The human body has been designed to resist an infinite number of changes and attacks brought about by its environment. The secret of good health lies in successful adjustment to changing stresses on the body.
Vitamin D-Calcium: हम सभी जानते हैं कि मजबूत हड्डियों के लिए कैल्शियम जरूरी होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिर्फ कैल्शियम लेना ही काफी नहीं है? अगर शरीर में विटामिन D की कमी है, तो कैल्शियम सही तरीके से काम ही नहीं कर पाता। दरअसल, विटामिन D और कैल्शियम का रिश्ता ऐसा है जैसे ताला और चाबी। एक के बिना दूसरा अधूरा है। यही कारण है कि डॉक्टर भी इन दोनों को साथ में लेने की सलाह देते हैं।(Vitamin D-Calcium)
विटामिन D और कैल्शियम का कनेक्शन क्या है? विटामिन D शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाने का काम करता है। जब हम कैल्शियम युक्त भोजन लेते हैं, तो विटामिन D उसे आंतों से खून में पहुंचाने में मदद करता है। बिना विटामिन D के, शरीर कैल्शियम को सही से उपयोग नहीं कर पाता।
कैसे काम करते हैं दोनों साथ में? जब शरीर को पर्याप्त विटामिन D मिलता है, तो यह कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाने में मदद करता है। इससे हड्डियां मजबूत बनती हैं और फ्रैक्चर का खतरा कम होता है। वहीं, अगर विटामिन D की कमी हो जाए, तो कैल्शियम शरीर में सही से अवशोषित नहीं होता, जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।
कमी होने पर क्या होता है असर? अगर शरीर में विटामिन D या कैल्शियम की कमी हो जाए, तो इसके कई गंभीर असर हो सकते हैं। जैसे- हड्डियों में दर्द और कमजोरी बार-बार फ्रैक्चर होना मांसपेशियों में कमजोरी बच्चों में हड्डियों का सही विकास न होना
किन चीजों से मिलते हैं ये पोषक तत्व?
सुबह की धूप
दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स
अंडा और मछली
कैल्शियम के स्रोत
दूध, दही, पनीर
हरी पत्तेदार सब्जियां
बादाम और तिल
सही मात्रा और संतुलन क्यों जरूरी है? सिर्फ ज्यादा कैल्शियम लेना या सिर्फ विटामिन D लेना दोनों ही सही नहीं है। इनका संतुलन जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार सही मात्रा में इनका सेवन करना ही बेहतर होता है।
आईवीएफ (IVF) का महंगा होना और उसके बाद असफल होना भावनात्मक और आर्थिक दोनों रूप से बहुत कठिन है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में एक IVF चक्र की लागत लगभग ₹1,25,000 से ₹2,50,000 के बीच है।पैसे बचाने और सफलता की संभावना बढ़ाने के लिए आप निम्नलिखित विकल्पों पर विचार कर सकते हैं:
आर्थिक सहायता और लागत कम करने के उपाय
सरकारी योजनाएं:
ESIC: ₹21,000 प्रति माह से कम आय वाली महिलाओं को ESIC-अनुमोदित केंद्रों पर मुफ्त IVF मिल सकता है。
Ayushman Bharat: कुछ विशेष प्रजनन प्रक्रियाओं के लिए सालाना ₹5 लाख तक का कवर मिल सकता है。
CGHS: केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 3 चक्रों तक आंशिक प्रतिपूर्ति (reimbursement) मिल सकती है。
NGO और चैरिटेबल ट्रस्ट:ISAR (डॉ. साधना देसाई फंड) पात्र जोड़ों को ₹50,000 की मदद देता है。 इसके अलावा, रोटरी क्लब और रेड क्रॉस सोसाइटी भी आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं。
सफलता की संभावना बढ़ाने के तरीके
उन्नत तकनीकें: यदि बार-बार असफलता मिल रही है, तो PGT-A (भ्रूण की अनुवांशिक जांच) और ERA (गर्भाशय की ग्रहणक्षमता की जांच) जैसे टेस्ट करवाएं。
जीवनशैली में बदलाव: वजन घटाने, एंटीऑक्सीडेंट युक्त आहार (पालक, मेथी, फल) और तनाव कम करने से अंडों और शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार होता है。
