Tag: Health news

  • Phantom Pain: जानिए क्या है फैंटम पेन, इसके कारण, लक्षण और इलाज!

    Phantom Pain: जानिए क्या है फैंटम पेन, इसके कारण, लक्षण और इलाज!

    Phantom Pain: शरीर के किसी अंग के कट जाने या हटाए जाने के बाद भी उस अंग में दर्द, जलन, झनझनाहट या दबाव महसूस होना फैंटम पेन (Phantom Pain) कहलाता है। यह एक वास्तविक और जटिल चिकित्सीय स्थिति है, जो अक्सर हाथ, पैर, उंगलियां या अन्य अंग कटने के बाद अनुभव की जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह दर्द व्यक्ति की कल्पना नहीं होता, बल्कि मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र में होने वाले बदलावों के कारण उत्पन्न होता है।

    क्या होता है फैंटम पेन?
    फैंटम पेन वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को उस अंग में दर्द महसूस होता है, जो अब शरीर में मौजूद ही नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति का पैर दुर्घटना या बीमारी के कारण काटना पड़ा हो, तो उसे कई महीनों या वर्षों बाद भी उसी पैर में दर्द या खुजली महसूस हो सकती है।

    फैंटम पेन के कारण
    फैंटम पेन का सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ इसके पीछे कई संभावित कारण मानते हैं।

    मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में बदलाव:
    जब कोई अंग शरीर से अलग हो जाता है, तब मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो उस अंग से जुड़े संकेत प्राप्त करता था, नए तरीके से खुद को व्यवस्थित करने लगता है। इसी प्रक्रिया के दौरान दर्द के संकेत उत्पन्न हो सकते हैं।

    नसों को नुकसान:
    अंग काटे जाने के दौरान आसपास की नसों को क्षति पहुंच सकती है। क्षतिग्रस्त नसें असामान्य संकेत भेज सकती हैं, जिन्हें मस्तिष्क दर्द के रूप में महसूस करता है।

    भावनात्मक और मानसिक कारक:
    तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्थितियां भी फैंटम पेन की तीव्रता को बढ़ा सकती हैं।

    फैंटम पेन के लक्षण
    फैंटम पेन के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:

    • तेज या चुभने वाला दर्द
    • जलन या झनझनाहट महसूस होना
    • ऐंठन जैसा दर्द
    • दबाव या कसाव का एहसास
    • ऐसा महसूस होना कि हटाया गया अंग अभी भी अपनी जगह पर मौजूद है

    यह दर्द लगातार भी हो सकता है और बीच-बीच में भी हो सकता है।

    फैंटम पेन का इलाज
    फैंटम पेन का उपचार व्यक्ति की स्थिति और दर्द की गंभीरता के आधार पर किया जाता है।

    दवाइयां
    डॉक्टर दर्द कम करने के लिए कुछ विशेष दर्द निवारक दवाएं, एंटीडिप्रेसेंट्स या एंटी-सीजर दवाएं लिख सकते हैं।

    मिरर थेरेपी
    इस तकनीक में एक दर्पण का उपयोग किया जाता है, जिससे व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होता है कि हटाया गया अंग अभी भी मौजूद है। कई मरीजों में इससे दर्द कम होने में मदद मिलती है।

    फिजिकल थेरेपी और व्यायाम
    नियमित व्यायाम और फिजिकल थेरेपी मांसपेशियों को सक्रिय रखने और दर्द को नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं।

    मनोवैज्ञानिक सहायता
    काउंसलिंग, रिलैक्सेशन तकनीक और संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT) जैसी विधियां भी फैंटम पेन से निपटने में उपयोगी साबित हो सकती हैं।

    कब डॉक्टर से संपर्क करें?
    यदि अंग कटने के बाद लंबे समय तक दर्द बना रहे, दर्द बहुत अधिक हो या दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे, तो डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है। सही उपचार और सहयोग से फैंटम पेन के लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

    अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले योग्य चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।

  • Lazy Keto Diet: वायरल हो रही लेज़ी कीटो डाइट क्या है? एक्सपर्ट से जानिए इस डाइट के बारे ए टू ज़ी!

    Lazy Keto Diet: वायरल हो रही लेज़ी कीटो डाइट क्या है? एक्सपर्ट से जानिए इस डाइट के बारे ए टू ज़ी!

    Lazy Keto Diet: Lazy Keto Diet पारंपरिक कीटो डाइट का एक आसान और कम प्रतिबंधों वाला रूप है। इसमें मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) का सेवन बहुत कम किया जाता है, जबकि प्रोटीन और वसा (फैट) की मात्रा पर ज्यादा सख्ती नहीं बरती जाती। हाल के वर्षों में वजन घटाने की चाह रखने वाले लोगों के बीच यह डाइट काफी लोकप्रिय हुई है।

    क्या है Lazy Keto Diet?
    सामान्य कीटो डाइट में व्यक्ति को प्रतिदिन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और फैट की मात्रा का सटीक हिसाब रखना पड़ता है। वहीं, लेजी कीटो डाइट में केवल कार्बोहाइड्रेट को सीमित करने पर ध्यान दिया जाता है।

    आमतौर पर इस डाइट में:
    प्रतिदिन 20–50 ग्राम से कम कार्बोहाइड्रेट लेने की सलाह दी जाती है।
    प्रोटीन और फैट की मात्रा को सख्ती से ट्रैक करने की आवश्यकता नहीं होती।
    शरीर ऊर्जा के लिए कार्ब्स की बजाय फैट का उपयोग करने लगता है, जिसे कीटोसिस (Ketosis) कहा जाता है।

    Lazy Keto Diet में क्या खा सकते हैं?

