनिंग डिफर हो सकती है, 6 महीने। रिप्लाई आया, सॉरी विवेक, वी नीड पीपल नाउ। यू कैन रीअप्लाई नेक्स्ट ईयर। मैंने फिर मेल किया, रिमोट पॉसिबल। नो। 14 जुलाई की रात। वीजा इंटरव्यू कल। माँ की दूसरी कीमो परसों। पापा दवाई लेने गए थे, लौटे तो पर्ची गिर गई, झुक कर उठा नहीं पाए। मैंने उठाई। उस वक्त समझ आया, मैं अगर चला गया तो ये दोनों कैसे रहेंगे।

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    पापा रिटायर्ड, बीमार। माँ कीमो पर। कोई भाई बहन नहीं। रिश्तेदार मदद नहीं करते। कौन अस्पताल ले जाएगा, कौन दवाई लाएगा, कौन रात को पानी देगा। मैंने सुबह वीजा इंटरव्यू कैंसिल किया। कंपनी को मेल लिखा, थैंक यू फॉर ऑफर, ड्यू टू फैमिली मेडिकल इमरजेंसी आई एम अनेबल टू जॉइन। दोस्तों ने फोन किया, पागल है क्या, 1.6 करोड़ की जॉब छोड़ रहा है। मैंने कहा, हाँ।

    माँ को नहीं बताया। पापा को बताया। वह चुप रहे, फिर बोले, बेटा तेरा करियर। मैंने कहा, करियर फिर बन जाएगा, आप फिर नहीं मिलोगे। मैंने कानपुर में ही नौकरी ढूंढी। एक लोकल सॉफ्टवेयर कंपनी, सैलरी 35 हजार। मैंने जॉइन कर ली। सुबह 9 से शाम 6 ऑफिस, शाम को अस्पताल। कीमो में माँ के बाल गए, वह रोती। मैं विग ले आया। पापा की दवाई टाइम पर देता।

    2016 से 2018, दो साल ऐसे निकले। माँ की सर्जरी हुई, रिकवरी हुई। कैंसर रिमिशन में आया। पापा की तबीयत स्थिर। पर पैसे खत्म। मैंने लोन लिया, 7 लाख। 2018 में कंपनी बंद हो गई। मैं बेरोजगार। इंटरव्यू दिए, बेंगलुरु से ऑफर आया, 18 लाख। मैंने मना किया। पापा बोले, जा बेटा। मैंने कहा, अब नहीं छोड़ सकता। माँ को हर तीन महीने चेकअप, पापा को डायबिटीज। कौन देखेगा।

    दोस्त बोले, तू अपना करियर मार रहा है। मैंने कहा, करियर मेरा है, माँ बाप भी मेरे। मैंने घर के नीचे छोटी सी दुकान खोली, पापा के नाम पर, शर्मा जनरल स्टोर। कंप्यूटर छोड़ कर दाल चावल बेचने लगा। पहले दिन शर्म आई। आईआईटी का लड़का दुकान पर। फिर एक आंटी आईं, बोलीं, बेटा तुम्हारी माँ ने मुझे पढ़ाया था, तुम दुकान खोलो, हम यहीं से लेंगे।

    धीरे धीरे दुकान चली। मैं सुबह 6 बजे होलसेल मंडी जाता, सामान लाता, दिन में दुकान, रात को फ्रीलांस कोडिंग। 500 डॉलर की वेबसाइट बनाता।2019 में माँ पूरी तरह ठीक। डॉक्टर ने कहा, क्लियर। उस दिन मैं दुकान बंद कर के मंदिर गया। प्रसाद चढ़ाया। घर आया तो पापा बोले, बेटा,तूने हमारे लिए सब छोड़ दिया। मैंने कहा, छोड़ा नहीं, बदला है।

    2020 लॉकडाउन। दुकान एसेंशियल में खुली। लोगों को राशन चाहिए था। मैंने होम डिलीवरी शुरू की। साइकिल पर जाता। पापा हिसाब लिखते। माँ पैकिंग करती। उस लॉकडाउन में हमने 2 लाख कमाए। मैंने लोन का आधा चुका दिया।