डॉक्टर का चयन: 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए सफलता दर लगभग 40-50% होती है, जबकि 30 से कम में यह 60% से अधिक हो सकती है。 हमेशा उच्च सफलता दर वाले केंद्रों को प्राथमिकता दें।
नई दिल्ली/मुंबई: यूएस-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है, जिससे एलपीजी (LPG Cylinder) की सप्लाई पर भी असर पड़ा। भारत सरकार ने एलपीजी की घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कई कदम उठाए हैं और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने दावा किया है कि घरेलू डिलीवरी सामान्य समय पर ही जारी रहेगी।
लेकिन वास्तविक स्थिति जनता के लिए भयावह बनी हुई है। कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर की कालाबाजारी और ऊँचे होलसेल दाम आम जनता को परेशान कर रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार बड़े कारोबारी और डीलर एलपीजी की उपलब्धता को नियंत्रित कर उसके दाम बढ़ा रहे हैं। इससे घरेलू उपभोक्ताओं को सिलेंडर खरीदने में मुश्किल हो रही है, और सरकारी राहत की योजनाएं प्रभावी रूप से जमीन पर नहीं पहुंच पा रही हैं।
पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने एलपीजी की सुरक्षित सप्लाई और नए LNG कार्गो की व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि घरेलू सेक्टर को प्राथमिकता दी जा रही है और नॉन-डोमेस्टिक सेक्टर जैसे हॉस्पिटल और एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन को भी जरूरत के अनुसार आवंटन किया जा रहा है। वहीं एलपीजी बुकिंग के बीच न्यूनतम अंतराल को 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है।
सरकार का दावा है कि घरेलू डिलीवरी सामान्य रूप से 2.5 दिन में होगी, लेकिन जनता का कहना है कि होलसेल दामों और कालाबाजारी के कारण सिलेंडर आसानी से नहीं मिल रहा। BPCL, IOC और HPCL की संयुक्त समिति मांग और आवंटन की समीक्षा कर रही है, लेकिन कई क्षेत्रों में लोग निजी डीलरों के बढ़ते दाम और काले बाजारी आपूर्ति से परेशान हैं।
केंद्रीय गृह सचिव ने राज्यों के डीजीपी और सचिवों से कहा है कि कालाबाजारी और जमाखोरी रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएँ। हालांकि जनता का अनुभव बताता है कि इस दिशा में कार्रवाई पर्याप्त नहीं हो रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के उपायों और अतिरिक्त LNG आयात के बावजूद स्थानीय डीलरों द्वारा किए जा रहे मनमाने दामों और कालाबाजारी पर नजर रखना बेहद जरूरी है, वरना आम जनता की परेशानी और बढ़ सकती है।
सरकार का दावा और जनता का अनुभव फिलहाल आमने-सामने हैं, और एलपीजी संकट को लेकर वास्तविक राहत जनता तक पहुँचने में देरी हो रही है।
मुंबई। मुंबई में रोबोटिक तकनीक की मदद से बिना सीमेंट वाला टोटल घुटना प्रत्यारोपण (Uncemented Total Knee Replacement) सफलतापूर्वक किया गया। यह सर्जरी प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. विविद्ध मकवाना ने की।
इस आधुनिक प्रक्रिया में रोबोटिक तकनीक की सहायता से सर्जरी से पहले घुटने का 3D मैप तैयार किया जाता है, जिससे ऑपरेशन के दौरान इम्प्लांट को बेहद सटीकता से लगाया जा सकता है। पारंपरिक घुटना प्रत्यारोपण में जहां इम्प्लांट को हड्डी से जोड़ने के लिए बोन सीमेंट का उपयोग किया जाता है, वहीं इस नई तकनीक में छिद्रयुक्त (porous) इम्प्लांट लगाया जाता है, जिसमें मरीज की हड्डी धीरे-धीरे विकसित होकर उसे प्राकृतिक रूप से मजबूत पकड़ देती है। इसे जैविक स्थिरीकरण (Biological Fixation) कहा जाता है।