    ✔ अंडे
    ✔ मछली और चिकन
    ✔ पनीर और चीज़
    ✔ मक्खन और घी
    ✔ बादाम, अखरोट और अन्य नट्स
    ✔ हरी पत्तेदार सब्जियां
    ✔ एवोकाडो और जैतून का तेल

    किन चीजों से परहेज करना चाहिए?

    ✘ चीनी और मिठाइयां
    ✘ ब्रेड, चावल और रोटी
    ✘ आलू और शकरकंद
    ✘ मीठे पेय पदार्थ
    ✘ अधिकांश पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड

    Lazy Keto Diet के फायदे

    1. वजन घटाने में मददगार
      कम कार्बोहाइड्रेट लेने से शरीर जमा फैट को ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करने लगता है, जिससे वजन कम हो सकता है।
    2. फॉलो करना आसान
      पारंपरिक कीटो डाइट की तुलना में इसमें हर भोजन का रिकॉर्ड रखने की जरूरत नहीं होती।
    3. भूख कम लग सकती है
      फैट और प्रोटीन युक्त भोजन लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस करा सकता है।
    4. ब्लड शुगर नियंत्रण में मदद
      कुछ लोगों में कार्ब्स कम करने से रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

    Lazy Keto Diet के नुकसान

    1. पोषक तत्वों की कमी
      फल, साबुत अनाज और कुछ सब्जियों का सेवन कम होने से विटामिन, मिनरल और फाइबर की कमी हो सकती है।
    2. ‘कीटो फ्लू’ की समस्या
      शुरुआती दिनों में कुछ लोगों को ये लक्षण महसूस हो सकते हैं:
      सिरदर्द
      थकान
      चक्कर आना
      चिड़चिड़ापन
      कब्ज
    3. लंबे समय तक अपनाने पर जोखिम
      बिना विशेषज्ञ सलाह के लंबे समय तक इस डाइट का पालन करने से हृदय स्वास्थ्य, किडनी और पाचन तंत्र पर असर पड़ सकता है।
    4. अस्वस्थ वसा का अधिक सेवन
      यदि व्यक्ति तले हुए या अत्यधिक प्रोसेस्ड हाई-फैट फूड खाता है, तो कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा हो सकता है।

    किन लोगों को Lazy Keto Diet नहीं अपनानी चाहिए?

    • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं
    • किडनी रोग से पीड़ित लोग
    • लिवर की बीमारी वाले मरीज
    • टाइप-1 डायबिटीज के मरीज
    • खाने से संबंधित विकार (Eating Disorders) से जूझ रहे लोग

    एक्सपर्ट की सलाह
    लेजी कीटो डाइट वजन घटाने का एक विकल्प हो सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं है। यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं या लंबे समय तक इस डाइट को अपनाने की योजना बना रहे हैं, तो पहले किसी पोषण विशेषज्ञ (Nutritionist) या डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

    निष्कर्ष
    Lazy Keto Diet उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है जो कम कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन अपनाकर वजन कम करना चाहते हैं। हालांकि, संतुलित पोषण और नियमित चिकित्सकीय सलाह के बिना इसे लंबे समय तक अपनाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है।

  • Fish in Monsoon: क्या मॉनसून में मछली खाना सुरक्षित है? जानें एक्सपर्ट की राय!

    Fish in Monsoon: क्या मॉनसून में मछली खाना सुरक्षित है? जानें एक्सपर्ट की राय!

    Fish in Monsoon: मॉनसून के मौसम में अक्सर खाने-पीने की चीज़ों की सुरक्षा को लेकर बहस होती है। सीफ़ूड भी उनमें से एक है। माना जाता है कि इस दौरान सीफ़ूड खाने से बैक्टीरिया के पनपने और पानी के दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है। सही खान-पान चुनने में आपकी मदद के लिए, एक न्यूट्रिशनिस्ट बारिश के मौसम में मछली खाने से जुड़े छिपे हुए स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में बता रही हैं और इसे खरीदने व पकाने के लिए सुरक्षा टिप्स भी दे रही हैं।

    क्या बारिश के महीनों में मछली खाना सुरक्षित है?
    सुश्री राज कहती हैं कि मॉनसून के मौसम में मछली खाना आम तौर पर सुरक्षित है, बशर्ते वह ताज़ी हो, उसे सही तरीके से रखा गया हो और अच्छी तरह पकाया गया हो। वह आगे कहती हैं कि मॉनसून के मौसम में भी मछली हाई-क्वालिटी प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन और मिनरल का एक पौष्टिक स्रोत बनी रहती है।

    नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) के अनुसार, ऑयली मछली में लॉन्ग-चेन ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है। यह दिल की बीमारी से बचाव में मदद कर सकता है। यह गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए भी बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह बच्चे के नर्वस सिस्टम के विकास में मदद कर सकता है।

    एक्सपर्ट आगे कहती हैं, “हालांकि, अतिरिक्त सावधानी की ज़रूरत है क्योंकि बारिश के मौसम में ज़्यादा नमी और स्टोरेज की स्थितियों में उतार-चढ़ाव के कारण दूषित होने, खराब होने और बैक्टीरिया के पनपने का खतरा बढ़ सकता है। कुछ इलाकों में मॉनसून के दौरान मछली पकड़ने का काम भी कम हो सकता है क्योंकि यह कई मछली प्रजातियों के प्रजनन का मौसम होता है, जिससे बाज़ार में सीफ़ूड की उपलब्धता और गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।”

    खराब मछली खाने के जोखिम
    सुश्री राज कहती हैं कि खराब या ठीक से न पकाई गई मछली खाने से ये समस्याएं हो सकती हैं:

    • फ़ूड पॉइज़निंग
    • पेट का इन्फेक्शन
    • दस्त (डायरिया)
    • उल्टी
    • पाचन से जुड़ी अन्य समस्याएं
    • फ़ूड पॉइज़निंग
    • पेट का इन्फेक्शन
    • दस्त (डायरिया)
    • उल्टी
    • पाचन से जुड़ी अन्य समस्याएं

    किन्हें ज़्यादा खतरा है? इस सवाल का जवाब देते हुए एक्सपर्ट कहती हैं, “कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों, बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को इस दौरान सीफ़ूड खाते समय खास सावधानी बरतनी चाहिए। भरोसेमंद विक्रेताओं से मछली चुनना और सही स्टोरेज सुनिश्चित करना स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए ज़रूरी कदम हैं।”

    मॉनसून में मछली खाने के लिए सुरक्षा टिप्स
    मॉनसून के दौरान सीफ़ूड का मज़ा लेते हुए सुरक्षित रहने के लिए, सुश्री राज इन बातों का पालन करने का सुझाव देती हैं:

    • मछली सिर्फ़ भरोसेमंद विक्रेताओं से खरीदें जो साफ़-सफ़ाई और सही रेफ्रिजरेशन का ध्यान रखते हों। ताज़ी मछली में हल्की गंध, साफ़ आंखें, सख्त मांस और चमकीले गलफड़े (gills) होने चाहिए।
    • ऐसी मछली न लें जिसमें तेज़ बदबू हो, जो चिपचिपी हो या जिसका रंग बदला हुआ हो। खरीदने के बाद, मछली को फ्रिज में रखें और जितनी जल्दी हो सके उसे पका लें।
    • कच्ची मछली को छूने के बाद अपने हाथों, बर्तनों और कटिंग बोर्ड को अच्छी तरह धो लें ताकि क्रॉस-कंटैमिनेशन (एक चीज़ से दूसरी चीज़ में कीटाणु फैलना) से बचा जा सके।
    • मछली को अच्छी तरह पकाना भी ज़रूरी है, क्योंकि ठीक से पकाने से हानिकारक बैक्टीरिया, पैरासाइट और दूसरे सूक्ष्मजीव मर जाते हैं।
    • मानसून के दौरान कच्चा या अधपका सीफ़ूड (समुद्री भोजन) खाने से बचें, जिसमें बिना पकी मछली वाली डिशेज़ भी शामिल हैं।

    निष्कर्ष
    सबसे ज़रूरी बात है ताज़गी, साफ़-सफ़ाई, सही तरीके से स्टोर करना और अच्छी तरह पकाना। भरोसेमंद जगहों से सीफ़ूड खरीदकर, उसे सही ढंग से स्टोर करके और सुरक्षित तरीके से खाना संभालकर, ज़्यादातर लोग बारिश के मौसम में भी सुरक्षित रूप से मछली का मज़ा ले सकते हैं। अगर मछली की ताज़गी या क्वालिटी को लेकर कोई शक हो, तो उसे न खाना ही बेहतर है, क्योंकि जोखिम लेने के बजाय खाने से होने वाली बीमारी से बचना हमेशा ज़्यादा सुरक्षित होता है।

  • HIV Positive Woman Delivery Case: एचआईवी पॉजिटिव महिला का प्रसव न कराने पर अस्पतालों की जांच शुरू!

    HIV Positive Woman Delivery Case: एचआईवी पॉजिटिव महिला का प्रसव न कराने पर अस्पतालों की जांच शुरू!