    2021 में मैंने दुकान के साथ एक छोटा कंप्यूटर क्लास शुरू किया, बच्चों को कोडिंग सिखाने। फीस 500 महीना। 20 बच्चे आए। मुझे फिर से कोडिंग का मजा आया। 2022 में एक बच्चा, अंश, जो मेरे पास पढ़ता था, उसने नेशनल ओलंपियाड जीता। न्यूज में आया, ‘कानपुर के किराना वाले आईआईटीयन से सीख कर जीता’। वह आर्टिकल वायरल हुआ।

    उसी हफ्ते मुझे मेल आया, स्ट्राइप के उसी सीटीओ से। लिखा था, विवेक, आई सॉ योर स्टोरी। वी आर ओपनिंग इंडिया ऑफिस। वुड यू लाइक टू लीड एजुकेशन इनिशिएटिव, रिमोट, पार्ट टाइम। मैंने हाँ कहा। अब मैं सुबह दुकान, दोपहर क्लास, शाम को यूएस टीम के साथ काम। सैलरी डॉलर में नहीं, पर इज्जत में बहुत।

    पिछले महीने पापा 68 के हुए। मैंने छोटा सा फंक्शन रखा। दोस्त आए, वही जो कहते थे तूने करियर बर्बाद किया। पापा ने माइक ले कर कहा, मेरा बेटा अमेरिका नहीं गया, पर मेरे पास रहा। जब मैं अस्पताल में था, उसने मेरा हाथ पकड़ा। जब इसकी माँ के बाल गए, इसने चोटी बनाई। करियर तो बहुत लोग बनाते हैं, बेटा कोई कोई बनता है।

    माँ ने धीरे से कहा, मुझे आज भी वह ऑफर लेटर याद है। तूने अलमारी में क्यों रखा। मैंने कहा, ताकि याद रहे मैंने क्या छोड़ा। बोली, तूने छोड़ा नहीं, तूने चुना। आज दुकान पर बैठा हूँ। सामने स्कूल के बच्चे टॉफी ले रहे हैं। लैपटॉप पर कोड चल रहा है। पापा बगल में अखबार पढ़ रहे हैं, माँ काउंटर पर बैठी हैं। कभी कभी रात को वह ऑफर लेटर निकालता हूँ। 240,000 डॉलर। फिर माँ की हँसी सुनता हूँ, पापा की खाँसी कम हुई है, देखता हूँ। और लेटर वापस रख देता हूँ।

    लोग पूछते हैं, पछतावा होता है। मैं सच कहता हूँ, पहले होता था। जब दोस्त बेंगलुरु से फोटो डालते, यूएस ट्रिप की। अब नहीं। क्योंकि मैंने करियर का त्याग नहीं किया, मैंने करियर को रीडिफाइन किया। मेरा करियर अब सिर्फ कोड नहीं, केयर है। मैंने माता पिता के लिए अमेरिका छोड़ा, पर उनके साथ जिंदगी जी ली। पापा को हर सुबह चाय दे पाता हूँ, माँ के पैर दबा पाता हूँ। ये 2.4 करोड़ में नहीं मिलता।

    अगर फिर से मौका मिले, तो मैं फिर वही करूँगा। वीजा कैंसिल, जॉब छोड़, दुकान खोल। क्योंकि कुछ त्याग घाटा नहीं होते, वे निवेश होते हैं, प्यार में। और आज जब कोई बच्चा पूछता है, भैया आप आईआईटी करके दुकान क्यों, मैं हँस कर कहता हूँ, क्योंकि मेरे माता पिता मेरी सबसे बड़ी कंपनी हैं, और मैं उनका फुल टाइम सीईओ हूँ।l

  • Hindi Poetry: विरह की तपन में भीगती भावनाएं: ‘अंखियां से बरसइ रोज सपनवां’

    Hindi Poetry: विरह की तपन में भीगती भावनाएं: ‘अंखियां से बरसइ रोज सपनवां’

    Hindi Poetry: तपन बढ़ती जा रही है। विरह में बदन तप रहा है तो तपते सूरज से धरती की तपन। उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने दिल का दर्द किससे कहे।

    अंखियां से बरसइ रोज सपनवां
    सुगनवां हमरे।

    केतनउ दिल के समुझाई
    फिर भी आवेला रोवाई
    साजन बिनु हमरी हालत
    जल बिनु मछरी की नाईं
    होरहा जस जरेला मोर परनवां
    अंखियां से बरसइ रोज सपनवां
    सुगनवां हमरे।