डॉ. मकवाना के अनुसार, घुटने के उन्नत ऑस्टियोआर्थराइटिस से पीड़ित मरीजों के लिए इस तरह की सर्जरी से न केवल दर्द में राहत मिलती है, बल्कि चलने-फिरने की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
डॉक्टरों का कहना है कि यह तकनीक खासतौर पर उन मरीजों के लिए उपयुक्त हो सकती है जिनकी हड्डियों की गुणवत्ता अच्छी होती है। सर्जरी के बाद नियमित फिजियोथेरेपी और पुनर्वास से मरीज की ताकत और गतिशीलता तेजी से सुधरती है।
मुंबई: पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान-अमेरिका-इजराइल तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता का असर अब भारत के जमीनी हालात पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हाल ही में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद जहां घरेलू उपभोक्ता पहले ही परेशान हैं, वहीं अब कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कमी ने होटल और रेस्टोरेंट उद्योग की चिंता बढ़ा दी है।
देश के कई बड़े शहरों — मुंबई, चेन्नई और बंगलूरू — से यह खबरें सामने आ रही हैं कि कमर्शियल गैस सिलेंडर की नियमित सप्लाई बाधित हो रही है। इससे होटल और रेस्टोरेंट की रसोई चलाना मुश्किल हो गया है और कारोबार पर सीधा असर पड़ने लगा है। उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो कई छोटे होटल और ढाबों का काम ठप होने की नौबत आ सकती है।
सिलेंडर की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी
7 मार्च 2026 से देशभर में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है।
सिलेंडर प्रकार
पुराना रेट (मुंबई)
नया रेट (मुंबई)
बढ़ोतरी
घरेलू LPG (14.2 किलो)
₹852.50
₹912.50
₹60
कमर्शियल LPG (19 किलो)
लगभग ₹1,692
लगभग ₹1,836
₹115–₹144
कीमत बढ़ने के बाद कई इलाकों में सिलेंडर की सप्लाई को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
होटल उद्योग ने सरकार से किया हस्तक्षेप का आग्रह
होटल और रेस्टोरेंट उद्योग की प्रमुख संस्था फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FHRAI) ने पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।
संस्था का कहना है कि जमीनी स्तर पर गैस सिलेंडर की सप्लाई में भारी रुकावट आ रही है। कई गैस डिस्ट्रीब्यूटर 5 मार्च के कथित सरकारी आदेश का हवाला देकर कमर्शियल सिलेंडर देने से मना कर रहे हैं, जिससे होटल और रेस्टोरेंट चलाना मुश्किल हो रहा है।
FHRAI के महासचिव जैसन चाको ने कहा कि सरकार को इस मामले में तुरंत स्पष्ट निर्देश जारी करने चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि होटल और फूड सर्विस सेक्टर के लिए गैस सप्लाई पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
रेस्टोरेंट संगठनों ने भी जताई चिंता
रेस्टोरेंट उद्योग की दूसरी प्रमुख संस्था भारतीय राष्ट्रीय रेस्तरां संघ (NRAI) ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि कई गैस सप्लायर रेस्टोरेंट उद्योग की मांग पूरी करने में असमर्थता जता रहे हैं, जिससे कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
NRAI ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि खबरों के अनुसार सरकार ने स्पष्ट किया है कि रेस्टोरेंट उद्योग के लिए कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई सप्लायर गैस देने से मना कर रहे हैं।
मुंबई में भी बढ़ी परेशानी