    HIV Positive Woman Delivery Case: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती महिला का प्रसव कराने से इंकार करने के मामले में जिला महिला अस्पताल हमीरपुर और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) मौदहा के खिलाफ जांच शुरू कर दी गई है। जिलाधिकारी के निर्देश पर डिप्टी सीएमओ को मामले की जांच सौंपी गई है।

    जांच अधिकारी एवं डिप्टी सीएमओ डॉ. संजय कुमार ने मंगलवार को बताया कि महोबा जिले के खन्ना क्षेत्र निवासी दंपती एचआईवी पॉजिटिव हैं। महिला के पति ने प्रसव के लिए पत्नी को मौदहा सीएचसी में भर्ती कराया था, जहां एचआईवी पॉजिटिव होने की जानकारी मिलने पर स्टाफ ने प्रसव कराने से मना कर दिया और जिला महिला अस्पताल हमीरपुर रेफर कर दिया।

    उन्होंने बताया कि जिला महिला अस्पताल पहुंचने पर भी रेफरल कार्ड देखते ही महिला को तत्काल कानपुर रेफर कर दिया गया। इस दौरान महिला प्रसव पीड़ा से गुजर रही थी। जबकि शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि एचआईवी पॉजिटिव प्रसूताओं का हर हाल में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव कराया जाए। इसके लिए विशेष किट और चिकित्सकीय प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है।

    बताया गया कि 21 मई को महिला ने कानपुर के एक निजी अस्पताल में प्रसव कराया, जिसमें परिवार का लगभग 40 हजार रुपये खर्च हो गया। इसके बाद पीड़ित परिवार ने हमीरपुर पहुंचकर जिलाधिकारी अभिषेक गोयल से शिकायत की। जिलाधिकारी ने मामले की जांच मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. गीतम सिंह को सौंपी, जिन्होंने आगे जांच डिप्टी सीएमओ को दे दी।

    संबंधित खबरें: Combat Ebola Infection: नड्डा ने इबोला संक्रमण से निपटने की तैयारियों और सुरक्षा उपायों की समीक्षा की!

    जांच के दौरान मौदहा सीएचसी अधीक्षक डॉ. रजत तिवारी ने कहा कि स्टाफ ने महिला को जिला महिला अस्पताल रेफर कर दिया था और उन्हें मामले की जानकारी नहीं थी। वहीं जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. के.एस. मिश्रा ने बताया कि अस्पताल में पूर्व में एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं के प्रसव कराए जा चुके हैं तथा इसके लिए अलग ऑपरेशन थिएटर और विशेष किट उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि महिला को रेफर किए जाने की जानकारी की जांच कराई जाएगी।

    डॉ. मिश्रा ने यह भी स्वीकार किया कि अस्पताल का अधिकांश स्टाफ इस प्रकार के मामलों में प्रशिक्षित नहीं है। वहीं जांच अधिकारी डॉ. संजय कुमार ने दावा किया कि एचआईवी संक्रमित महिलाओं के प्रसव संबंधी मामलों में स्वास्थ्य केंद्रों पर लगभग 90 प्रतिशत स्टाफ अप्रशिक्षित है, जबकि सभी चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को इस संबंध में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि महिला अस्पताल में एचआईवी जांच की सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली कई प्रसूताओं की जांच किए बिना ही प्रसव करा दिया जाता है। साथ ही महिला अस्पताल की काउंसलर को पुरुष अस्पताल से संबद्ध किए जाने के कारण भी कार्य प्रभावित हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार ऐसे मामलों की सूचना आईसीटीसी को दी जानी चाहिए, लेकिन कई बार ऐसा नहीं किया जाता।

  • Genetic Mutations: महिलाओं की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ को कमजोर कर रहा जेनेटिक म्यूटेशन!

    Genetic Mutations: महिलाओं की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ को कमजोर कर रहा जेनेटिक म्यूटेशन!

    Genetic Mutations: ऑटिज्म को लेकर सामने आई एक नई रिसर्च ने वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस अध्ययन में दावा किया गया है कि कुछ विशेष जेनेटिक म्यूटेशन महिलाओं में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के खतरे को बढ़ा सकते हैं।

    अब तक यह माना जाता रहा है कि महिलाओं के शरीर और मस्तिष्क में मौजूद एक प्रकार की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ उन्हें न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर से काफी हद तक सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन हालिया रिसर्च से पता चला है कि कुछ आनुवंशिक बदलाव इस प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को भी कमजोर कर सकते हैं।

    शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑटिज्म एक जटिल न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जो व्यक्ति के व्यवहार, संचार क्षमता और सामाजिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। आमतौर पर पुरुषों में ऑटिज्म के मामले अधिक देखे जाते हैं, जबकि महिलाओं में इसके लक्षण कई बार अलग और कम स्पष्ट होते हैं।

    संबंधित खबरें: Protect Yourself from Heatstroke: लू से बचने के लिए जानें क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज!