    सेजिया पर गरम तवा पे
    बूनी जस तड़पत बानी
    पानी न बरसइ बालम
    फिर भी हम पानी-पानी
    पिसि-पिसि के जियरा भइल पिसनवां
    सुगनवां हमरे।

    अमराई चहकत बाटइ
    तरुणाई बहकत बाटइ
    लेकिन आंवां के जइसन
    ई देहिया धधकत बाटइ
    काटइ दउड़इ हमके मधुबनवां
    सुगनवां हमरे।

    तोहरे जियरा में का बा?
    समुझइं न काशी-काबा
    हमरी भगिया मा साजन
    लागत बाटइ सुख ना बा
    मटिया म मिलि गा सबइ सपनवां
    सुगनवां हमरे।

    परती बा खेतिया हमरी
    सुनी बा रतिया हमरी
    फोनवा ना लागइ तोहरा
    आवइ न पतिया तोहरी
    रूठल बा काहें मोर किसनवां
    सुगनवां हमरे।

    गउवां में डीजे बाजइ
    नाचइं जब छोरा-छोरी
    झांकी हम रहिया तोहरी
    मदमाइल मतिया मोरी
    उपरा से मारइ बान मदनवां
    सुगनवां हमरे।

    सुरेश मिश्र

  • Hindi Sahityakar:अदब की महफिल में गूंजे शब्द, ‘हमारा समाज’ और ‘अर्थबोध’ पर हुए गंभीर संवाद

    Hindi Sahityakar:अदब की महफिल में गूंजे शब्द, ‘हमारा समाज’ और ‘अर्थबोध’ पर हुए गंभीर संवाद

    मीरा रोड (मुंबई)। शनिवार को मीरा रोड (पूर्व) स्थित विरंगुला केंद्र में एक भव्य साहित्यिक समारोह का आयोजन हुआ, जहां कवयित्री एवं लेखिका रीता दास राम की दो नई कृतियों में‘अर्थबोध के सान्निध्य में’ और ‘हमारा समाज और हम’ का लोकार्पण किया गया। यह आयोजन जनवादी लेखक संघ, ‘अनभै’ पत्रिका और स्वर संगम फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ।

    कार्यक्रम (Hindi Sahityakar) की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि-आलोचक विजय कुमार ने की। उन्होंने लेखिका की संवेदनशील लेखन शैली की सराहना करते हुए कहा कि उनकी रचनाएं स्त्री मन की गहराइयों और सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती हैं। कार्यक्रम का संचालन कवि रमन मिश्रा ने किया, जिन्होंने अपनी सधी हुई प्रस्तुति से श्रोताओं को अंत तक जोड़े रखा।

    काव्य संग्रह ‘अर्थबोध के सान्निध्य में’ पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ कवि हूबनाथ पांडे ने कहा कि रीता दास की कविताएं व्यक्तिगत अनुभवों से निकलकर व्यापक सामाजिक सरोकारों तक पहुंचती हैं। वहीं प्रशांत जैन और संध्या यादव ने संग्रह की विषयवस्तु और सामाजिक दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

    लेख संग्रह ‘हमारा समाज और हम’ पर अनिल गौर की समीक्षा (जिसका वाचन राकेश शर्मा ने किया) में समाज की जटिलताओं को गहराई से समझने की बात कही गई। अवधेश राय ने इन लेखों को सामाजिक वर्जनाओं और शोषण के खिलाफ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया।

    इस अवसर पर विनोद दास, अनुप सेठी, हृदयेश मयंक, शैलेश सिंह और अभिलाष अवस्थी सहित कई साहित्यकारों ने लेखिका की रचनात्मकता और सामाजिक प्रतिबद्धता की सराहना की।समारोह के अंत में राजीव रोहित ने सभी अतिथियों और आयोजकों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों और लेखिका के परिजनों की उपस्थिति रही।यह आयोजन केवल पुस्तकों के लोकार्पण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्त्री विमर्श और सामाजिक यथार्थ पर एक सार्थक और गंभीर संवाद का मंच भी बना।