मुंबई में होटल व्यवसाईयों का कहना है कि सिलेंडर की सप्लाई समय पर नहीं मिल रही है। कुछ जगहों पर सिलेंडर मिलने में 2 से 5 दिन की देरी के साथ तय कीमत से 300-500रुपए ज्यादा में मिल रही है, जिससे रसोई संचालन प्रभावित हो रहा है। छोटे रेस्टोरेंट और ढाबों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर बनती जा रही है। होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर लोगों को भोजन उपलब्ध कराने जैसी जरूरी सेवा से जुड़ा है। यदि गैस सप्लाई में रुकावट जारी रहती है तो इसका असर सीधे आम नागरिकों तक पहुंचेगा और खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं।
निगरानी बढ़ाने की मांग
सामाजिक संगठनों और उद्योग प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और गैस डिस्ट्रीब्यूटर्स को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं ताकि कमर्शियल और घरेलू दोनों तरह के सिलेंडरों की सप्लाई बिना बाधा जारी रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को सप्लाई चेन की निगरानी, कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई और शिकायत तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है, ताकि महंगाई और गैस संकट का बोझ आम लोगों और कारोबारियों पर कम किया जा सके।
नहियां ग्रामसभा के 18 तालाब खत्म, जल-संकट गहराया: पर्यावरण और जनजीवन पर सीधा असर
वाराणसी (Varanasi News)। नहियां ग्रामसभा में तालाबों पर अवैध कब्जे का असर अब गंभीर जल-संकट के रूप में सामने आ रहा है। मगर यहां खामोशी है—लंबी, गहरी और संदिग्ध। ग्रामीणों का आरोप है कि बार-बार शिकायतों, ज्ञापनों और न्यायालयी आदेशों के बावजूद न तो अतिक्रमण हटाया गया और न ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई।
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सवाल सीधा है—क्या यह महज़ लापरवाही है, या फिर मिलीभगत और घूसखोरी के आगे प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं? स्थिति की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं—
18 तालाबों पर पूरा कब्जा ग्रामसभा के सभी 18 तालाबों पर अवैध कब्जा हो चुका है। तालाबों की जमीन पर पक्के मकान और निर्माण खड़े कर दिए गए हैं।
तालाबों का पानी पूरी तरह सूखा अतिक्रमण और भराव के कारण तालाबों में पानी नहीं बचा है। जलस्रोत खत्म होने से गांव की प्राकृतिक जल-व्यवस्था टूट चुकी है।
पर्यावरण को भारी नुकसान तालाबों के खत्म होने से पर्यावरण असंतुलन बढ़ा है। गर्मी में तापमान अधिक महसूस होता है और हरियाली कम होती जा रही है।
भूजल स्तर बेहद नीचे गया तालाब खत्म होने से पानी का रिचार्ज बंद हो गया है, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया है।
गर्मियों में पेयजल संकट गर्मी के मौसम में कई हैंडपंप सूख जाते हैं। कुछ-कुछ इलाकों में लोगों को पीने का पानी तक नहीं मिल पाता।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल तालाब खत्म होने, घर बन जाने और जल-संकट के बावजूद अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
ग्रामीणों की मांग ग्रामीणों ने सभी तालाबों का तत्काल सीमांकन, अतिक्रमण हटाने, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और जल-संरक्षण योजना लागू करने की मांग की है।
गांव वालों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य का सवाल है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में नहियां ग्रामसभा गंभीर जल-आपदा की चपेट में आ सकती है।
भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र (INDIA-US Agro Trade Deal) में बढ़ते सहयोग और संभावित व्यापारिक समझौतों को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। विपक्ष के कुछ नेताओं और किसान संगठनों का आरोप है कि यह समझौता भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है और “किसानों के डेथ वारंट” पर हस्ताक्षर जैसा कदम है।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आइए विस्तार से समझते हैं।