    यही कारण है कि महिलाओं में ऑटिज्म की पहचान अक्सर देर से हो पाती है। नई स्टडी बताती है कि महिलाओं में मौजूद कुछ जेनेटिक म्यूटेशन मस्तिष्क के विकास और न्यूरल कनेक्शन को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे ऑटिज्म का खतरा बढ़ जाता है।

    वैज्ञानिकों ने रिसर्च के दौरान पाया कि जिन महिलाओं में ये विशेष जेनेटिक बदलाव मौजूद थे, उनमें सामाजिक व्यवहार, संवाद और भावनात्मक प्रतिक्रिया से जुड़ी चुनौतियां अधिक देखी गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज महिलाओं में ऑटिज्म की पहचान और समझ को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे भविष्य में शुरुआती जांच, बेहतर उपचार और व्यक्तिगत थेरेपी विकसित करने में मदद मिलने की संभावना है।

    रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि महिलाओं में ऑटिज्म को लेकर लंबे समय से कम अध्ययन हुए हैं, क्योंकि अधिकतर रिसर्च पुरुषों पर केंद्रित रही हैं। ऐसे में यह अध्ययन महिलाओं की मानसिक और न्यूरोलॉजिकल स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को समझने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि ऑटिज्म केवल जेनेटिक कारणों से नहीं होता, बल्कि पर्यावरण, जीवनशैली और अन्य जैविक कारक भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। फिर भी यह अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि कैसे कुछ आनुवंशिक बदलाव महिलाओं की ‘नेचुरल सेफ्टी शील्ड’ को कमजोर कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अभी और व्यापक रिसर्च की आवश्यकता है, ताकि ऑटिज्म के कारणों और उसके प्रभावों को और गहराई से समझा जा सके।

  • Protect Yourself from Heatstroke: लू से बचने के लिए जानें क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज!

    Protect Yourself from Heatstroke: लू से बचने के लिए जानें क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज!

    Protect Yourself from Heatstroke: गर्मी के मौसम में बढ़ता तापमान और तेज धूप लोगों की सेहत पर बुरा असर डाल सकती है। खासकर ‘लू’ लगने का खतरा इस दौरान काफी बढ़ जाता है। शरीर में पानी की कमी, कमजोरी, चक्कर आना और उल्टी जैसी समस्याएं लू के कारण हो सकती हैं। ऐसे में खानपान का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

    सही चीजों का सेवन आपको गर्मी और लू से बचाने में मदद कर सकता है, वहीं कुछ खाद्य पदार्थ आपकी परेशानी बढ़ा सकते हैं। आइए जानते हैं कि लू से बचने के लिए क्या खाना चाहिए और किन चीजों से परहेज करना बेहतर रहेगा।

    लू से बचने के लिए क्या खाएं?
    पानी और तरल पदार्थ
    : दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। नींबू पानी, नारियल पानी, छाछ और ORS शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं।
    मौसमी फल: तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और संतरा जैसे पानी से भरपूर फल शरीर को ठंडक देते हैं।
    दही और छाछ: ये शरीर को ठंडा रखने के साथ पाचन को भी बेहतर बनाते हैं।
    हल्का भोजन: गर्मियों में हल्का और आसानी से पचने वाला खाना खाना चाहिए।
    पुदीना और प्याज: पुदीना शरीर को ठंडक देता है और प्याज को लू से बचाव में फायदेमंद माना जाता है।

    संबंधित खबरें: Healthy Korean Kimchi: खीरे की क्रंची किमची का मजेदार स्वाद जरूर करें ट्राई!

    किन चीजों से करें परहेज?
    ज्यादा मसालेदार खाना
    : बहुत ज्यादा तेल और मसालों वाला खाना शरीर में गर्मी बढ़ा सकता है।
    कैफीन और शराब: चाय, कॉफी और शराब शरीर में पानी की कमी कर सकते हैं।
    बासी खाना: गर्मियों में बासी भोजन जल्दी खराब हो सकता है, जिससे फूड पॉइजनिंग का खतरा बढ़ जाता है।
    जंक फूड: तला-भुना और फास्ट फूड पाचन पर बुरा असर डाल सकता है।
    धूप में खाली पेट निकलना: खाली पेट बाहर जाने से कमजोरी और चक्कर आने की संभावना बढ़ जाती है।

    गर्मी के मौसम में सही खानपान और पर्याप्त पानी का सेवन आपको लू से बचाने में अहम भूमिका निभाता है। कोशिश करें कि दोपहर के समय तेज धूप में बाहर निकलने से बचें और शरीर को हमेशा हाइड्रेट रखें। थोड़ी सावधानी अपनाकर आप गर्मी के इस मौसम में खुद को स्वस्थ और सुरक्षित रख सकते हैं।

  • Chef Sanjeev Kapoor on Poha: अगर चावल अनहेल्दी है तो पोहा उससे भी ज्यादा….शेफ संजीव कपूर ने पोहे को लेकर कह दी ये बड़ी बात!

    Chef Sanjeev Kapoor on Poha: अगर चावल अनहेल्दी है तो पोहा उससे भी ज्यादा….शेफ संजीव कपूर ने पोहे को लेकर कह दी ये बड़ी बात!