  • बुनियादी कौशल

    बुनियादी कौशल

    नील मणि


    आज का युग, ज्ञान के साथ ही विज्ञान का युग बन गया है। बच्चे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पा रहे हैं, विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ लेकर लौट रहे हैं परंतु जीवन के बुनियादी कौशलों से कोसों दूर हैं। वे ‘कक्षा ज्ञान’ में पारंगत हैं लेकिन ‘ज़िंदगी के सबक़’ से अनजान।


    मेरी छोटी बहन की कैंसर की कीमो थेरेपी के दौरान मैं उसके भावनात्मक सहयोग के लिए कुछ दिन उसके पास रही। एक रात्रि, जब घरेलू सहायिका जा चुकी थी… मैं अपने भांजे को, जो प्रशासनिक अधिकारी है, दो महीने पहले ही भारतीय सिविल सेवा का प्रशिक्षण लेकर लौटा था… रात्रि का भोजन गर्म करके दे रही थी। तभी मैंने महसूस किया कि किचिन सिंक का पानी रुक रहा है। किचिन में जो भी साधन, नुस्खे- पेचकस, सिरका, नींबू रस, चक्कू आदि मिला- उनसे मैंने सिंक के छिद्रों को खोलने की नाकाम कोशिश की।
    अब तक बेटा भी भोजन समाप्त कर, किचिन में आ गया… मुझे सिंक में सटर पटर करते देख पूछने लगा- मौसी क्या हुआ? मैंने तुरंत कहा- बेटा कोई मोटा मजबूत तार मिलेगा… लगता है सिंक के छिद्रों में कचरा फंसा है… पानी बह नहीं रहा।”
    बेटा अपनी मासूम सी अनभिज्ञता जताते धीरे से बोला- “मौसी तार-वार तो मुझे कुछ पता नहीं…”
    “- ठीक है, तुम अपने कपड़ों की अलमारी से एक एल्यूमिनियम वाला या जिसका तार सख्त न हो… हैंगर ला दो।”

    • “ठीक है।” बेटा तुरंत हैंगर ले आया। मैंने हैंगर के हुक के नीचे जुड़े दोनों सिरों को प्लास व पेचकस की मदद से खोल, तार को सीधा कर सिंक के छिद्रों में बारी-बारी घुमाया- जिससे सारा कचरा पाइप से होता हुआ, नीचे जाली पर इकट्ठा होने लगा। कुछ ही मिनटों में सारा पानी गड़-गड़ कर बह गया।
      बेटा ध्यान से मेरे सब उपक्रम देख रहा था।
      वह चकित होकर बोला— “मौसी, आपने तो कमाल कर दिया! मौसी आज आप नहीं होती तो मैं क्या करता; मुझे तो ऐसे काम बिल्कुल नहीं आते।”
      मैंने सहजता से कहा- बेटा जिंदगी की रोजमर्रा की जरूरतें किताबें नहीं, हमारे अनुभव ही हमें सिखाते हैं।
      उसके चेहरे पर संकोच और भीतर एक अजीब-सी आत्म-स्वीकृति थी— किताबी ज्ञान के बावजूद वह जीवन की छोटी-छोटी परिस्थितियों से निपटने में असहाय है।
      यही आज के शिक्षित समाज की सच्चाई है। हमारे बच्चे तकनीकी, प्रबंधन और प्रशासनिक पाठ्यक्रमों में दक्ष हैं, उनके पास डिग्री है, ज्ञान है, पर अनुभव नहीं। असल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं होता बल्कि जीवन जीने की समझ विकसित करना होता है। परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में ‘जीवन कौशल’ (Life Skills) के लिए कोई स्थान नहीं है। हम बच्चों को हर विषय की थ्योरी सिखा रहे हैं लेकिन प्रयोग नहीं।
      कभी-कभी लगता है— हमने बच्चों को इतना ‘स्मार्ट’ बना दिया कि वे अब किसी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए गूगल सर्च करते हैं। हर ज्ञान का असली मूल्य तभी है, जब वह जीवन को आसान बनाए। आज आवश्यकता है कि हम बच्चों को केवल बुद्धिमान नहीं, व्यवहारिक भी बनाएं क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी डिग्री— ‘अनुभव’ होती है, जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती, बस व्यवहार में लाने से मिलती है।