कृषि समझौते की पृष्ठभूमि
भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार पहले से ही जारी है। भारत अमेरिका से बादाम, सेब, दालें और कृषि तकनीक आयात करता है, जबकि अमेरिका को चावल, मसाले, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि उत्पाद निर्यात करता है।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच:
कृषि बाजारों को खोलने,
टैरिफ कम करने,
जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों के आयात,
डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के व्यापार को लेकर चर्चा तेज हुई है।
इसी संदर्भ में प्रस्तावित या चर्चित “कृषि डील” को लेकर किसानों में आशंकाएँ पैदा हुई हैं।
किसानों की प्रमुख चिंताएँ
1. सस्ते आयात का खतरा
अमेरिका में कृषि बड़े पैमाने पर, अत्याधुनिक तकनीक और भारी सरकारी सब्सिडी के सहारे की जाती है। यदि भारतीय बाजार अमेरिकी गेहूं, मक्का, सोयाबीन या डेयरी उत्पादों के लिए खुलता है, तो:
भारतीय किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में भारी नुकसान हो सकता है
एमएसपी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है
छोटे और सीमांत किसान बाजार से बाहर हो सकते हैं
2. जीएम फसलों का मुद्दा
अमेरिका जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों का बड़ा उत्पादक है। यदि ऐसे उत्पाद भारत में व्यापक रूप से आयात होते हैं, तो:
जैव विविधता पर असर पड़ सकता है
पारंपरिक बीजों और स्थानीय खेती पर संकट आ सकता है
बीज कंपनियों की निर्भरता बढ़ सकती है
3. डेयरी सेक्टर पर दबाव
भारत का डेयरी क्षेत्र मुख्यतः छोटे किसानों और सहकारी मॉडल (जैसे अमूल) पर आधारित है। अमेरिकी डेयरी उत्पादों को अनुमति मिलने से लाखों दुग्ध उत्पादकों की आय पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि:
कोई भी समझौता भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करते हुए ही किया जाएगा।
निर्यात के नए अवसर खुलेंगे, जिससे किसानों को वैश्विक बाजार मिलेगा।
कृषि तकनीक, कोल्ड स्टोरेज, सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग में निवेश बढ़ेगा।
भारत को उच्च गुणवत्ता वाले बीज और तकनीकी सहयोग मिलेगा।
सरकार यह भी तर्क देती है कि वैश्विक व्यापार से अलग रहकर भारत कृषि क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी नहीं बना सकता।
“डेथ वारंट” वाली राजनीति
“डेथ वारंट” जैसे शब्द राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं। विपक्ष इसे 2020 के कृषि कानूनों की याद से जोड़ता है, जब बड़े कॉर्पोरेट और विदेशी कंपनियों के प्रवेश को लेकर व्यापक किसान आंदोलन हुआ था।
आलोचकों का कहना है कि:
यह समझौता धीरे-धीरे कृषि बाजार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल देगा
एमएसपी कानूनी गारंटी से ध्यान हटाया जा रहा है
आत्मनिर्भर कृषि मॉडल कमजोर होगा
वहीं समर्थकों का दावा है कि:
भारतीय किसान अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं
निर्यात-आधारित कृषि से आय दोगुनी करने का लक्ष्य मजबूत होगा
वास्तविक खतरा कहाँ है?
सवाल यह नहीं है कि अमेरिका के साथ समझौता हो या न हो। असली मुद्दा यह है कि:
क्या भारतीय किसानों को बराबर की सब्सिडी और सुरक्षा मिलेगी?
क्या एमएसपी और सार्वजनिक खरीद प्रणाली बरकरार रहेगी?
क्या छोटे किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी?