    Chef Sanjeev Kapoor on Poha: क्या आपके घर में पोहा नाश्ते में अक्सर बनता है? कई भारतीयों के लिए, यह लगभग हर हफ़्ते बनने वाला मुख्य नाश्ता है — हल्का, पेट को आराम देने वाला और जल्दी बनने वाला। कुछ घरों में, इसे कुरकुरी जलेबियों के साथ भी खाया जाता है, ताकि मीठे और नमकीन का एकदम सही मेल मिल सके।

    हालांकि, मशहूर शेफ़ संजीव कपूर इसे एक हेल्दी नाश्ता नहीं मानते। ANI पॉडकास्ट पर स्मिता प्रकाश से बात करते हुए, पद्म श्री से सम्मानित शेफ़ ने इस मशहूर नाश्ते के बारे में अपने विचार साझा किए और कहा कि यह उतना हेल्दी नहीं होता जितना कि बहुत से लोग मानते हैं।

    पॉडकास्ट के दौरान, शेफ़ ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में खाने से जुड़े कुछ मिथकों को तोड़ा और साथ ही “कम सराहे गए खाने वाले शहरों,” “ज़्यादा सराहे गए स्ट्रीट फ़ूड” और भी बहुत कुछ पर अपनी बेबाक राय दी। चर्चा के दौरान, प्रकाश ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उनके हिसाब से, “पोहा को ज़रूरत से ज़्यादा सराहा जाता है।”

    बात को आगे बढ़ाते हुए, कपूर ने समझाया कि भारतीयों के लिए पोहा असल में एक “कम्फ़र्ट फ़ूड” (आराम देने वाला खाना) ज़्यादा है। “पोहा एक कम्फ़र्ट फ़ूड है, लेकिन यह सब देखने वालों के लिए है; यह बिल्कुल भी हेल्दी नहीं है। अगर चावल को अनहेल्दी माना जाता है, तो पोहा उससे भी ज़्यादा अनहेल्दी है।”

    यह राय कई भारतीयों के लिए हैरानी की बात हो सकती है, खासकर इंदौर जैसे शहरों में, जहाँ पोहा-जलेबी सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि एक “जज़्बा” है। लेकिन शेफ़ के अनुसार, इससे बचना चाहिए। अरे-अरे! हम आपके दिल टूटने की आवाज़ सुन सकते हैं। उन्होंने आगे बताया कि सुबह-सुबह पोहा खाने से शरीर में इंसुलिन का स्तर अचानक बढ़ सकता है।

    संबंधित खबरे: Summer Travel Tips: भीड़-भाड़ से दूर बिताना चाहते हैं छुट्टियां? ये ऑफबीट डेस्टिनेशन हैं परफेक्ट!

    पोहे पर बहस
    असल में, पोहा चपटे चावल (चिवड़ा) से बनता है, जिसमें आमतौर पर राई, करी पत्ता, प्याज़, मूंगफली और कुछ मसाले डालकर तड़का लगाया जाता है। हालांकि, हर घर में इसे बनाने का अपना अलग तरीका और अंदाज़ होता है। कुछ लोग इसमें ज़्यादा सब्ज़ियाँ डालते हैं, कुछ लोग इस पर थोड़ा सा नींबू निचोड़कर खाना पसंद करते हैं, और कुछ लोग इसे ज़्यादा मज़ेदार तरीके से खाते हैं — ऊपर से सेव या कुरकुरा मिक्सचर डालकर।

    अब, अगर सेहत के नज़रिए से देखें, तो यह काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कैसे बनाया गया है और कितनी मात्रा में खाया जा रहा है। इसकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि यह पेट के लिए हल्का, सुकून देने वाला और जल्दी बनने वाला नाश्ता है, जो व्यस्त सुबहों के लिए एक आसान विकल्प है। जब इसे सब्ज़ियों, मूंगफली और बहुत कम तेल के साथ पकाया जाता है, तो यह कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और हेल्दी फैट्स का एक अच्छा मिश्रण भी देता है।

    अब, भारतीय लोग एक आम गलती यह करते हैं कि वे रिफाइंड कार्ब्स बहुत ज़्यादा लेते हैं और प्रोटीन बहुत कम।

    वहीं, पोहा मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है और अपने आप में इसमें प्रोटीन की मात्रा कम होती है; इसका मतलब है कि यह शायद हर किसी का पेट ज़्यादा देर तक भरा न रख पाए या लगातार ऊर्जा न दे पाए। अगर इसे नियमित रूप से, बिना सही पोषक तत्वों के संतुलन के खाया जाए, तो यह इंसुलिन के स्तर में तेज़ी से बढ़ोतरी का कारण बन सकता है – खासकर तब, जब इसे जलेबी जैसी मीठी चीज़ों के साथ खाया जाए।

    अक्सर यह सलाह दी जाती है कि इस नाश्ते को ज़्यादा संतुलित बनाने के लिए, इसके साथ प्रोटीन से भरपूर चीज़ें जैसे अंकुरित अनाज (sprouts), पनीर या सोया चंक्स भी खाए जाएँ। इसके अलावा, सेव, चीनी या तली हुई चीज़ों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने से भी इसकी कुल पौष्टिक गुणवत्ता कम हो सकती है।