यदि सुरक्षा उपायों के बिना बाजार पूरी तरह खोल दिया गया, तो छोटे किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन यदि समझौता संतुलित शर्तों और चरणबद्ध तरीके से लागू हुआ, तो यह अवसर भी बन सकता है।
पर्यावरणविद डॉ. प्रशांत सिनकर ने की ठाणे में ज़िंदा पेड़ों पर सजावट बंद करने की मुख्यमंत्री से मांग
ठाणे (Thane News)। शहर में ज़िंदा पेड़ों पर की जा रही बिजली की लाइटिंग और सजावट को लेकर पर्यावरण का गंभीर मुद्दा खड़ा हो गया है। पर्यावरणविद डॉ. प्रशांत सिनकर ने इस प्रथा को सीधे-सीधे पर्यावरण अपराध (Environment Crime) करार देते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से ठाणे में ऐसे सभी कार्य तुरंत बंद करने की मांग की है।
डॉ. सिनकर ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि त्योहारों, कार्यक्रमों और तथाकथित ब्यूटीफिकेशन के नाम पर ज़िंदा पेड़ों पर वायरिंग, ड्रिलिंग, कीलें ठोकना और भारी लाइटिंग उपकरण टांगना पेड़ों के लिए घातक साबित हो रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पेड़ सजावटी खंभे नहीं, बल्कि शहर की सांस और नागरिकों की जीवनरेखा हैं।
पत्र में यह भी चेतावनी दी गई है कि इस तरह की गतिविधियों से न केवल पेड़ों को शारीरिक नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि पक्षियों, कीट-पतंगों और पूरी जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। पेड़ों पर की गई लाइटिंग उनके प्राकृतिक विकास, जीवन चक्र और पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ रही है।
डॉ. सिनकर ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर राज्य और केंद्र सरकार नेट ज़ीरो लाइफ मिशन और क्लाइमेट चेंज से लड़ने की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय निकाय खुलेआम ज़िंदा पेड़ों पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने इसे नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खतरनाक विडंबना बताया।
इस पृष्ठभूमि में डॉ. सिनकर ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि
ज़िंदा पेड़ों पर किसी भी प्रकार की इलेक्ट्रिक लाइटिंग, डेकोरेशन और विज्ञापन सामग्री लगाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए
नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के स्पष्ट आदेश जारी किए जाएं
अपने पत्र के अंत में उन्होंने भावनात्मक अपील करते हुए लिखा, “पेड़ चीख नहीं सकते, लेकिन पूरे शहर को चुपचाप उनके ज़ख्म सहने पड़ते हैं। अगर आज हम पेड़ों के लिए नहीं खड़े हुए, तो कल शहर के लिए सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा।”
पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा।
ठाणे। स्ट्राइडर्स द्वारा आयोजित ठाणे हाफ मैराथन(Thane Half Marathon) का 12वां संस्करण रविवार, 8 फरवरी को हीरानंदानी एस्टेट, ठाणे में आयोजित होगा। इस प्रतिष्ठित रन में 21 किमी और 10 किमी (समयबद्ध) तथा 4 किमी (फन रन) कैटेगरी शामिल हैं। यह मैराथन फिटनेस और एक्टिव लाइफस्टाइल को बढ़ावा देने वाला शहर का प्रमुख स्पोर्टिंग इवेंट बन चुका है।
2026 संस्करण में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया टाइटल स्पॉन्सर है, जो हेल्थ, वेलनेस और कम्युनिटी एंगेजमेंट के प्रति बैंक की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस साल इवेंट की खास आकर्षण होंगे मशहूर फिटनेस आइकन और एंड्योरेंस एथलीट मिलिंद सोमन, जो ब्रांड एंबेसडर के रूप में रनर्स का उत्साह बढ़ाएंगे।
पिछले संस्करण में 15 हजार से ज्यादा रनर्स की भागीदारी के बाद, इस बार भी बड़ी संख्या में प्रोफेशनल, एमेच्योर और नए रनर्स के शामिल होने की उम्मीद है। हाफ मैराथन की शुरुआत न्यू होराइजन स्कूल गेट, ठाणे से होगी और समापन टीएमसी ग्राउंड पर किया जाएगा।
अत्याधुनिक सुविधाओं और विशेषज्ञ टीम के साथ लिवर ट्रांसप्लांट के लिए अस्पताल पूरी तरह तैयार
नवी मुंबई: वाशी स्थित न्यूईरा हॉस्पिटल को स्वास्थ्य विभाग से अंग प्रत्यारोपण सर्जरी करने का आधिकारिक लाइसेंस प्राप्त हो गया है। इस मंजूरी के बाद अब अस्पताल में जीवित दाता और मृत दाता दोनों से लिवर (यकृत) प्रत्यारोपण किया जा सकेगा। इस फैसले से गंभीर यकृत और किडनी रोगों से पीड़ित मरीजों को समय पर जीवनरक्षक उपचार मिल सकेगा और नवी मुंबई क्षेत्र में उन्नत चिकित्सा सुविधाओं को नई मजबूती मिलेगी।
मरीजों को अब नहीं करनी पड़ेगी बाहर शहरों की दौड़
वर्तमान में अंग प्रत्यारोपण की मांग उपलब्ध चिकित्सा ढांचे की तुलना में कहीं अधिक है, जिसके चलते मरीजों को लंबी प्रतीक्षा सूची और अन्य शहरों की यात्रा करनी पड़ती है। न्यूईरा हॉस्पिटल को मिली यह अनुमति ऐसे मरीजों के लिए आशा की नई किरण बनकर सामने आई है। अब लिवर प्रत्यारोपण के लिए नवी मुंबई और आसपास के मरीजों को बाहर जाना नहीं पड़ेगा।
राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अत्याधुनिक सुविधाएं
न्यूईरा हॉस्पिटल को राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। अस्पताल में:
अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर
विशेष ट्रांसप्लांट आईसीयू
अनुभवी ट्रांसप्लांट सर्जन और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम
सख्त संक्रमण नियंत्रण और सुरक्षा प्रोटोकॉल
जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो सफल और सुरक्षित प्रत्यारोपण सर्जरी सुनिश्चित करती हैं।
समय पर प्रत्यारोपण से बढ़ती है जीवन की गुणवत्ता
विशेषज्ञों के अनुसार, अंग विफलता या कुछ गंभीर बीमारियों में प्रत्यारोपण ही एकमात्र जीवनरक्षक विकल्प होता है। जीवित और मृत दोनों प्रकार के दाताओं से किए जाने वाले प्रत्यारोपण मरीजों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। समय पर सर्जरी होने से न केवल जीवित रहने की दर बढ़ती है, बल्कि मरीज के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार होता है।
अस्पताल प्रबंधन की प्रतिक्रिया
न्यूईरा हॉस्पिटल्स के निदेशक एवं ब्रेन व स्पाइन सर्जन डॉ. सुनील कुट्टी ने कहा,
“अब मरीजों को अंग प्रत्यारोपण के लिए लंबी दूरी तय करने की जरूरत नहीं होगी। न्यूईरा हॉस्पिटल में उन्हें अपने ही क्षेत्र में सुरक्षित, विश्वसनीय और समग्र उपचार उपलब्ध कराया जाएगा।”
वहीं, उपाध्यक्ष एवं सीईओ डॉ. माताप्रसाद बी. गुप्ता ने बताया,
“नागपुर स्थित न्यूईरा हॉस्पिटल मध्य भारत में सबसे अधिक लिवर प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों में शामिल है। वही सफल प्रत्यारोपण प्रणाली अब नवी मुंबई में भी लागू की जा रही है, ताकि यहां के मरीजों को भी समान स्तर की उन्नत चिकित्सा सेवाएं मिल सकें।”
नवी मुंबई के लिए बड़ी स्वास्थ्य उपलब्धि
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि न्यूईरा हॉस्पिटल को मिला यह लाइसेंस नवी मुंबई और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य उपलब्धि है। इससे न केवल मरीजों को समय पर उपचार मिलेगा, बल्कि क्षेत्र में अंग प्रत्यारोपण से जुड़ी चिकित्सा सुविधाएं भी नए स्तर पर पहुंचेंगी।