    कुल मिलाकर, पोहे को नाश्ते की मेज़ से पूरी तरह से हटाने की ज़रूरत नहीं है। ज़्यादातर ‘कम्फर्ट फ़ूड’ (मनपसंद और सुकून देने वाले खाने) की तरह ही, इसका भी राज़ संतुलन, संयम और इस बात में छिपा है कि आप इसे किस चीज़ के साथ खाते हैं।

  • Genetic Risk Protection: बच्चों को Diabetes से कैसे रखें दूर? जानें 5 आसान तरीके

    Genetic Risk Protection: बच्चों को Diabetes से कैसे रखें दूर? जानें 5 आसान तरीके

    Genetic Risk Protection: जब माता-पिता से ऐसे जीन बच्चों में ट्रांसफर होते हैं, जो शरीर की इंसुलिन प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं, तो इसे जेनेटिक डायबिटीज कहा जाता है।

    ⚠️ डायबिटीज के प्रमुख कारण
    इंसुलिन रेजिस्टेंस (शरीर इंसुलिन को सही से इस्तेमाल नहीं करता)
    बीटा सेल्स का सही से काम न करना
    अनहेल्दी लाइफस्टाइल (जंक फूड, मोटापा, तनाव)
    🚨 लक्षण जिन पर रखें नजर
    बार-बार प्यास लगना
    बार-बार पेशाब आना
    अचानक वजन कम होना
    थकान और कमजोरी
    घाव देर से भरना
    त्वचा का काला पड़ना

    संबंधित खबरें-Summer Skin Care: Parlor जाने की जरूरत नहीं! ये घरेलू नुस्खा देगा चेहरे को Natural Glow

    टाइप 1 डायबिटीज (Genetic Risk Protection)
    टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। अगर पुरुष को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे को डायबिटीज होने की संभावना 17 में से 1 होती है। वहीं अगर मां को टाइप 1 डायबिटीज है और बच्चे का जन्म 25 साल से पहले हुआ है, तो उन बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज का खतरा 25 में से 1 है। वहीं अगर बच्चे का जन्म 25 साल की उम्र के बाद हुआ, तो उनके बच्चों में इस डायबिटीज का खतरा 100 में से 1 है।

    टाइप 2 डायबिटीज
    यह जीन और लाइफस्टाइल के मिश्रण से होने वाली समस्या है। अगर फैमिली में पहले से किसी को टाइप 2 डायबिटीज है, तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि आपकी डायबिटीज लाइफस्टाइल की वजह से है या फिर जेनेटिक्स की वजह से है।

    जेनेटिक डायबिटीज की वजह
    इंसुलिन रेजिस्टेंस

    जब पेरेंट्स से ऐसे जीन मिलते हैं, जोकि बॉडी को इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करने देते हैं। तो टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। जब हमारे सेल्स इंसुलिन की बात मानना बंद कर देते हैं, जिसको हम इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं। इससे हमारे ब्लड में शुगर का लेवल बढ़ने लगता है।

    बीटा सेल डिस्फंक्शन
    बता दें कि पैनक्रियाज वह अंग है, जिसमें बीटा सेल्स होती हैं। इसका काम इंसुलिन हार्मोन प्रोड्यूस करना होता है। इंसुलिन का काम ब्लड से शुगर यानी ग्लूकोज को निकालकर बॉडी की सेल्स तक पहुंचाना है। जिससे हमको एनर्जी मिल सके। इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण पैनक्रियाज बीटा सेल्स नहीं बना पाती है। ऐसे में भी डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।

    लक्षण
    आंखों की रोशनी में अचानक बदलाव होना।
    घाव भरने में अधिक समय लगना।
    बहुत ज्यादा प्यास लगना।
    बिना कारण वजन घटना
    बार-बार पेशाब आना।
    त्वचा का काला पड़ना।
    थकान और कमजोरी।

    टाइप 2 और प्री-डायबिटीज के लिए टेस्ट
    एचबीए1सी टेस्ट

    एचबीए1सी टेस्ट के जरिए पिछले 2 से 3 महीनों का औसत शुगर लेवल का पता लगाया जा सकता है। बच्चों में डायबिटीज का पता लगाने के लिए यह सबसे आसान टेस्ट है। क्योंकि इस टेस्ट के लिए बच्चे को भूखे रहने की भी जरूरत नहीं है।

    फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज
    सुबह खाली पेट यह टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट से पहले आमतौर पर बच्चे को कम से कम 8 से 10 घंटे तक भूखे रहना होता है। इस दौरान बच्चा सिर्फ पानी पी सकता है। यह प्री-डायबिटीज और डायबिटीज का पता लगाने का आसान तरीका है।

    ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट
    इसमें ग्लूकोज वाला पानी पिलाया जाता है। फिर उसको 2 घंटे बाद शुगर लेवल चेक किया जाता है। ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट से पता चलता है कि बॉडी किस तरह से शुगर को हैंडल कर रहा है।

    पेरेंट्स बच्चे को ऐसे डायबिटीज से बचाएं
    हेल्दी डाइट

    अगर माता-पिता को डायबिटीज है, तो उनको अपने बच्चे की डाइट का खास ख्याल रखना चाहिए। बच्चे को प्रोसेस्ड फूड और चीनी जैसे- पैकेट बंद जूस, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स और चॉकलेट्स बहुत कम मात्रा में दें।बच्चों में डाइट मुख्य रूप से जेनेटिक डायबिटीज को ट्रिगर करती है। जोकि आनुवांशिक रूप से संवेदनशील बच्चों में ऑटोइम्यूनिटी के लिए एक एंवायरमेंट फैक्टर्स के रूप में काम करती हैं। या फिर इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। पेरेंट्स को बच्चों की डाइट में फाइबर की मात्रा को बढ़ाना चाहिए। वहीं उनकी डाइट में सलाद और हरी पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करें।

    कम करें स्क्रीन टाइम
    आज के समय में बच्चों का स्क्रीन टाइम काफी बढ़ गया है। कई बच्चे घंटों तक मोबाइल पर समय बिताते हैं। जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम होता है, टाइप 2 डायबिटीज का खतरा उतना बढ़ जाता है। क्योंकि स्क्रीन टाइम के समय बच्चे निष्क्रिय बैठते हैं, जिससे मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल कम करती हैं। इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ने लगता है। अक्सर स्क्रीन देखते हुए बच्चे अनहेल्दी स्नैक्स का भी सेवन कर बैठते हैं। जिससे मोटापे का खतरा बढ़ता है। इसलिए पेरेंट्स को चाहिए कि बच्चे का स्क्रीन टाइम कम करें।

    फिजिकल एक्टिविटी
    कम से कम 60 मिनट तक बच्चे को पसीने वाली फिजिकल एक्टिविटी जैसे बैडमिंटन, फुटबॉल, रनिंग या स्विमिंग करने के लिए मोटिवेट करना चाहिए। इससे बच्चा शारीरिक रूप से सक्रिय होता है और मोटापा नहीं बढ़ता है। वहीं मेटाबॉलिज्म भी ठीक तरह से काम करता है। इससे डायबिटीज के खतरे को भी कम किया जा सकता है।

    वजन कंट्रोल
    माता-पिता के लिए जरूरी है कि वह अपने बच्चे का वेट कंट्रोल में रखने की कोशिश करें। एक रिपोर्ट के मुताबिक मोटापा बच्चों में इंसुलिन रिजेस्टेंस पैदा करके टाइप 2 डायबिटीज की वजह बनता है।

  • Vitamin D-Calcium: विटामिन डी और कैल्शियम के बीच है एक अनोखा कनेक्शन! जानो क्या है वो कनेक्शन!

    Vitamin D-Calcium: हम सभी जानते हैं कि मजबूत हड्डियों के लिए कैल्शियम जरूरी होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिर्फ कैल्शियम लेना ही काफी नहीं है? अगर शरीर में विटामिन D की कमी है, तो कैल्शियम सही तरीके से काम ही नहीं कर पाता। दरअसल, विटामिन D और कैल्शियम का रिश्ता ऐसा है जैसे ताला और चाबी। एक के बिना दूसरा अधूरा है। यही कारण है कि डॉक्टर भी इन दोनों को साथ में लेने की सलाह देते हैं।(Vitamin D-Calcium)

    विटामिन D और कैल्शियम का कनेक्शन क्या है?
    विटामिन D शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाने का काम करता है। जब हम कैल्शियम युक्त भोजन लेते हैं, तो विटामिन D उसे आंतों से खून में पहुंचाने में मदद करता है। बिना विटामिन D के, शरीर कैल्शियम को सही से उपयोग नहीं कर पाता।

    कैसे काम करते हैं दोनों साथ में?
    जब शरीर को पर्याप्त विटामिन D मिलता है, तो यह कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाने में मदद करता है। इससे हड्डियां मजबूत बनती हैं और फ्रैक्चर का खतरा कम होता है। वहीं, अगर विटामिन D की कमी हो जाए, तो कैल्शियम शरीर में सही से अवशोषित नहीं होता, जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।

    कमी होने पर क्या होता है असर?
    अगर शरीर में विटामिन D या कैल्शियम की कमी हो जाए, तो इसके कई गंभीर असर हो सकते हैं। जैसे-
    हड्डियों में दर्द और कमजोरी
    बार-बार फ्रैक्चर होना
    मांसपेशियों में कमजोरी
    बच्चों में हड्डियों का सही विकास न होना

    किन चीजों से मिलते हैं ये पोषक तत्व?

    • सुबह की धूप
    • दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स
    • अंडा और मछली
    • कैल्शियम के स्रोत
    • दूध, दही, पनीर
    • हरी पत्तेदार सब्जियां
    • बादाम और तिल

    सही मात्रा और संतुलन क्यों जरूरी है?
    सिर्फ ज्यादा कैल्शियम लेना या सिर्फ विटामिन D लेना दोनों ही सही नहीं है। इनका संतुलन जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार सही मात्रा में इनका सेवन करना ही बेहतर होता है।